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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

१२० हर्षचरितम् विषमराजमार्गविनिहितपदस्खलनभियेव सुलग्नं धर्मे, सकलभूपालपरि- त्यक्तेन भीतेनेव लब्धवाचा सर्वात्मना सत्येन सेव्यमानम्, आसन्नवार- विलासिनीप्रतियातनाभिश्चरणनखपातिनीभिर्दिग्भिरिव दशभिर्विग्रहावर्जि- ताभिः प्रणम्यमानम्, दीर्घैर्दिगन्तपातिभिर्दृष्टिपातैर्लोकपालानां कृताकृतमिव प्रत्यवेक्षमाणम्, मणिपादपीठपृष्ठप्रतिष्ठितकरेणोपरिगमनाभ्यनुज्ञां मृग्य- माणमिव दिवसकरेण, भूषणप्रभासमुत्सारणबद्धपर्यन्तमण्डलेन प्रद- क्षिणीक्रियमाणमिव¹ दिवसेन, अप्रणमद्भिर्गिरिभिरपि² दूयमानं, शौर्यो- ष्मणा फेनायमानमिव चन्दनधवलं लावण्यजलधिमुद्वहन्तमेकराज्यो- र्जित्येन, निजप्रतिबिम्बान्यपि नृपचक्रचूडामणिधृतान्यसहमानमिव दर्पदुःखासिकया चामरानिलनिभेन बहुधेव श्वसन्तीं राजलक्ष्मीं दधानम्, स कयाचिदालिङ्गयेत । विषमोऽशक्यीनुष्ठानो नतोन्नतरूपः । मार्गो व्यवहारः, पन्थाश्च । विषमे पथि च स्खलति येन क्वचित्सुलग्नेन भूयते । लब्धवाचेति । सत्यस्य वागेवाश्रयणीयश्च । सर्वैस्त्यक्तः सम्भीतः संस्त्वां, त्यजामीति वाचं लब्ध्वान्यं सेवते, वारविलासिनी शरीरोपचारचतुरा मुख्यललनाप्रतिविम्बम् । दशभिरिति । नखानां दिशां च दशसंख्याकत्वात् । मणिपादेति । मणिसंबन्ध- प्रतिष्ठानमेव पोषयति । करो हस्तोऽपि । फेनायमानमिति । जल संतापेन सफेनं उन्होंने असिधाराव्रत लिया था फिर भी वे सदा एकान्त रहने वाले (अविसंवादी) राजर्षि थे। टेढ़े-मेढ़े राजमार्ग (राजा के पद) पर पैर फिसलने के भय से मानों उन्होंने धर्म का आश्रय लिया था। मानों सत्य दूसरे राजाओं से तिरस्कृत होकर डरते-डरते वचन लेकर सब प्रकार से उन्हीं की सेवा में तत्पर था। पास में खड़ी वेश्या (चामरग्राहिणी) की परछाइयाँ उनके चरण के नखों पर पड़ रही थीं, मानों दशो दिशायें शरीर धारण करके उनको प्रणाम कर रही हों। वे दूर तक लम्बे दृष्टिपात से मानो लोकपालों की गलती सही देख रहे थे। सूर्य की किरणें उनके मणिमय पादपीठ पर पड़ रही थीं मानों वह आकाश में दूर जाने के लिए सम्राट् की अनुमति पाने की इच्छा से प्रार्थना कर रहा था। आभूषणों की प्रभा से उनके चारों ओर मंडल-सा बन गया था मानो दिन उनकी प्रदक्षिणा कर रहा हो। शौर्य के दर्प से वे न झुकने वाले पर्वतों से कष्ट का अनुभव करते थे। वह उस चन्दन के सदृश उज्ज्वल लावण्य के समुद्र को धारण कर रहे थे जो उनके एकाधिपत्य के बड़े शौर्य के प्रताप से खौलकर फेनिल हो रहा था। दर्प के कारण अपने ही प्रतिबिम्बों को जो राजाओं की चूड़ा- मणियों में पड़ रहे थे, सहन नहीं कर पाते थे। चँवर की हवा के बहाने बार-बार सांस १. मिव गळितोष्मणा दिवसेन । २. भूभृद्भिर्दूयमानं ।

सकलमिव चतुःसमुद्रलावण्यमादायोत्थितया श्रिया समुपश्लिष्टम्, आभरणमणिकिरणप्रभाजालजायमानानीन्द्रधनुःसहस्राणीन्द्रप्राभृतप्रहितानि विलभमानमिव राज्ञां संभाषणेषु परित्यक्तमपि मधु वर्षन्तम्, काव्यकथास्वपीतमप्यमृतमुद्वमन्तम्, विश्रम्भभाषितेष्वनाकृष्टमपि हृदयं दर्शयन्तम्, प्रसादेषु निश्चलामपि श्रियं स्थाने स्थाने स्थापयन्तम्, वीरगोष्ठीषु पुलकितेन कपोलस्थलेनानुरागसंदेशमिवोपांशु रणश्रियः शृण्व- न्तम्, अतिक्रान्तसुभटकलहालापेषु स्नेहवृष्टिमिव दृष्टिमिष्टे कृपाणे पातय- न्तम्, परिहासस्मितेषु गुरुप्रतापभीतस्य राजकस्य स्वच्छमाशयमिव दशनांशुभिः कथयन्तम्, सकललोकहृदयस्थितमपि न्याये तिष्ठन्तम्,


नवति । असहमानमिवेति । कथं सामान्येन समान इति । सकलमित्यादि । सकल- पदेन चतु.शब्देन च शौरेरस्य विशेषमाह । ततो लवणत्वस्य तत्राद्यापि शिष्यमा- णत्वात् । अलं लावण्यमादाय । एकस्माच्च समुद्रादुत्थाय लक्ष्म्या शौरिः समुप- श्लिष्टः । लावण्यं लवणता; सौन्दर्यं च। प्राभृतं ढौकनिकम्। मधु मद्यम्, अमृतं च । विश्रम्भ विश्वासः । उपांश्वप्रकटम् । अतिक्रान्ते कलहे रणे शस्त्राणां स्नेहो दीयते रुधिरादिसलिलनिवारणाय । स्वच्छं निर्मलम् , सुप्रसादमाशयं भावं, प्रकृष्टतापभी- तस्य च स्वच्छो निर्मल आशयो जलाधारो दृश्यते । अत्र प्रतापेत्यादि प्रकरणसाह- चर्यात्स्वच्छतान्यथानुपपत्त्या च जलशब्द बिना जलाशय एव प्रतीयते । न्याये तिष्ठन्तम् । न्यायममुञ्चन्तमित्यर्थः । यः सर्वेषां हृदयस्थितः स एकस्मिन्नेव तिष्ठ-


छोड़ती हुई राजलक्ष्मी को धारण कर रहे थे, मानो चारों समुद्रों के सम्पूर्ण लावण्य को लेकर निकली हुई श्री ने उनका आलिंगन किया था। उनके आभरणों की प्रभा से हजारों इन्द्रधनुष बन गए थे, मानो उपहार के रूप में इन्द्र ने भेजा हो। राजाओं के साथ बातचीत के प्रसंग में छूटे हुए भी मधु ( मदिरा अथवा मधुर रस ) की मानो वर्षा कर रहे थे। कविता की गोष्ठियों में न पिये हुए अमृत को भी मानो उगल रहे थे। विश्रंभालाप करते हुए अपने अनाकृष्ट हृदय को मानों दिखा रहे थे। प्रसन्न होकर स्थान-स्थान में अपनी निश्चल श्री को भी अर्पित कर रहे थे। वीरगोष्ठियों में उनके कपोल रोमांच से भर आये थे मानों एकांत में रणश्री द्वारा भेजे गये अनुरागसंदेश को सुन रहे थे। बड़े-बड़े योद्धाओं के युद्धों की बातचीत के प्रसंगों में अपने प्रिय कृपाण पर मानो स्नेह की वर्षा की भांति दृष्टिपात कर रहे थे। हँसी-मजाक में मुस्कुराते हुए वे अपने प्रचण्ड प्रताप से भीत राजाओं के प्रति दाँत की किरणों से अपने स्वच्छ मनोभाव को व्यक्त कर रहे थे । सारे जन-समूह के हृदय में स्थित होकर भी न्याय पर स्थित थे। उनमें

१२२ Digitized by Arya Samaj Fहर्षचरितम्Chennai and eGangotri अगोचरे गुणानामभूमौ सौभाग्यानामविषये वरप्रदानानामशक्य आशि- षाममार्गे मनोरथानामतिदूरे देवस्यादिश्युपमानानामसाध्ये धर्मस्या- दृष्टपूर्वे लक्ष्म्या महत्त्वे स्थितम्, अरुणपादपल्लवेन सुगतमन्थरोरुणा वज्रायुधनिष्ठुरप्रकोष्ठपृष्ठेन वृषस्कन्धेन भास्वद्विम्बाधरेण प्रसन्नावलो- कितेन चन्द्रमुखेन कृष्णकेशेन वपुषा सर्वदेवतावतारमिवैकत्र दर्शयन्तम्, अपि च मांसलमयूखमालामलिनितमहीतले महति महार्हे माणिक्य- मालामण्डितमेखले महानीलमये पादपीठे कलिकालशिरसीव सलीलं विन्यस्तवामचरणम्, आक्रान्तकालियफणाचक्रवालं बालमिव पुण्ड- रीकाक्षम्, क्षौमपाण्डुरेण चरणनखदीधितिप्रतानेन प्रसरता महीं महादेवीपट्टबन्धेनेव महिमानमारोपयन्तम्, अप्रणतलोकपालकोपेने- तीति विरोधः । अरुणो लोहितः, अनूरुश्च । शोभनं गमनं ययोस्तौ मन्थरावूरू यस्य । बुद्धश्च सुगतः । वज्राख्यमायुधं तद्वन्निष्ठुरं कठोरं प्रकोष्ठस्य पृष्ठं यस्य तेन । इन्द्र- श्वाम्य वज्रमायुधम् । 'प्रकोष्ठमन्तरं विद्यादरत्निमणिबन्धयोः' । वृषो दान्तः, धर्मश्च । भास्वद्भास्वरम्; रविश्च भास्वान् । बिम्बं फलभेदः, मण्डलं च । अवलोकितं वीक्षि- तम्, बुद्धिभेदश्चावलोकितः । कृष्णः कालः, हरिश्च कृष्णः । कलिकालइति । कलि- कालस्य मलिनत्वादेवमुत्प्रेक्षा । वामपादेन पराभवनीयत्वमेव पोष्यते । कालियो लक्ष्मी का उत्कर्ष था जो गुणों का अगोचर, सौभाग्य का अभूमि, वरदान का अविषय, आशी- र्वचनों का अशक्य, मनोरथों का अमार्ग, भाग्य से भी अतिदूर, उपमानों का अविषय एवं धर्म का असाध्य था। अपने शरीर से समस्त देवताओं के अवतार को प्रकट कर रहे थे, उनके पादपल्लव अरुण (लाल, सूर्य का सारथी अरुण), सुगत (बुद्ध) अर्थात् सुन्दर गमन करने वाले और मन्दगामी दोनों ऊरु, हाथ के गट्टे वज्र के समान (वज्रायुध = इन्द्र) कड़े, वृष (बैल, धर्म) के समान कंधे, चमकते हुए (भास्वत् = सूर्य) बिम्बाधर, दृष्टिपात (अवलो- कितेश्वर) प्रसन्न, चन्द्र के सदृश मुख एवं केश काले (कृष्ण) थे। इन्होंने अपना बायाँ पैर महानील मणि के विशाल, बहुमूल्य, स्थूल प्रभाजाल से पृथ्वी को कलित करने वाले एवं माणिक्यसमूह से मण्डित मध्यभाग वाले पादपीठ पर मानों कलिकाल के सिर पर रखा था। अथवा वे बालक श्रीकृष्ण के सदृश थे जिन्होंने कालिया नाग के फनों पर आक्र- मण किया था। क्षौम वस्त्र के समान उनके चरणों के नखों की रश्मियाँ फैलती थीं मानो पृथिवी को पट्टबंध द्वारा राजमहिषी के पद पर प्रतिष्ठित कर रहे थे। सम्राट् के दोनों चरण प्रणत न होने वाले लोकपालों पर क्रोध के कारण मानो अत्यन्त लाल थे। समस्त नरपतियों के मुकुटों में अधिक पान किये हुए पद्मराग मणि की प्रभा को मानो वमन कर रहे थे, CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

द्वितीय उच्छ्वासः १२३ वातिलोहितौ सकलनृपतिमौलिमालास्वतिपीतं पद्मरागरत्नातपमिव वमन्तौ सर्वतेजस्विमण्डलास्तमयसंध्यामिव धारयन्तावशेषराजककुसुम- शेखरमधुरसस्रोतांसीव स्रवन्तौ समस्तसामन्तसीमन्तोत्तंसस्रक्सौरभ- भ्रान्तभ्रमरमण्डलैरमित्रोत्तमाङ्गैरिव मुहूर्तमप्यविरहितौ संवाहनतत्परायाः श्रियो विकचरक्तपङ्कजवनवासभवनानीव कल्पयन्तौ जलजशङ्खमीन- मकरसनाथतलतया कथितचतुरम्भोधिभोगचिह्नाविव चरणौ दधा- नम्, दिङ्नागदन्तमुसलाभ्यामिव विकटमकरमुखप्रतिबन्धबन्धुराभ्यामु- द्धेललावण्यपयोधिप्रवाहाभ्यामिव फेनाहितशोभाभ्यां कलाचन्दनद्रुमा- भ्यामिव भोगिमण्डलशिरोरत्नरश्मिरञ्जयमानमूलाभ्यां हृदयारोपितभूभार- धारणमाणिक्यस्तम्भाभ्यामूरुदण्डाभ्यां विराजमानम्, अमृतफेनपिण्ड- पाण्डुना मेखलामणिमयूखखचितेन नितम्बबिम्बव्यासङ्गिना विमल- पयोधौतेन नेत्रसूत्रनिवेशशोभिनाधरवाससा वासुकिनिर्मोकेणेव मन्दरं द्योतमानम्, अघनेन सतारागणेनोपरिकृतेन द्वितीयाम्बरेण भुव- नागभेदः । पुण्डरीकाक्षमिवि राज्ञी विशेषणम् । तेजस्विनो वीराः, आदित्याश्च । जलजेत्यादीनि महाराजविशेषणानि लक्षणानि । एवमादि च संभवति । मकर- मुखं जानुसंधिः, मकरमुखचिह्नित्तान्तकपोलश्च । उद्वेलतया लावण्यस्य समुच्छ- लद्रूपत्वमाह । फेनो रससंतानः, डिण्डीरश्च । भोगिनो नृपाः, सर्पाश्च । फेनवत्तैश्च पाण्डु । मेखला रशना, पर्वतमध्यभूमिश्च । पयो जलम्, क्षीरं च । नेत्रसूत्रं पट्टसूत्रम्, मन्थनरज्जुश्च । अघनेन, छातेन, अनभ्रेण च । ताराः सूत्रबिन्दवः नक्ष- समस्त तेजस्वियों (वीरों अथवा आदित्यों) के अस्त हो जाने के कारण मानो संध्या को धारण कर रहे थे, समस्त राजाओं के सिर की पुष्परचित माला के मधुरस के प्रवाह को मानो बहा रहे थे, समस्त सामन्तों के केशविन्यास की माला की सुगन्ध में लुभाए हुए भौंरे शत्रुओं के सिर के रूप में मानो क्षणभर भी इन चरणों को नहीं छोड़ते; सेवा में लीन लक्ष्मी के निवास के लिए खिले हुए लाल कमलों के भवनों को मानो बना रहे थे, तलवे में कमल, शंख, मछली और मकर के चिह्न थे जिनसे व्यक्त होता था कि उन्होंने चारों समुद्रों के उपभोग के चिह्नों को प्राप्त किया था। उनकी जांघें दिग्गज के दंतरूपी मुसलों के समान थीं, उद्वेल लावण्य के समुद्र के दो प्रवाहों की भाँति विशाल मकरमुखों (जानुसन्धियों, पक्ष में मकर के मुखों) के प्रति- बन्ध के कारण निम्नोन्नत, फेर से शोभित थीं एवं चन्दन के वृक्षों की भांति भोग-मण्डल (धनिकसमूह वृक्ष में सर्पसमूह) के सिर के रत्नों की किरणों से जिनका मूल भाग रंजित हो रहा था तथा सम्राट् के हृदय पर आरोपित पृथ्वी के भार के धारण के लिए माणिक्य-स्तम्भ थीं।

१२४ हर्षचरितम् नाभोगमिव भासमानम्, इभपतिदशनमुसलसहस्रोल्लेखकठिनमसृणे- नापर्याप्ताम्बरप्रथिम्ना विविधवाहिनीसंक्षोभकलकलसंमर्दसहिष्णुना कैलास- मिव महता स्फटिकतटेनोरुणोरःकपाटेन विराजमानम्, श्रीसरस्वत्यो- रुरोवदनोपभोगविभागसूत्रेणेव पतितेन शेषेणेव च तद्भुजस्तम्भविन्यस्त- समस्तभूभारलब्धविश्रान्तिसुखप्रसुप्तेन हारदण्डेन परिवलितकन्धरम्। जीवितावधिगृहीतसर्वस्वमहादानदीक्षाचीरेणेव हारमुक्ताफलानां किरण- निकरेण प्रावृतवक्षःस्थलम्, अजजिगीषया बालैर्भुजैरिवापरैः प्ररोहद्भि- बर्हूपधानशायिन्याः श्रियाः कर्णोत्पलमधुरसधारासंतानैरिव गलद्भिर्भुज- जन्मनः प्रतापस्य निर्गमनमार्गैरिवाविर्भवद्भिररुणैः केयूररत्नकिरणदण्डै- रुभयतःप्रसारितमणिमयपक्षवितानमिव माणिक्यमहीधरम्, सकल- त्राणि च। अम्बरं वासः, नभश्च। इभपतीत्यादिना साधारणम्। अपर्याप्तमम्बरं वासो यस्य तादृक्प्रथिमा यस्य, अम्बरं च खम्। वाहिनी सेना, नदी च। अन्यपर्वतसाधारयेऽपि छायावत्त्वादुन्नतत्वाच्च कैलासमिवेत्युक्तम्। हारेत्यादिना उरुत्वं काठिन्यमाह। परिवलिता। ‘परिवेष्टिता—’ इति पाठे व्याप्तेत्यर्थः। अजो हरिः। भुजेत्यादिना सेनादिकृतं नयादिकृतं च प्रतापं व्यवच्छिनत्ति। माणिक्य- वासुकि सर्प केंचुल से मन्दर पर्वत की भांति वह अपने अधोवस्त्र से जो अमृत के फेनपिण्ड की भांति उज्ज्वल, मेखला की मणियों की किरणों से खचित, नितम्ब भाग से लगा हुआ, विमल जल से धुला हुआ, रेशम के पुटकों से शोभित (मकर के पक्ष में, अमृत के फेन पड़ने से उज्ज्वल मेखला भाग की मणिकिरणों से खचित, निर्मल क्षीण से धुला हुआ एवं मन्थनरज्जु के निवेश से शोभित) था शोभा प्राप्त कर रहे थे। ऊपर धारण किये गये, झीने (अघन) सूत्रबिन्दुओं से कड़े उत्तरीय वस्त्र से (पक्ष में घन अर्थात् मेघ से रहित, तारागण से युक्त) आकाश से भुवन के आभोग की भांति वे शोभित हो रहे थे। जैसे कैलास पर्वत का स्फटिक तट ऐरावत के दांतों के हजारों प्रहार से कठिन और चिकना हो गया है और आकाश के लिए जिसका विस्तार पर्याप्त नहीं एवं विविध नदियों के कोलाहलपूर्ण संमर्द को जो सहता है उसी प्रकार सम्राट् का विशाल उरःकपाट भी गजों के दशनों के घात-प्रतिघात से कठिन और कोमल वस्त्र, के लिए अपर्याप्त प्रथिमा युक्त एवं विविध सेनाओं के कोलाहल में भी क्षुब्ध न होने वाला था। उनका हारदंड कंधे से गिर कर लटक रहा था, मानों वह लक्ष्मी और सरस्वती के क्रम से वक्ष और मुख के उपभोग का विभाग-सूत्र रखा गया था, अथवा मानो शेषनाग सम्राट् की भुजाओं पर सारे पृथिवी के भार को रख कर विश्राम की नींद ले रहे हों। हार में पिरोई हुई मुक्ताओं की किरणें फैलकर उनके वक्ष में लिपट रही थीं मानो सम्राट् ने जो प्रति पांचवें वर्ष सर्वस्वदक्षिण महादान दिये हैं उन्हीं के दीक्षावस्त्र हों। उनके विजायठ के

[द्वितीय उच्छ्वासः] १२५

लोकालोकमार्गार्गलेन चतुरुदधिपरिक्षेपखातशातकुम्भशिलाप्राकारेण सर्वराजहंसबन्धवज्रपञ्जरेण भुवनलक्ष्मीप्रवेशमङ्गलमहामणितोरणेनाति- दीर्घदोर्दण्डयुगलेन दिशां दिक्पालानां च युगपदायतिमपहरन्तम्, सोदर्यलक्ष्मीचुम्बनलोभेन कौस्तुभमणेरिव मुखावयवतां गतस्याधरस्य गलत्ता रागेण पारिजातपल्लवरसेनेव सिञ्चन्तं दिङ्मुखानि, अन्तरान्तरा सुहृत्परिहासस्मितैः प्रकीर्यमाणविमलदशनशिखाप्रतानैः प्रकृतिमूढाया राजश्रियः प्रज्ञालोकमिव दर्शयन्तम्, मुखजनितेन्दुसन्देहागतानि कुमुदिनीवनानीव प्रेषयन्तम्, स्फुटस्फटिकधवलदशनपङ्किकृतकुमुद- वनशङ्काप्रविष्टां शरज्ज्योत्स्नामिव विसर्जयन्तम्, मदिरामृतपारिजात- गन्धगर्भेण भरितसकलककुभा मुखामोदेनामृतमथनदिवसमिव सृज-


मुत्कृष्टो मणिः। चतुर्णामुदधीनां संबन्धी परिक्षेप एव खातं परिखा यस्य स ताह- ग्दाढार्चाच्छिलाप्राकार इव तेन। परिखां कृत्वान्तरे प्राकारो दीयते इति स्थितिः।


रत्नों की दण्डाकार अरुण किरणें उनके दोनों ओर फैल रही थीं मानो चतुर्भुज विष्णु को जीतने की इच्छा रखने वाले सम्राट् के दो और हाथ उद्भिन्न हो रहे हों, अथवा विष्णुमुल्य सम्राट् की भुजाओं को उपधान बनाकर सोने वाली लक्ष्मी के कर्णोत्पल का मधुरस धारारूप में प्रवाहित होकर चू रहा हो, अथवा मानो उनकी भुजाओं से उत्पन्न होने वाले प्रताप के निकलने के लिए मार्ग आविर्भूत हो रहे हों, इस प्रकार वे उन किरणदंडों से मणिमय पक्षवितान को फैलाये हुए माणिक्यपर्वत के समान थे। वे अपने दोनों अतिदीर्घ भुजदण्डों से दिशाओं के विस्तार और दिक्पालों के प्रताप को एक काल में हर ले रहे थे, मानो उनके वे भुजदण्ड समस्त लोकालोक पर्वत के मार्ग के अर्गलादंड हों, मानो चारो समुद्र के घेरे की खाई में सुवर्ण चट्टानों को जोड़कर बनाये गये प्राकार हों; समस्त राजसमूहरूपी हंसों के रहने के लिए वज्रमय पिंजड़े हों; भुवनलक्ष्मी के प्रवेश के अवसर पर मंगलार्थ लगाये जाने वाले बड़े- बड़े मणिमय तोरण हों। मानो उनका कौस्तुभमणि के समान अधर अपनी बहन लक्ष्मी को चूमने के लिए मुख का अवयव बन गया हो; ऐसे अधर से पारिजात-पल्लव के रस के समान द्रवित होते हुए राग से मानो वे दिशाओं को सींच रहे थे। बीच-बीच में मित्रों के साथ हँसी मजाक के प्रसङ्ग में सम्राट् हँस पड़ते थे तो उनके दांतों की निर्मल किरणें चारों ओर फैल जाती मानो प्रकृतिमूग्धा राजलक्ष्मी को प्रज्ञा का आलोक दिखा रहे हों अथवा उन किरणों के रूप में मुख को चन्द्र समझ कर पहुँचे हुए कुमुदवनों को मानो वे लौटा रहे थे, स्फटिक के समान जड़े हुए दांतों को कुमुदवन समझ कर प्रविष्ट हुई शारदी ज्योत्स्ना को मानो वापस कर रहे थे। उनके मुख से मदिरा, अमृत और पारिजात के मुखवास की मिली हुई सुगन्ध

१२६ Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri हर्षचरितम्

न्तम्, विकचमुखकमलकर्णिकाकोशेनानवरतमापीयमानश्वाससौरभमि- वाधोमुखेन नासावंशेन, चक्षुषः क्षीरस्निग्धस्य धवलिम्ना दिङ्मुखान्यपूर्वं- वदनचन्द्रोदयोद्वेलक्षीरोदोत्प्लावितानीव कुर्वाणम्, विमलकपोलफलकप्रति- बिम्बतां चामरग्राहिणीं विग्रहिणीमिव मुखनिवासिनीं सरस्वतीं दधानम्, अरुणेन चूडामणिशोचिषा सरस्वतीर्ष्याकुपितलक्ष्मीप्रसादनलग्नेन चरणालक्तकेनेव लोहितायत ललाटतटम्, आपाटलांशुतन्त्रीसंतानवल- यिनीं कुण्डलमणिकुटिलकोटिबालवीणामनवरतचलितचरणां वादय- तामुपवीणयतामिव स्वरव्याकरणविवेकविशारदम्, श्रवणावतंसमधुकर- कुलानां कलक्व णितमाकर्णयन्तम्, उत्फुल्लमालतीमयेन राजलक्ष्म्याः कचग्रहलीलालग्नेन नखज्योत्स्नावलयेनेव मुखशशिपरिवेषमण्डलेन मुण्ड-


राजहंसा राजोत्तमाः, हंसेभेदाश्च । आयतिदैर्घ्यम्, प्रतापरथ । कर्णिका कोशः, चक्रं च । आपीयमानं श्वाससौरभं यस्य तम् । अधोमुखेनेति । अनेन सुलक्ष्यत्वं सौरभस्य तथाऽऽपीयमानानुकृति दर्शयति । अंशुरेव तन्त्रीसंतानः स एव वलया- कारत्वाद्वलयं विद्यते यस्यास्ताम् । कुण्डलमणिकुटिलकोटिमेव बालवीणां सप्त- तन्त्रीकां विपञ्चीं वादयताम् । अनवरतेत्यादिना व्यापारसादृश्येनोक्तम् । वद- ( वादय ) तामिति । वीणायोपगायतामुपवीणयतामिति गानस्य प्राधान्यं प्रतिपा-


समस्त दिशाओं में भर गई थी मानो अमृतमथन के दिन को बना रहे थे । सम्राट् का खिले हुए मुख कमल के बीजकोश के सदृश अधोमुख नासावंश था जिससे मानो वे निरन्तर सुगंध से भरी सांस ले रहे थे । क्षीर के समान स्निग्ध अपनी आंखों की सफेदी द्वारा अपूर्वमुखरूपी चन्द्र के उदित होने से उद्वेल क्षीरसमुद्र द्वारा मानो दिशाओं को उत्प्लावित कर रहे थे । उनके निर्मल कपोलफलक पर समीप में खड़ी चामरग्राहिणी (चंवर डुलाने वाली स्त्री) प्रति- बिम्बित हो रही थी मानो शरीरिणी होकर मुख में निवास करने वाली सरस्वती को वे धारण कर रहे थे । उनके चौड़े ललाट पर चूडामणि की अरुण किरणें छिटक रही थीं, मानो सरस्वती की ईर्ष्या से कुपित हुई लक्ष्मी के प्रसादन के लिए पैर पड़ते हुए इनके ललाट पर उसका आलता लग गया हो । उनके कर्णावतंस पर बैठकर भौंरे कुण्डलमणि की बाल वीणा के लाल- वर्ण वाले किरणरूपी तारों पर स्वर का विस्तार और विवेक करते हुए अव्यक्त-मधुर जो गा रहे थे उसे वे ध्यान से सुन रहे थे । उनके बालों में मुंडमाला बंधी थी जिसमें खिले हुए मालती के फूल थे, मानो कचग्रह के अवसर पर राजलक्ष्मी के नखों की कुछ किरणें वहाँ फँस कर रह गई हों, वह उनके मुख-चन्द्र के चारों ओर परिधि थी । उनके शिखंडा-

द्वितीय उच्छ्वासः १२७ मालागुणेन परिकलितकेशान्तम्, शिखण्डाभरणभुवा मुक्ताफलालोकेन मरकतमणिकिरणकलापेन चान्योन्यसंवलनवृजिनेन प्रयागप्रवाहवेणिका- वारिणेवागत्य स्वयमभिषिच्यमानम्, श्रमजलविलोनबहलकृष्णागुरु- पङ्कतिलककलङ्ककल्पितेन कालिम्ना प्रार्थनाचाटुचतुरचरणपतनशत- श्यामिकाकिणेनेव नीलायमानललाटेन्दुलेखाभिः क्षुभितमानसोद्गतै- रुत्कलिकाकलापैरिव हारैरुल्लसद्भीरवष्टभ्यमानाभिर्विलासवलगनचटुलै- र्भूलताकल्पैरीर्ष्या श्रियमिव तर्जयन्तीभिरायामिभिः श्वसितैरविरल- परिमलैर्मलयमारुतमयैः पाशैरिवाकर्षन्तीभिर्विकटबकुलावलीवराटक- वेष्टितमुखैर्बृहद्भिः स्तनकलशैः स्वदारसंतोषरसमिवाशेषमुद्धरन्तीभिः


दयति । स्वरव्याकरणविशारदमित्यादिना गानं दर्शयति । परिवेषः परिधिः । वृजिनेन शकलेन, कलुषेण वा । प्रयागो गङ्गायमुनासंगमः । तत्प्रवाहस्य वेणिका- रूपेण वारिणेव । श्रमजलेत्यादौ वारविलासिनीभिः सर्वतो विलुप्यमानमसौभाग्य- मिवेति संबन्धः । प्रार्थनाचाट्वित्यादौ प्रार्थनादीनि सर्वाणि श्रीहर्षविषयाणि ज्ञेयानि । मानसं सरः, चेतश्च । उत्कलिका, रहुरुहिकाः, वीचयश्च । अविरले- त्यादिना धारणाम् आकर्षणं वशीकरणम्, समीपप्रमाणं च । विकटेत्यादिनोद्दीपनमा- त्रमेव पोषयति । वराटको रज्जुः । बृहद्भिरिति । बृहत्त्वेन हृद्यत्वमेषामाह । बृहत्त्वादेव च वक्ष्यति–अशेषमिति । स्तनकलशैरिति । कलशैः किल रज्जुवेष्टितमुखै रसो जलमु-


भरण में मोती और मरकत दोनों लगे थे, दोनों की किरणें परस्पर मिल कर उन पर पड़ रहा थीं, मानों प्रयाग से गङ्गा और यमुना के जल स्वयं आकर उनका अभिषेक कर रहे हों। वहां गणिकाएं थीं जो उनके सौभाग्य को सब प्रकार से लुप्त कर रही थीं। उन गणिकाओं के ललाट की चन्द्रलेखा पसीने से पसीज कर बहते हुए कृष्णागुरु के पङ्क के तिलक-कलंक के कारण काली पड़ गई थीं, मानों प्रिय वचन बोलकर प्रार्थना करने में चतुर होने के कारण सैकड़ों बार प्रिय के चरण पर सिर पटकने से वहां दाग पड़ गया हो। उनके वक्ष पर हार उल्लसित हो रहे थे मानों वे उनके उथल-पुथल होते हुए मानस की वीचियाँ हों। वे इस प्रकार विलास के साथ अपनी भौंहें मटकाती थीं मानों ईर्ष्या से लक्ष्मी को तर्जना दे रही हों। मलयानल की तरह निरन्तर निकलती हुई सुगन्धित लम्बी सांसें लेतीं तो मालूम होता कि साँसों की डोर से कुछ खींच रही हों। बकुलमाला की लम्बी-लम्बी डोर से उनके स्तन- रूपी वृहत् कलश बँधे हुए थे जिनसे अपनी पत्नियों में होने वाले सम्राट् के समस्त संतोष-रस को मानो वे रिक्त कर रही थीं। हांफने से हिलते हुए उनके स्तन पर हार की तरह मणियों की किरणों से मानो वे सम्राट् के हृदय को खींच कर हठात् अपने में प्रविष्ट कर रही थीं।

कुचोत्कम्पिकाविकारप्रेङ्खितानां हारतरलमणीनां रश्मिभिराकृष्य हृदय- मिव हठात्प्रवेशयन्तीभिः प्रभामुचामाभरणमणीनां मयूखैः प्रसारितै- र्बहुभिरिव बाहुभिरालिङ्गन्तीभिर्जृम्भानुबन्धबन्धुरवदनारविन्दावरणी- कृतेरुत्तानैः करकिसलयैः सरभसप्रधावितानि मानसानीव निरुन्धती- भिर्मदनान्धमधुकरकुलकीर्यमाणकर्णकुसुमरजःकणकूणितकोणानि कुसुम- शरशरनिकरप्रहारमूर्च्छामुकुलितानीव लोचनानि चतुरं संचारयन्ती- भिरन्योन्यमत्सरादाविर्भवद्भङ्गुरभ्रुकुटिविभ्रमक्षिप्तैः कटाक्षैः कर्णेन्दी- वराणीव ताडयन्तीभिरनिमेषदर्शनसुखरसराशिं मन्थरितपक्ष्मणा चक्षुषा पीतमिव कोमलकपोलपालीप्रतिबिम्बितं वहन्तीभिरभिलाषलीलानि- र्निमित्तस्मितैश्चन्द्रोदयानिव मदनसहायकाय संपादयन्तीभिरङ्गभङ्गवल- नाच्चोन्यघटितोत्तानकरवेणिकाभिः स्फुटनमुखराङ्गुलीकाण्डकुण्डलो- क्रियमाणनखदीधितिनिवहनिभेनाकिंचित्करकामुकार्मुकाणीव रुषा भञ्ज- दघ्रियते । रसोऽभिलाषः, जलं च । बन्धुरं हृद्यम् । कूणितः संकोचितः । मदनादि- शब्दे विद्यमानेऽपि मदनान्धेत्यभिप्रायेण कुसुमशरग्रहणम् । अत्र पक्षे कर्णपदं त्य- ज्यते । अनिमेषदर्शनसुखरसराशिमिव श्रीहर्षम् । प्रतिबिम्बितमिति । अथ च रसो जलादिः विमले मणिमाजनादावन्तर्वर्त्यपि प्रतिबिम्बितो लक्ष्यते । करवेणिका उनके चमचमाते हुए आभूषणों की किरणें इस प्रकार फैल रही थीं मानो वे सम्राट् के आलि- ङ्गन के लिए अनेक भुजाएँ पसार रही हों। जंभाई लेते हुए अपने उत्तान हाथों से मुँह ढँक कर मानो वे वेग से निकल भागते हुए अपने चित्त को रोक रही थीं। कामांध भौरों द्वारा विकीर्ण किये गये कान के पराग कणों से वे अपनी आंखों के कोने संकुचित कर लेतीं, मानो वे आंखें कामदेव के बाणों के प्रहार के कारण मूर्च्छा से मुंद गई हों, उस प्रकार वे अपनी आंखें चतुरता से चला रही थीं। आंखों से परस्पर मत्सर के कारण भौंहें पेंच कर छोड़े गए कटाक्षों से मानो अपने कर्णोत्पलों का ताड़न कर रही हों। सम्राट् के निरन्तर दर्शन- सुख की राशि जिसे उन्होंने अपनी निश्चल आंखों से पी रखा था मानो उनके कपोल पर प्रतिबिम्बित हो रही थी। मानो काम की सहायता करने के लिए अभिलाषाओं के कुतूहल से निर्निमित्त हँसी हँसकर बहुत से चन्द्रों को उदित कर रही थीं। कभी-कभी अपने अङ्गों को तोड़-मरोड़ करते हुए हाथों की उँगलियां एक दूसरे में फंसाकर हथेली ऊपर उठा रही थीं। उँगलियां चटका कर नखों की किरणों को कुण्डलाकार बनाते हुए मानों काम की निकम्मी धनुहियों को क्रोध से तोड़ रही थीं। चरण दबाने वाली को,

[Header] द्वितीय उच्छ्वासः १२१

न्तीभिर्वारविलासिनीभिर्विलुप्यमानसौभाग्यमिव सर्वतः, स्पर्शांस्विन्न- वेपमानकरकिसलयगलितचरणारविन्दां चरणग्राहिणीं विहस्य कोणेन- लीलालसं शिरसि ताडयन्तम्, अनवरतकरकलितकोणतया चात्मनः प्रियां वीणामिव श्रियमपि शिक्षयन्तम्, निःस्नेह इति धनैः, अनाश्रयणीय इति दोषैः, निग्रहरुचिरितीन्द्रियैः, दुरुपसर्प इति कलिना, नीरस इति व्यसनैः, भीरुरित्ययशसा, दुर्ग्रहचित्तवृत्तिरिति चित्तभुवा, स्त्रीपर इति सरस्वत्या, षण्ढ इति परकलत्रैः, काष्ठामुनिरिति यतिभिः, धूर्त इति वेश्याभिः, नेय इति सुहृद्भिः, कर्मकर इति विप्रैः, सुसहाय इति परस्परानुबन्धस्थितकराद्वयांगुलिविन्यासः। विलुप्यमानसौभाग्यादिना ताः सुभगा इत्यर्थः। कोणो वीणादिवादनमाण्डम्। प्रियामिति। वीणायाः श्रियाश्च विशेषणम्। निःस्नेह इत्यादौ। एतैरेकमप्यनेकधा गृह्यमाणमिति सम्बन्धः। षण्ढः प्रजनन- क्षमः। काष्ठा पराधारा, तत्प्रधानो मुनिः काष्ठामुनिरतिशयवांस्तपस्वी। नेयः परवशः। शन्तनुर्नाम राजा भीष्मस्य पिता, वाहिन्या गङ्गायाः पतिः, अयं तु तस्मादपि महतीनां वाहिनीनां सेनानां पतिः शन्तनुुरिति। 'पञ्चमी विभक्ते' इति पञ्चमी। भीष्मो जितकाशी जितेन्द्रियः। यतस्त्वयि त्वत्पुत्रे वा सत्यस्मद्दोहित्रस्य कुतो राज्यमिति। यदा हि दशाधिपतिना स्वसुता मत्स्योदरोद्गता मत्स्यावती नामास्मै पित्रर्थमर्थ्यते न दत्ता, तदैतेन प्रतिज्ञातम्—'नाहं राज्यं विवाहं वा करिष्यामि' इति। अत एव ब्रह्मचार्येवाभूत्। राजा च ततोऽपि जितकाशितमः जितकाशी वा। जितेन जयेन काशते शोभते यः। तथा हि भीष्मेण रामो जितः। सर्वराजसहितं काशिराजं च जित्वा भ्रात्रर्थमम्बादिकन्यात्रयमनेषीत्। राजा तु जो अपने हाथों को सम्राट् के स्पर्श से पसीज जाने और कांपने के कारण उनके चरणों पर गिरती जा रही थी, हँसकर लीला में शनैः शिर पर वीणादण्ड द्वारा ताडन कर रहे थे। निरन्तर वे अपने वीणादण्ड को अपने हाथ में लिए रहते थे, इस प्रकार अपनी प्रिया वीणा के समान मानों श्री को भी शिक्षा दे रहे थे। धन उन्हें समझते कि इनमें हमारे प्रति स्नेह कुछ भी नहीं; दोष कहते हैं कि हमारे ये आश्रय के योग्य नहीं हैं; इन्द्रियाँ कहतीं कि सम्राट् हमें निगृहीत रखना चाहते हैं; कलि कहता है कि इनके समीप जाना कठिन है; व्यसन कहते कि ये नीरस हैं; अयश चिल्लाता कि सम्राट् डरपोक हैं; काम समझता कि इनकी चित्तवृत्ति दुर्गृह है; सरस्वती कहती कि ये स्त्रैण हैं; परकीया स्त्रियाँ कहतीं कि ये नपुंसक हैं; यती लोग कहते हैं कि ये पहुँचे हुए तपस्वी हैं; वेश्याएँ उन्हें धूर्त कहतीं; सुहृद्वर्ग कहता कि ये नेय हैं अर्थात् इनकी बुद्धि दूसरों पर निर्भर रहती है, ब्राह्मण कहते कि ये हमारे भृत्य हैं; शत्रु कहते कि बहुत से दूसरे इनके सहायक हैं। इस प्रकार एक ही सम्राट् को लोग अनेक प्रकार से ९ ह०

१३० हर्षचरितम् शत्रुयोधैः, एकमप्यनेकधा गृह्यमाणम्, शन्तनोर्महावाहिनीपतिम्, भीष्माज्जितकाशितमम्, द्रोणाच्चापलालसम्, गुरुपुत्रादमोघमार्गणम्, कर्णान्मित्रप्रियम्, युधिष्ठिराद्बहुक्षमम्, भीमादनेकनागायुतबलम्, धनञ्जयान्महाभारतरणयोग्यम्, कारणमिव कृतयुगस्य, बीजमिव विबुधसर्गस्य, उत्पत्तिद्वीपमिव दर्पस्य, एकागारमिव करुणायाः, प्रातिवेशिकमिव पुरुषोत्तमस्य, खनिपर्वतमिव पराक्रमस्य, सर्वविद्या- संगीतगृहमिव सरस्वत्याः, द्वितीयामृतमन्थनदिवसमिव लक्ष्मी- समुत्थानस्य, बलदर्शनमिव वैदग्ध्यस्य, एकस्थानमिव स्थितीनाम्, सर्वस्वकथनमिव कान्तेः, अपवर्गमिव रूपपरमाणुसर्गस्य, सकलदुश्च- रितप्रायश्चित्तमिव राज्यस्य, सर्वबलसन्दोहावस्कन्दमिव कन्दर्पस्य, ततोऽपि जितकाशितमः। द्रोणश्चापाचार्यः। स हि चापे धनुषि लालसः। चापलं न करोतीत्यर्थः। यद्वा चः समुच्चये। अपगता लालसा यस्य सोऽपलालसः। निर- मिलाष इत्यर्थः। गुरुपुत्रोऽश्वत्थामा तस्य सफलशरता। तथा शस्त्रोपसंहारे- ऽक्षमतया याचितोऽपि कस्यचिदेकस्य मारणमन्तरेण न तदुपसंजहार। तत उत्तराया उदरस्थे परिक्षिति पाटिते तस्मिस्तदुपसंहृतवान्। अन्यत्र-अमोघा मार्गणा याचका यस्येति। मित्रः सूर्यः सुहृच्च मित्रम्। क्षमा क्षान्तिः भूश्च। अनेकानि बहूनि, अनन्यसदृशानि च। एकशब्दस्य च साधारणार्थं नन् । बलं सामर्थ्यम्, सैन्यं च। धनञ्जयोऽर्जुनः। महाभारतानां कुरुणां यो रणः संग्रामः। अन्यत्र- महती भारस्य कार्यधुरायास्तरणं निर्वाहणम्। प्रातिवेशिकं प्रतिबिम्बम्। 'खनि राकरः। अपवर्गः समाप्तिः। सन्दोहः समूहः। अवभृथो यज्ञान्तः। गम्भीरं प्रसन्नं चेति परस्परापेक्षं बोद्धव्यम्। तथा च सति गम्भीरत्वे प्रसन्नत्वम् ऋजुत्वं चेन्न स्यात्तत ग्रहण करते थे। शन्तनु केवल वाहिनीपति (अर्थात् गंगा के पति) थे, (उनकी अपेक्षा ये सम्राट् महावाहिनी (अर्थात् महासेना) के पति थे। भीष्म की अपेक्षा वे अधिक जितेन्द्रिय थे। द्रोण की अपेक्षा वे अधिक चापलालस (अर्थात् धनुष के प्रेमी अथवा चपलता से शून्य या निरभिलाष) थे। अश्वत्थामा की अपेक्षा वे अधिक बाण चलाने में निपुण (अमोघमार्ग) थे। कर्ण की अपेक्षा अधिक वे अपने मित्रों के प्रिय थे। युधिष्ठिर की अपेक्षा अधिक क्षमावान् थे अथवा विस्तृत पृथिवी के स्वामी थे। भीम की अपेक्षा अधिक हाथियों का उनमें बल था। अर्जुन की अपेक्षा अधिक वे महाभारत के युद्ध के योग्य थे, अथवा कार्य के बड़े बोझ को सम्हालने में निपुण थे। मानों वे सतयुग के कारण, विद्वानों की सृष्टि के बीज, दर्प के उत्पन्न होने के द्वीप, कल्याण के एकागार, पुरुषोत्तम, विद्या के पड़ोसी; पराक्रम की

द्वितीय उच्छ्वासः १३१ उपायमिव पुरन्दरदर्शनस्य, आवर्तनमिव धर्मस्य, कन्यान्तःपुरमिव कला- नाम्, परमप्रमाणमिव सौभाग्यस्य, राजसर्गसमाप्त्यवभृथस्नानदिवस- मिव सर्वप्रजापतीनाम्, गम्भीरं च, प्रसन्नं च, त्रासजननं च, रमणीयं च, कौतुकजननं च, पुण्यं च, चक्रवर्त्तिनं हर्षमद्राक्षीत् । दृष्ट्वा चानुगृहीत इव निगृहीत इव साभिलाष इव तृप्त इव रोमाञ्च- मुचा मुखेन मुञ्चन्नानन्दबाष्पवारिबिन्दून्दूरादेव विस्मयस्मेरः सम- चिन्तयत्—'सोऽयं सुजन्मा, सुगृहीतनामा, तेजसां राशिः, चतुरुदधि- केदारकुटुम्बी, भोक्ता ब्रह्मस्तम्भफलस्य, सकलादिराजचरितजयज्येष्ठ- जिह्वाप्रकृतित्वं प्रसज्येत । एवं त्रासेत्यादौ बोद्धव्यम् । तथा च कालिदासः ‘भीम- कान्तैर्नृपगुणैः स बभूवोपजीविनाम् । अधृष्यश्चाभिगम्यश्च यादोरत्नैरिवाणंवः ॥’ इति दिलीपं प्रति वर्णितवान् । कौतुकजननपुण्यत्वादपि संभाव्यते । अत आह— पुण्यमिति । गम्भीरं च प्रसन्नं चेत्यादौ सर्वत्र विरोध उद्भाव्यः । गम्भीरं सतमिस्त्रं प्रसन्नं निर्मलं न भवतीति । अनुगृहीत इवेत्यादि । एवंविधमहोपतिप्रसादवशात् । निगृहीत इवेति । संकोच- वशात् । साभिलाष इवेति । तस्य दर्शनीयत्वात् । तृप्त इवेति । तथैव तस्य कृतार्थ- त्वात् । विरोधी ह्यत्र सुबोधः । केदारं क्षेत्रम् । ब्रह्मस्तम्भं जगत् । फलं रत्नादिः । यच्च स्तम्भस्य फलं धान्यादिः तद्भोक्ता कर्षको भवति, राजन्वती प्रशस्तराज्ययुता । खान वाले पर्वत, सरस्वती की समस्त विद्या वाला संगीतकभवन, लक्ष्मी के हृदय का दूसरा अमृतमन्थनदिवस, विदग्धता के बल का दर्शन, मर्यादाओं के एक ही स्थान, कान्ति के सर्वस्व- कथन, रूपपरमाणुओं की सृष्टि के मोक्ष, राज्य के समस्त दुश्चरितों के प्रायश्चित्त, काम के सारे बलों के सहित आक्रमण, इन्द्र के दर्शनार्थ उपाय, धर्म के आवर्तन, कलाओं के कुमारी अन्तःपुर और सौभाग्य के परम प्रमाण थे। समस्त प्रजापतियों ने मानो उन्हीं का निर्माण करके राजाओं की सृष्टि का यज्ञ समाप्त कर अन्त में अवभृथस्नान कर लिया। इस प्रकार हर्ष गम्भीर, हँसमुख, भय उत्पन्न करने वाले और रमणीय, आह्लाद उत्पन्न करने वाले और पवित्र थे। सम्राट् हर्ष को देखकर अनुगृहीत, निगृहीत साभिलाष और तृप्त की भाँति अपने उद्गत रोमाञ्च वाले मुख से आनन्द के अश्रुकणों को छोड़ता हुआ बाण दूर ही से आश्चर्योत्फुल्ल हो सोचने लगा—ये ही शोभन जन्मवाले, सुगृहीतनामा, तेजोराशि, चार समुद्रों से घिरे पृथ्वी के क्षेत्र के स्वामी, जगत् के रत्नादि फलों का उपभोग करने वाले एवं समस्त प्राचीन ।

मल्लो देवः परमेश्वरो हर्षः। एतेन च खलु राजन्वती पृथिवी। नास्य- हरेरिव वृषविरोधीनि बालचरितानि, न पशुपतेरिव दक्षजनोद्वेगकारीण्ये- श्वर्यविलसितानि, न शतक्रतोरिव गोत्रविनाशपिशुनाः प्र वादाः, न यमस्येवातिवल्लभानि दण्डग्रहणानि, न वरुणस्येव निस्त्रिंशग्राहसहस्र- रक्षिता रत्नालयाः, न धनदस्येव निष्फलाः सन्निधिलाभाः, न जिनस्ये- वार्थवादशून्यानि दर्शनानि, न चन्द्रमस इव बहुलदोषोपहताः श्रियः।

वृषो धर्मः, अरिष्टासुरो दान्तरूपश्च। बालेति। बाला हि विवेकहीनत्वादधर्मविरुद्धमा- चरन्ति। अस्य तु तस्यामपि दशायां धर्मविरोधाभावः। दक्षः कुशलः प्रजापति- भेदश्च। महेश्वरपक्ष ऐश्वर्यशब्दो मुख्यवृत्तिः, इतरत्र गौणः। गोत्रं कुलम्, कुल- पर्वताश्च गोत्राः। अतिवल्लभानीति। अतिशब्देन युक्तदण्डत्वमाह। दण्डः करः, यमा- युधं च। निस्त्रिंशग्राहाः खड्गहस्ताः, अन्यत्र, जलचरभेदाश्च। रत्नालया भाण्डा- गाराणि, समुद्राश्च। निष्फला ऐश्वर्यादिफलप्राप्तिशून्याः, दानादिविनाकृताश्च। सन्निधिः सन्निधानम्। एतस्य दर्शनं सर्वस्य फलदायि भवतीत्यर्थः। अन्यत्र-संनि- धयः शोभनानि निधनान्यस्य। दर्शनानि जिनस्येव नार्थवादशून्यानि। अर्थो धनं तस्य वादः, अनेनेदं लब्धमिति, तेन शून्यानि। सर्वे तद्दर्शिनोऽर्थेन युज्यते। जिनस्य पुनरर्थवादशून्यानि महायानयोगाचारमाध्यमिकदर्शनानि। बहुलाः प्रभूता दोषा रागाद्याः, बहुलदोषाश्च कृष्णपक्षरात्रयः। श्रियः समृद्धयः, शोभाश्च।

राजाओं के चरितों को जीतने वाले, ज्येष्ठ मल्लदेव परमेश्वर (सम्राट्) हर्ष हैं। इनसे धरती राजन्वती है (अर्थात् प्रशस्त राजा से युक्त है)। विष्णु के समान इनके ऐसे बालचरित नहीं जिनमें वृष (अर्थात् धर्म, विष्णुपक्ष में अरिष्टासुर) का विरोध हो। इनके पशुपति शिव के समान ऐसे ऐश्वर्य के विलास नहीं, जिनसे दक्षजनों (चतुर जन, शिवपक्ष में दक्षप्रजापति) के मन में जरा भी उद्वेग हो। इन्द्र के समान इनके विषय में ऐसा कोई प्रवाद नहीं कि ये गोत्रों (कुलों, इन्द्रपक्ष में कुलपर्वतों) का विनाश कर डालते हैं। यम के समान दण्ड-ग्रहण (कर लेना, यमपक्ष में दण्डनामक आयुध का ग्रहण) इन्हें अतिप्रिय नहीं। ये वरुण के समान अपने रत्नालयों (रत्न के खजाने, वरुणपक्ष में समुद्र) की रक्षा हजारों की संख्या में तैनात निस्त्रिंशग्राह (खड्गधारी सैनिक, वरुणपक्ष में जलचारी खूंखार जीव) द्वारा नहीं करते, जैसे कुबेर का सन्निधान प्राप्त करना निष्फल अर्थात् ऐश्वर्य आदि फलों से रहित एवं प्राप्ति से शून्य है उसी प्रकार इनका सन्निधान फलशून्य नहीं। जैसे बुद्ध के दर्शन (महायान के योगाचार और माध्यमिक दर्शन) सर्वथा अर्थवाद (प्राशस्त्यमूलक वाक्य) से शून्य हैं, वैसे ही इनके दर्शन धन की प्राप्ति के वचनों से शून्य नहीं। चन्द्र जैसे बहुलदोष (कृष्ण

द्वितीय उच्छ्वासः १७३ चित्रमिदमर्त्यमरं राजत्वम् । अपि चास्य त्यागस्यार्थिनः, प्रज्ञायाः शास्त्राणि, कवित्वस्य वाचः, सत्त्वस्य साहसस्थानानि, उत्साहस्य व्यापाराः कीर्तेर्दिङ्मुखानि, अनुरागस्य लोकहृदयानि, गुणगणस्य संख्या, कौशलस्य कला, न पर्याप्तो विषयः । अस्मिंश्च राजनि यतीनां योग- पट्टकाः, पुस्तकर्मणां पार्थिवविग्रहाः, षट्पदानां दानग्रहणकलहाः, वृत्तानां पादच्छेदाः, अष्टापदानां चतुरङ्गकल्पना, पन्नगानां द्विजगुरुद्वेषाः, वाक्य- विदामधिकरणविचाराः, इति समुपसृत्य चोपवीती स्वस्तिशब्दमकरोत् । पर्याप्तः परिपूर्णः । योगपट्टका यतीनामुपकरणं पर्यङ्कबन्धनाथम् । ते यतीनां चतुर्था- श्रमिणामेव, न पुनर्योगेन युक्ताः पट्टकाः कूटप्रधानानि लेख्यपत्राणि केषांचित् । एवमन्यत्रापि । पुस्तकर्म लेप्यम् । पार्थिवविग्रहा मृन्मयशरीराणि, राजभिः सह वैराणि च । दानग्रहणं मदजलं दानम्, ऋणव्यवहारश्च । वृत्तानां गुरुलघुनियमात्म- कानां । समाश्च समविषमाणां पादच्छेदा भागविरामाः, चरणकर्त्तनानि च । अष्टा- पदानां चतुरङ्गफलकानाम् । 'चत्वार्य्यङ्गानि सेनाया हस्त्यश्वरथपत्तयः' तेषां कल्पना रचना, चतुर्णामङ्गानां पाणिपादस्य च छेदः । द्विजगुरुर्गरुडोऽपि । वाक्य- विदां मीमांसकानामधिकरणविश्रान्तिस्थानानि । राज्ञां च धर्मनिर्णयस्थानानि । अधिकबलो वा रणः संग्राम इति केचित् । उपवीती दक्षिणावीती करः । उक्तं च— 'उद्धृते दक्षिणे पाणावुपवीत्युच्यते द्विजः' इति । पक्ष की रातों) में क्षीण हो जाता है उस प्रकार के रोग आदि बहुरु दोषों के कारण आहत या समृद्धिहीन नहीं हुए । देवताओं से भी बढ़ा चढ़ा इनका प्रभुत्व है यह देखकर आश्चर्य होता है । और भी—इनका त्याग इतना है कि पर्याप्त याचक नहीं मिलते, इनकी प्रज्ञा इतनी है कि शास्त्र के विषय पर्याप्त नहीं, कवित्व के सामने वाण, बल के सामने साहस का स्थान, उत्साह के सामने व्यापार, गुणों के सामने संख्या और कौशल के सामने कला आदि पर्याप्त विषय नहीं ठहरते । इनके शासन में यति लोग ही ( पर्यङ्कबन्ध आदि आसन में) योगपट्ट नामक वस्त्रविशेष धारण करते थे, ( न कि इनके राज्य में जाली बनाए हुए ताम्रपत्र थे ) । इनके शासन में मूर्तियां ही मिट्टी की बनाई जाती है ( न कि परस्पर पार्थिवविग्रह अर्थात् राजाओं के साथ लड़ाई-झगड़े होते हैं) । भौंरे ही (हाथियों के) दानजल के ग्रहण में झगड़ते (याचक लोग दान लेने के अवसर पर नहीं झगड़ते हैं) वृत्त अर्थात् छन्दों के ही चरण में सम-विषम या भाग और विराम आदि छेद होते (न कि किसी पाप-विशेष के होने से पैर काट लिए जाते थे) । शतरंज के खेल में ही सेना के चार अङ्ग हस्ती-अश्वरथ-पैदल की कल्पना है ( न कि अपराधी के दोनों हाथ और दोनों पैर काट लिए जाते हैं) सर्प ही द्विजगुरु (गरुड) से द्वेष रखते हैं (न कि प्रजा के

१३४ हर्षचरितम् अथोत्तरे नातिदूरे राजधिष्ण्यस्य गजपरिचारको मधुरमपरवक्त्र- मुच्चैरगायत्— 'करिकलभ विमुञ्च लोलतां चर विनयव्रतमानताननः । मृगपतिनखकोटिभङ्गुरो गुरुरुपरि क्षमते न तेऽङ्कुशः' ॥ राजा तु तच्छ्रुत्वा दृष्ट्वा च तं गिरिगुहागतसिंहबृंहितगम्भीरेण स्वरेण पूरयन्निव नभोभागमपृच्छत्—'एष स बाणः ?' इति । 'यथाऽऽज्ञापयति देवः । सोऽयम्' इति विज्ञापितो दौवारिकेण 'न तावदेनमकृतप्रसादः पश्यामि' इति तिर्यङ्नीलधवलांशुकधारां तिरस्करिणीमिव भ्रमयन्न- पाङ्गनीयमानतरलतारकस्यायामिनीं चक्षुषः प्रभां परिवृत्य प्रेष्ठस्य पृष्ठतो गजपरिचारक इति । अन्यगजपरिचारकस्य स्वजातिसमुचितं वस्तु राज्ञोः प्रकृतस्मारकं जातम् । तत्र करिणां स्वभावत एव रागित्वादस्यापि रागवत्त्वाद् भुजङ्गता स्मृतिः सञ्जातेति । भंगुरो वक्रः । मृगपतिनखकोटिभङ्गुर इति । स्पष्टा व्याख्या । गुरुर्भारः, शासिता च । उपरि पृष्ठदेशे प्रभुभावे च अंकुश इवांकुश इत्यपि । अत आह—तच्छ्रुत्वेति । बृंहितं गर्जितम् । अंशव एवांशुकः । अंशुकं च लोग ब्राह्मण और गुरु से द्वेष करते हैं ) मीमांसक लोग ही अधिकरणों अर्थात् भिन्न-भिन्न प्रकरणों में विचार-विमर्श करते हैं, (न कि धर्मनिर्णय के स्थान-फौजदारी और दीवानी की अदालतें लगती थी) यह सोच बाण ने समीप जाकर दाहिना हाथ उठा 'स्वस्ति' शब्द का उच्चारण किया । उसी समय उत्तर दिशा की ओर राजभवन के कुछ ही दूर पर किसी महावत ने मधुर अपवक्त्र को ऊँचे स्वर में गाया— 'अरे हाथी के बच्चे, तू अपनी चंचलता छोड़ दे, सिर नीचा करके विनय का व्रत ले । यह अङ्कुश जो शेर के नखाग्र के समान टेढ़ा और कठोर है, तेरे ऊपर क्षमा नहीं करेगा ।' उसे सुनकर हर्ष ने बाण को ओर देखा और पर्वत की कन्दरा में बैठ कर दहाड़ते हुए सिंह की आवाज के समान गम्भीर स्वर से नभोभाग को मानो भरते हुए पूछा—'वही यह बाण है ?' तब दौवारिक ने निवेदन किया 'देव का कथन सत्य है, ये वही हैं ।' 'मैं जब तक यह मेरे प्रसाद का पात्र नहीं होगा तबतक इसे नहीं देखूँगा' (यह कह कर ) तिर्यक् नील-धवल वस्त्रवाली तिरस्करिणी (जवनिका) की भाँति अपाङ्ग तक पहुँचाए गए तरल तारक वाले नेत्र की फैलने वाली प्रभा को घुमा कर पीठ की ओर बैठे हुए

द्वितीय उच्छ्वासः १३५ निषण्णस्य मालवराजसूनोरकथयत्—'महानयं भुजङ्गः' इति। तूष्णीं- भावेन त्वगमितनरेन्द्रवचसि तस्मिन्मूके च राजलोके मुहूर्तमिव तूष्णीं स्थित्वा बाणो व्यज्ञापयत्—'देव ! अविज्ञाततत्त्व इव, अश्रद्दधान इव, नेय इव, अविदितलोकवृत्तान्त इव च कस्मादेवमाज्ञापयसि ? स्वैरिणो विचित्राश्च लोकस्य स्वभावाः प्रवादाश्च । महद्भिस्तु यथार्थ- दर्शिभिर्भवितव्यम् । नार्हसि मामन्यथा संभावयितुमविशिष्टमिव । ब्राह्मणोऽस्मि जातः सोमपायिनां वंशे वात्स्यायनानाम् । यथाकाल- मुपनयनाद्याः कृताः संस्काराः । सम्यक्पठितः साङ्गो वेदः । श्रुतानि च यथाशक्तिः शास्त्राणि । दारपरिग्रहादभ्यगारिकोऽस्मि । का मे भुजङ्गता । वस्त्रम् । तिरस्करिणी जवनिका । प्रेष्ठस्यातिप्रियस्य । नेयः परवशः । स्वैरिणः स्वतन्त्राः । सोमपायिनां सोमपानाम् । 'शिक्षा कल्पो व्याकरणं ज्योतिषं निरुक्तं छन्दोविचितिः' इति षडङ्गानि वेदस्य । अभ्यागारिको गृहस्थः, सम्यग्वृत्तिस्थितो वा । का मे भुजङ्गतेति । का मे भुजंगता शृङ्गारित्वम् । कामे मदने भुजंगता ज्ञेया, न माहृशेषु । नहि मे काचिद्भुजं बाहुं गता प्राप्तेत्यर्थः । लोकद्वयेत्यादिना त्रिवर्ग- स्यानुपघातं दर्शयति । शास्त्रविरोधप्रसङ्गात् । 'शतायुर्वै पुरुषः' कालमन्योन्यानु- परमप्रिय मालवराज के पुत्र से कहा—'यह भारी भुजंग (गुण्डा या लम्पट) है।' मालवराज के पुत्र तो चुप रहे। उन्हें हर्ष की बात समझ में न आई और राजसमूह भी सुनकर गुम हो गया। तब क्षण भर चुप रह कर बाण बोला—'हे देव, आप इस प्रकार की बात क्यों ऐसे कहते हैं जैसे आपको मेरे विषय में सच्ची बात पता न हो, या मेरा विश्वास न हो, आपकी बुद्धि दूसरों पर निर्भर रहती हो, अथवा आप स्वयं लोक के वृत्तान्त से अनभिज्ञ हों। लोगों के स्वभाव और फैली हुई बातें मनमानी और तरह- तरह की होती हैं। किन्तु श्रेष्ठजनों को ठीक-ठीक देखना चाहिए। मुझे साधारण-सा समझ कर अनाप-सनाप कल्पना न कीजिए। सोमपान करने वाले वात्स्यायन ब्राह्मणों के वंश में मैं जन्मा हूँ । समय से मेरे यज्ञोपवीत आदि संस्कार हुए हैं। मैंने अङ्गों के साथ वेदों का सम्यक् प्रकार से स्वाध्याय किया है। अपनी शक्ति के अनुसार शास्त्रों का भी श्रवण किया है। विवाह करके नियमित गृहस्थ हूँ। तो मुझ में क्या भुजंगपना है ? † मेरा † का मे भुजङ्गता—मेरे जीवन में कौन-सी ऐसी बात है जिसे भुजंगता कही जाय ? भुजंगता उस व्यक्ति में रहती है जो कामी है, मुझमें नहीं, मैंने किसी स्त्री में भुजंगता नहीं की अर्थात् अपनी भुजाओं में आलिंगन नहीं किया। अथवा भुजंगता तो काम (मदन) में होती है न कि मुझ-जैसे में।

१३६ हर्षचरितम् लोकद्वयाविरोधिभिस्तु चापलैः शैशवशून्यमासीत् । अत्रानपला- पोऽस्मि । अनेनैव च गृहीतविप्रतीसारमिव मे हृदयम् । इदानीं तु सुगत इव शान्तमनसि मनाविव कर्तरि वर्णाश्रमव्यवस्थानां समवर्तिनीव च साक्षाद्दण्डभृति देवे शासति सप्ताम्बुराशिरशनाशेषद्वीपमालिनीं महीं क इवाविशङ्कः सर्वव्यसनबन्धोरविनयस्य मनसाप्यभिनयं कल्पयिष्यति । आस्तां च तावन्मानुष्यकोपेताः । त्वत्प्रभावादलयोऽपि भीता इव मधु पिबन्ति । रथाङ्गनामानोऽपि लज्जन्त इवाभ्यनुवृत्तिव्यसनैः प्रियाणाम् । कपयोऽपि चकिता इव चपलायन्ते । शरारवोऽपि सानुक्रोशा इव श्वाप- दगणाः पिशितानि भुञ्जते । सर्वथा कालेन मां ज्ञास्यति स्वामी स्वयमेव । अनपाचीनचित्तवृत्तिग्राहिण्यो हि भवन्ति प्रज्ञावतां प्रकृतयः' इत्यभिधाय तूष्णीमभूत् । भूपतिरपि 'एवमस्माभिः श्रुतम्' इत्यभिधाय तूष्णीमेवा- भवत् । संभाषणआसनदानादिना तु प्रसादेन नैनमन्वग्रहीत् । केवलममृत- बद्धं परस्परस्यानुपघातेन त्रिवर्गं सेवत इत्यत एवाह-शैशवमिति । अशून्यमिति । अनेन तदेकासक्तत्वं परिहरति । अनपलापो निरपह्नवः । विप्रतीसारः पश्चात्तापः । सुगतो बुद्धः । समवर्ती यमः । मनुष्यस्य भावो मानुष्यकम् । रथाङ्गनामानश्चक्र- वाकाः चपलायन्ते चपलत्वमाचरन्ति । शरारवो हिंस्राः । श्वापदगणाः प्राणि- समूहाः । पिशितं मांसम् । अनपाचीनाऽमृष्टा । अविपरीतेत्यर्थः, निर्दोषा वा । शैशव लोक-परलोक से विरोध न रखने वाली चपलताओं से शून्य नहीं था। मैं इस सम्बन्ध में अपलाप नहीं करता। इसी कारण मेरे हृदय में पश्चात्ताप है। किन्तु इस समय जब कि भगवान् बुद्ध के समान शान्तचित्त, मनु के समान, वर्णाश्रम-मर्यादा के रक्षक और यम के समान साक्षात् दण्डधर आप सातों समुद्रों को करधनी और समस्त द्वीपों की माला से विराजित पृथिवी का शासन कर रहे हैं। तो कौन ऐसा निडर है जो सब प्रकार से दुःखद अविनय का मन से भी अभिनय करे? मनुष्यों की तो बात जाने दीजिये, आपके प्रभाव से भौंरे भी डरते-डरते मधुपान करते हैं, चक्रवात पक्षी भी अपनी पत्नी के प्रति अतिशय आसक्तिरूप व्यसन से लज्जित होते हैं, वानर भी शंकित होकर चपलता करते हैं, हिंसक जानवर भी दयावान् होकर पश्चात्ताप करते हुए मांस का भक्षण करते हैं। समय से स्वयं आप मेरे विषय में जान लेंगे, क्योंकि बुद्धिमानों का यह स्वभाव होता है कि वे किसी बात में भी विपरीत हठ नहीं रखते।' इतना कह कर बाण चुप हो गए। सम्राट् भी 'मैंने ऐसा ही सुना था' बस इतना ही कह चुप हो गए। लेकिन परस्पर बात-चीत, आसनदान आदि के प्रसाद से

द्वितीय उच्छ्वासः

वृष्टिभिः स्नपयन्निव स्नेहगर्भेण दृष्टिपातमात्रेणान्तर्गतां प्रीतिमकथयत्। अस्ताभिलाषिणि च लम्बमाने सवितरि विसर्जितराजलोकोऽभ्यन्तरं प्राविशत्। बाणोऽपि निर्गत्य धौतारकूटकोमलातपत्विषि निर्वाति वासरे, आस्ता- चलकूटकिरीटे निचुलमञ्जरीभांसि तेजांसि मुञ्चति वियन्मुचि मरी- चिमालिनि, अतिरोमन्थमन्थरकुरङ्गकुटुम्बकाध्यास्यमानअदिष्ठगोष्ठीन- पृष्ठास्वरण्यस्थलीषु, शोकाकुलकोककामिनीकूजितकरुणासु तरङ्गिणीतटेषु वासविटपोपविष्टवाचाटचटकचक्रवालेष्वालवालावर्जितसेकजलकुटेषु नि- ष्कुटेषु, दिवसविहृतिप्रत्यागतं प्रस्रुतस्तनं स्तनंधये धयति धेनुवर्गमुद्गतक्षीरं क्षुधिततर्णकव्राते, क्रमेण चास्तधराधराधातुधुनीपूरप्लावित इव लोहिताय- मानमहसि मज्जति सन्ध्यासिन्धुपानपात्रे पातङ्गे मण्डले, कमण्डलुजल-

बाणोऽपीत्यादौ । बाणोऽप्यस्मिन्सति निवासस्थानमगादिति संबन्धः । 'रीतिः स्त्रियामारकूटम्' इत्यमरः । निर्वाति शाम्यति । निचुलो वेतसवृक्षः । भुक्तोद्गीर्णा- हारचर्वणं रोमन्थः । अदिष्ठं मृदुतमम् । गोष्ठीपूर्वं गोष्ठोनम् । 'गोष्ठात्तञ्चभूतपूर्वे' । उक्तं च—'गोष्ठं गोस्थानकं तत्तु गोष्ठीनं भूतपूर्वकम्' इति । कोकाश्चक्रवाकाः । तरङ्गिणी नदी । आलवालमावापः । कुटा घटाः । निष्कुटाः स्वगृहारामाः । स्तन-

उसे अनुगृहीत नहीं किया। केवल स्नेह से भरे अमृत की वर्षा करने वाले दृष्टिपातमात्र से उसको जैसे नहलाते हुए उन्होंने अपने अन्तरतम की प्रीति प्रकट की। जब सूर्य अस्ताचल की ओर लटकने लगे तब राजसमूह विसर्जित कर महल के अन्दर चले गये। बाण भी वहाँ से निकल कर अपने निवासस्थान स्कन्धावार में लौट आया। ढलते हुए दिन के आतप का तेज साफ-सुथरे पीतल के समान मन्द पड़ गया। अस्ताचल के मुकुट सूर्य वेतस की मंजरी जैसे अपने तेजसमूह की छोड़कर आकाश से हट रहे थे। वनभूमियों के मुलायम स्थानों में झुण्ड के झुण्ड मृग बैठकर धीरे-धीरे पँगुरी करने लगे। नदियों के तटों पर प्रियाविरह से शोकाकुल होकर चक्रवाक की पत्नियां करुण आवाज में टर्राने लगीं। गृह के पास वाले उपवनों में चटक नामक छोटे-छोटे पक्षी पेड़ों पर बैठ कर चहचहाने लगे और वृक्ष के थलों में सींचने के काम में आने वाले घड़े औंधा कर रख दिए। दिन भर चरने के बाद शाम को टहल कर आई हुई दुधार गायों के स्वयं उत्पन्न क्षीर वाले स्तन को उनके बछड़े चुभलाने लगे। क्रम से अस्ताचल की गेरू आदि धातुओं के झरनों में डुबकी लगाने से लाल

१३८ हर्षचरितम् शुचिशयचरणेषु चैत्यप्रणतिपरेषु पाराशरिषु, यज्ञपात्रपवित्रपाणौ प्रकीर्ण- बर्हिष्युत्तेजसि जातवेदसि हवींषि वषट्कुर्वन्ति यायजूकजने, निद्राविद्राण- द्रोणणकुलकलिलकुलायेषु कापेयविकलकपिकुलेष्वारामतरुषु निर्जिगमि- षति जरत्तरुकोटरकुटीकुटुम्बिनि कौशिककुले, मुनिकरसहस्रप्रकीर्णसन्ध्या- वन्दनोदबिन्दुतिकर इव दन्तुरयति तारापथस्थलीं स्थवीयसि तारकानि- कुरुम्बे अम्बराश्रयिणि शर्वरीशबरीशिखण्डे खण्डपरशुकण्ठकाले कव- लयति बाले ज्योतिः शेषं सान्ध्यमन्धकारावतारे, तिमिरतर्जननिर्गतासु दहनप्रविष्टदिनकरकरशाखास्विव स्फुरन्तीषु दीपलेखासु, अररसम्पुटसंकी- ऽडनकथितावृत्तिष्विव गोपुरेषु, शयनोपजोषजुषि जरतीकथितकथे शिश- यिषमाणे शिशुजने, जरन्महिषमषीमलीमसतमसि जनितपुण्यजन प्रजा- न्धयस्तर्णकश्च वत्सः । धुनी नदी । सिन्धुः समुद्रः । शयः करः । चैत्यमायतनम् । पाराशरिषु भिक्षुषु । हवींषि कुशाः । वषडिति दानक्रियासु मोचनमन्त्रः वषट् कुर्वन्ति । जुह्वतीत्यर्थः । यायजूकोऽत्यर्थं यजनशीलः । निद्राणोऽलसः । द्रोणः काकः । कलिला आकुलाः । 'कुलायो नीडमस्त्रियाम्' । कापेयं चापलम् । कौशिका उलूकाः । स्थवीयसि स्थूलतरे । शिखण्डो जूटकः । खण्डपरशुः शिवः । करा एव शाखास्तदाकारत्वादंगुलयश्च करशाखाः । अररः कपाटः । संक्रीडनं शब्दः । आवृत्तिः स्थगनम् । 'गोपुरं स्यात्पुरद्वारं द्वारमात्रेऽपि गोपुरम्' । उपजोषः सुखम्, तूष्णींभावो वा । जरती वृद्धाः । शिशयिषमाणे सुषुप्सति । 'यक्षाः स्युः पुण्य- होकर सूर्यसंध्या के समुद्ररूपी मधपात्र में डूबने लगा । भिक्षु लोग कमण्डलु के जल से अपने हाथ-पैर पवित्र धोकर चैत्यों की वन्दना करने लगे । स्रुक् स्रुवा आदि यज्ञपात्रों को हाथ में लेकर यज्ञ करने वाले लोग कुश को बिछा कर प्रज्ज्वलित अग्नि में वषट्कार के द्वारा हविष छोड़ने लगे । उपवन के वृक्षों पर नींद से अलसाए कौवे खोतों में काँव-काँव करने लगे और बन्दर अपनी चपलता छोड़ बैठे । पुराने खंखड़ वृक्षों में बैठे हुए उल्लू अब निकलना ही चाहते थे । झुग्गे के झुग्गे बड़े तारे आकाश की स्थली में छिटकने लगे, मानो सन्ध्यावन्दन के अवसर पर मुनियों द्वारा छींटे गए जल के बिन्दु हों। अब अन्धकार आकाश में उतरने लगा, मानों रात्रिरूपी भीलनी के केशपाश का जूड़ा हो, वह भगवान् शंकर के कण्ठ के समान श्याम था और सन्ध्या के बचे हुए तेज को निगलता जा रहा था। दीपलेखाएँ इस प्रकार स्फुरित होने लगीं मानों अग्नि में प्रविष्ट सूर्य की किरणरूपी अङ्गुलियाँ हों, जो अन्धकार के तर्जनार्थ निकल पड़ी थीं । गोपुर के दरवाजों के बन्द होने की गड़गड़ाहट अब शान्त हो गई। बच्चे खाट पर चुपचाप पड़े बूढ़ी दादी की कहानी

गरे विजृम्भमाणे भीषणतमे तमीमुखे, मुखरितविततसप्तभुक्तिकालवर्षति शरनिकरमनवरतमशेषसंसारशेमुषीमुषि मकरध्वजे, रताकल्पारम्भशो- भिनि शम्भलीसुभाषितभाजि भजति भूषां भुजिष्याजाने, सैरन्ध्रीबध्य- मानरशनाजालजल्पाकजघनासु जनीषु, वशिकविशिखाविहारिणीष्वन- न्यजानुप्लवासु प्रचलितास्वभिसारिकासु, विरलोभवति वरटानां वेशन्त- शायिनीनां मञ्जुनि मञ्जीरशिञ्जितजडे जल्पिते, निद्राविद्राणद्रा- घीयसि द्रावयतीव च विरहिहृदयानि सारसरसिते, भाविवासरबीजाङ्कुर- निकर इव च विकीर्यमाणे जगति प्रदीपप्रकरे निवासस्थानमगात्। अकरोच्च चेतसि—'अतिदक्षिणः खलु देवो हर्षः, यदेवमनेकबालचरित-


जनाः'। तमी रात्रिः। शेमुषी बुद्धिः। आकल्पो वेशः। शम्मली कुट्टनी। भुजिष्या दासी। सैरन्ध्री प्रसाधनोपचारज्ञा। जनी। वशिका शून्या। विशिखा रथ्या। अनन्यजः कामः। अनुप्लसवः सहायः। 'कान्तार्थिनी तु या याति संकेतं साभि- सारिका'। 'हंसस्य योषित्त्वरटा'। वेशन्तः पल्वलम्। कासारोऽत्यल्पसरः। मञ्जीरं


सुनते-सुनते ऊँघने लगे। बूढ़ी भैंस एवं स्याही की भाँति मलिन अन्धकार से युक्त रात्रि का अत्यन्त भयानक मुख (आरम्भ) जँभाई लेने लगा (बढ़ने लगा) और उसने पुण्यजनों (यक्षों) को जगा दिया। समस्त संसार की बुद्धि का अपहरण करने वाला कामदेव अपना धनुष चढ़ा कर टंकार भरने लगा और निरन्तर बाणों की वर्षा करने लगा। लौड़ियां सुरत काल की वेषरचना के आरम्भ से शोभित होने लगी एवं कुट्टनियों के उपदेश पाकर अलङ्कार धारण करने लगीं। वधुओं के जघन-भाग प्रसाधिकाओं द्वारा करधनी के बाँधे जाने पर मुखरित हो उठे। अभिसारिकायें काम की सहायता से सुनसान गलियों में पैंतरा मारने लगीं। ताल-तलैयों में शयन करने वाली हंसियों की नूपुर के समान मधुर आवाज कम पड़ने लगीं। निद्रा से अलसाए हुए सारस-पक्षियों की जोरदार आवाज विरहियों के हृदय को मानो पिघलाने लगीं। चारों ओर दीपक इस प्रकार जलने लगे मानो होने वाले दिन के बीजांकुर बिखेर दिये गये हों। और (बाण ने) मन में सोचा—"सचमुच देव हर्ष बड़े ही उदार हैं, क्योंकि मेरे बाल्यकाल की अनेक चपलताओं से फैले हुए जनापवाद को सुनकर कुपित होने पर भी मन में मुझ पर स्नेह ही रखते हैं। यदि मैं उनकी 'आँखों पर चढ़ा हुआ' (कोपभाजन) होता तो कैसे दर्शन देने की कृपा करते? वह मुझे गुणी देखना चाहते हैं। बड़े लोग अनुरूप विश्वास उत्पन्न करके बिना कुछ कहे भी आश्रित- जनों को विनय का उपदेश दे देते हैं। मुझे धिक्कार है कि अपने ही दोषों से अन्धा,