भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 162

१२० हर्षचरितम् विषमराजमार्गविनिहितपदस्खलनभियेव सुलग्नं धर्मे, सकलभूपालपरि- त्यक्तेन भीतेनेव लब्धवाचा सर्वात्मना सत्येन सेव्यमानम्, आसन्नवार- विलासिनीप्रतियातनाभिश्चरणनखपातिनीभिर्दिग्भिरिव दशभिर्विग्रहावर्जि- ताभिः प्रणम्यमानम्, दीर्घैर्दिगन्तपातिभिर्दृष्टिपातैर्लोकपालानां कृताकृतमिव प्रत्यवेक्षमाणम्, मणिपादपीठपृष्ठप्रतिष्ठितकरेणोपरिगमनाभ्यनुज्ञां मृग्य- माणमिव दिवसकरेण, भूषणप्रभासमुत्सारणबद्धपर्यन्तमण्डलेन प्रद- क्षिणीक्रियमाणमिव¹ दिवसेन, अप्रणमद्भिर्गिरिभिरपि² दूयमानं, शौर्यो- ष्मणा फेनायमानमिव चन्दनधवलं लावण्यजलधिमुद्वहन्तमेकराज्यो- र्जित्येन, निजप्रतिबिम्बान्यपि नृपचक्रचूडामणिधृतान्यसहमानमिव दर्पदुःखासिकया चामरानिलनिभेन बहुधेव श्वसन्तीं राजलक्ष्मीं दधानम्, स कयाचिदालिङ्गयेत । विषमोऽशक्यीनुष्ठानो नतोन्नतरूपः । मार्गो व्यवहारः, पन्थाश्च । विषमे पथि च स्खलति येन क्वचित्सुलग्नेन भूयते । लब्धवाचेति । सत्यस्य वागेवाश्रयणीयश्च । सर्वैस्त्यक्तः सम्भीतः संस्त्वां, त्यजामीति वाचं लब्ध्वान्यं सेवते, वारविलासिनी शरीरोपचारचतुरा मुख्यललनाप्रतिविम्बम् । दशभिरिति । नखानां दिशां च दशसंख्याकत्वात् । मणिपादेति । मणिसंबन्ध- प्रतिष्ठानमेव पोषयति । करो हस्तोऽपि । फेनायमानमिति । जल संतापेन सफेनं उन्होंने असिधाराव्रत लिया था फिर भी वे सदा एकान्त रहने वाले (अविसंवादी) राजर्षि थे। टेढ़े-मेढ़े राजमार्ग (राजा के पद) पर पैर फिसलने के भय से मानों उन्होंने धर्म का आश्रय लिया था। मानों सत्य दूसरे राजाओं से तिरस्कृत होकर डरते-डरते वचन लेकर सब प्रकार से उन्हीं की सेवा में तत्पर था। पास में खड़ी वेश्या (चामरग्राहिणी) की परछाइयाँ उनके चरण के नखों पर पड़ रही थीं, मानों दशो दिशायें शरीर धारण करके उनको प्रणाम कर रही हों। वे दूर तक लम्बे दृष्टिपात से मानो लोकपालों की गलती सही देख रहे थे। सूर्य की किरणें उनके मणिमय पादपीठ पर पड़ रही थीं मानों वह आकाश में दूर जाने के लिए सम्राट् की अनुमति पाने की इच्छा से प्रार्थना कर रहा था। आभूषणों की प्रभा से उनके चारों ओर मंडल-सा बन गया था मानो दिन उनकी प्रदक्षिणा कर रहा हो। शौर्य के दर्प से वे न झुकने वाले पर्वतों से कष्ट का अनुभव करते थे। वह उस चन्दन के सदृश उज्ज्वल लावण्य के समुद्र को धारण कर रहे थे जो उनके एकाधिपत्य के बड़े शौर्य के प्रताप से खौलकर फेनिल हो रहा था। दर्प के कारण अपने ही प्रतिबिम्बों को जो राजाओं की चूड़ा- मणियों में पड़ रहे थे, सहन नहीं कर पाते थे। चँवर की हवा के बहाने बार-बार सांस १. मिव गळितोष्मणा दिवसेन । २. भूभृद्भिर्दूयमानं ।