हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ हर्षचरितम् अथोत्तरे नातिदूरे राजधिष्ण्यस्य गजपरिचारको मधुरमपरवक्त्र- मुच्चैरगायत्— 'करिकलभ विमुञ्च लोलतां चर विनयव्रतमानताननः । मृगपतिनखकोटिभङ्गुरो गुरुरुपरि क्षमते न तेऽङ्कुशः' ॥ राजा तु तच्छ्रुत्वा दृष्ट्वा च तं गिरिगुहागतसिंहबृंहितगम्भीरेण स्वरेण पूरयन्निव नभोभागमपृच्छत्—'एष स बाणः ?' इति । 'यथाऽऽज्ञापयति देवः । सोऽयम्' इति विज्ञापितो दौवारिकेण 'न तावदेनमकृतप्रसादः पश्यामि' इति तिर्यङ्नीलधवलांशुकधारां तिरस्करिणीमिव भ्रमयन्न- पाङ्गनीयमानतरलतारकस्यायामिनीं चक्षुषः प्रभां परिवृत्य प्रेष्ठस्य पृष्ठतो गजपरिचारक इति । अन्यगजपरिचारकस्य स्वजातिसमुचितं वस्तु राज्ञोः प्रकृतस्मारकं जातम् । तत्र करिणां स्वभावत एव रागित्वादस्यापि रागवत्त्वाद् भुजङ्गता स्मृतिः सञ्जातेति । भंगुरो वक्रः । मृगपतिनखकोटिभङ्गुर इति । स्पष्टा व्याख्या । गुरुर्भारः, शासिता च । उपरि पृष्ठदेशे प्रभुभावे च अंकुश इवांकुश इत्यपि । अत आह—तच्छ्रुत्वेति । बृंहितं गर्जितम् । अंशव एवांशुकः । अंशुकं च लोग ब्राह्मण और गुरु से द्वेष करते हैं ) मीमांसक लोग ही अधिकरणों अर्थात् भिन्न-भिन्न प्रकरणों में विचार-विमर्श करते हैं, (न कि धर्मनिर्णय के स्थान-फौजदारी और दीवानी की अदालतें लगती थी) यह सोच बाण ने समीप जाकर दाहिना हाथ उठा 'स्वस्ति' शब्द का उच्चारण किया । उसी समय उत्तर दिशा की ओर राजभवन के कुछ ही दूर पर किसी महावत ने मधुर अपवक्त्र को ऊँचे स्वर में गाया— 'अरे हाथी के बच्चे, तू अपनी चंचलता छोड़ दे, सिर नीचा करके विनय का व्रत ले । यह अङ्कुश जो शेर के नखाग्र के समान टेढ़ा और कठोर है, तेरे ऊपर क्षमा नहीं करेगा ।' उसे सुनकर हर्ष ने बाण को ओर देखा और पर्वत की कन्दरा में बैठ कर दहाड़ते हुए सिंह की आवाज के समान गम्भीर स्वर से नभोभाग को मानो भरते हुए पूछा—'वही यह बाण है ?' तब दौवारिक ने निवेदन किया 'देव का कथन सत्य है, ये वही हैं ।' 'मैं जब तक यह मेरे प्रसाद का पात्र नहीं होगा तबतक इसे नहीं देखूँगा' (यह कह कर ) तिर्यक् नील-धवल वस्त्रवाली तिरस्करिणी (जवनिका) की भाँति अपाङ्ग तक पहुँचाए गए तरल तारक वाले नेत्र की फैलने वाली प्रभा को घुमा कर पीठ की ओर बैठे हुए