भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 163

सकलमिव चतुःसमुद्रलावण्यमादायोत्थितया श्रिया समुपश्लिष्टम्, आभरणमणिकिरणप्रभाजालजायमानानीन्द्रधनुःसहस्राणीन्द्रप्राभृतप्रहितानि विलभमानमिव राज्ञां संभाषणेषु परित्यक्तमपि मधु वर्षन्तम्, काव्यकथास्वपीतमप्यमृतमुद्वमन्तम्, विश्रम्भभाषितेष्वनाकृष्टमपि हृदयं दर्शयन्तम्, प्रसादेषु निश्चलामपि श्रियं स्थाने स्थाने स्थापयन्तम्, वीरगोष्ठीषु पुलकितेन कपोलस्थलेनानुरागसंदेशमिवोपांशु रणश्रियः शृण्व- न्तम्, अतिक्रान्तसुभटकलहालापेषु स्नेहवृष्टिमिव दृष्टिमिष्टे कृपाणे पातय- न्तम्, परिहासस्मितेषु गुरुप्रतापभीतस्य राजकस्य स्वच्छमाशयमिव दशनांशुभिः कथयन्तम्, सकललोकहृदयस्थितमपि न्याये तिष्ठन्तम्,


नवति । असहमानमिवेति । कथं सामान्येन समान इति । सकलमित्यादि । सकल- पदेन चतु.शब्देन च शौरेरस्य विशेषमाह । ततो लवणत्वस्य तत्राद्यापि शिष्यमा- णत्वात् । अलं लावण्यमादाय । एकस्माच्च समुद्रादुत्थाय लक्ष्म्या शौरिः समुप- श्लिष्टः । लावण्यं लवणता; सौन्दर्यं च। प्राभृतं ढौकनिकम्। मधु मद्यम्, अमृतं च । विश्रम्भ विश्वासः । उपांश्वप्रकटम् । अतिक्रान्ते कलहे रणे शस्त्राणां स्नेहो दीयते रुधिरादिसलिलनिवारणाय । स्वच्छं निर्मलम् , सुप्रसादमाशयं भावं, प्रकृष्टतापभी- तस्य च स्वच्छो निर्मल आशयो जलाधारो दृश्यते । अत्र प्रतापेत्यादि प्रकरणसाह- चर्यात्स्वच्छतान्यथानुपपत्त्या च जलशब्द बिना जलाशय एव प्रतीयते । न्याये तिष्ठन्तम् । न्यायममुञ्चन्तमित्यर्थः । यः सर्वेषां हृदयस्थितः स एकस्मिन्नेव तिष्ठ-


छोड़ती हुई राजलक्ष्मी को धारण कर रहे थे, मानो चारों समुद्रों के सम्पूर्ण लावण्य को लेकर निकली हुई श्री ने उनका आलिंगन किया था। उनके आभरणों की प्रभा से हजारों इन्द्रधनुष बन गए थे, मानो उपहार के रूप में इन्द्र ने भेजा हो। राजाओं के साथ बातचीत के प्रसंग में छूटे हुए भी मधु ( मदिरा अथवा मधुर रस ) की मानो वर्षा कर रहे थे। कविता की गोष्ठियों में न पिये हुए अमृत को भी मानो उगल रहे थे। विश्रंभालाप करते हुए अपने अनाकृष्ट हृदय को मानों दिखा रहे थे। प्रसन्न होकर स्थान-स्थान में अपनी निश्चल श्री को भी अर्पित कर रहे थे। वीरगोष्ठियों में उनके कपोल रोमांच से भर आये थे मानों एकांत में रणश्री द्वारा भेजे गये अनुरागसंदेश को सुन रहे थे। बड़े-बड़े योद्धाओं के युद्धों की बातचीत के प्रसंगों में अपने प्रिय कृपाण पर मानो स्नेह की वर्षा की भांति दृष्टिपात कर रहे थे। हँसी-मजाक में मुस्कुराते हुए वे अपने प्रचण्ड प्रताप से भीत राजाओं के प्रति दाँत की किरणों से अपने स्वच्छ मनोभाव को व्यक्त कर रहे थे । सारे जन-समूह के हृदय में स्थित होकर भी न्याय पर स्थित थे। उनमें