हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उच्छ्वासः १३५ निषण्णस्य मालवराजसूनोरकथयत्—'महानयं भुजङ्गः' इति। तूष्णीं- भावेन त्वगमितनरेन्द्रवचसि तस्मिन्मूके च राजलोके मुहूर्तमिव तूष्णीं स्थित्वा बाणो व्यज्ञापयत्—'देव ! अविज्ञाततत्त्व इव, अश्रद्दधान इव, नेय इव, अविदितलोकवृत्तान्त इव च कस्मादेवमाज्ञापयसि ? स्वैरिणो विचित्राश्च लोकस्य स्वभावाः प्रवादाश्च । महद्भिस्तु यथार्थ- दर्शिभिर्भवितव्यम् । नार्हसि मामन्यथा संभावयितुमविशिष्टमिव । ब्राह्मणोऽस्मि जातः सोमपायिनां वंशे वात्स्यायनानाम् । यथाकाल- मुपनयनाद्याः कृताः संस्काराः । सम्यक्पठितः साङ्गो वेदः । श्रुतानि च यथाशक्तिः शास्त्राणि । दारपरिग्रहादभ्यगारिकोऽस्मि । का मे भुजङ्गता । वस्त्रम् । तिरस्करिणी जवनिका । प्रेष्ठस्यातिप्रियस्य । नेयः परवशः । स्वैरिणः स्वतन्त्राः । सोमपायिनां सोमपानाम् । 'शिक्षा कल्पो व्याकरणं ज्योतिषं निरुक्तं छन्दोविचितिः' इति षडङ्गानि वेदस्य । अभ्यागारिको गृहस्थः, सम्यग्वृत्तिस्थितो वा । का मे भुजङ्गतेति । का मे भुजंगता शृङ्गारित्वम् । कामे मदने भुजंगता ज्ञेया, न माहृशेषु । नहि मे काचिद्भुजं बाहुं गता प्राप्तेत्यर्थः । लोकद्वयेत्यादिना त्रिवर्ग- स्यानुपघातं दर्शयति । शास्त्रविरोधप्रसङ्गात् । 'शतायुर्वै पुरुषः' कालमन्योन्यानु- परमप्रिय मालवराज के पुत्र से कहा—'यह भारी भुजंग (गुण्डा या लम्पट) है।' मालवराज के पुत्र तो चुप रहे। उन्हें हर्ष की बात समझ में न आई और राजसमूह भी सुनकर गुम हो गया। तब क्षण भर चुप रह कर बाण बोला—'हे देव, आप इस प्रकार की बात क्यों ऐसे कहते हैं जैसे आपको मेरे विषय में सच्ची बात पता न हो, या मेरा विश्वास न हो, आपकी बुद्धि दूसरों पर निर्भर रहती हो, अथवा आप स्वयं लोक के वृत्तान्त से अनभिज्ञ हों। लोगों के स्वभाव और फैली हुई बातें मनमानी और तरह- तरह की होती हैं। किन्तु श्रेष्ठजनों को ठीक-ठीक देखना चाहिए। मुझे साधारण-सा समझ कर अनाप-सनाप कल्पना न कीजिए। सोमपान करने वाले वात्स्यायन ब्राह्मणों के वंश में मैं जन्मा हूँ । समय से मेरे यज्ञोपवीत आदि संस्कार हुए हैं। मैंने अङ्गों के साथ वेदों का सम्यक् प्रकार से स्वाध्याय किया है। अपनी शक्ति के अनुसार शास्त्रों का भी श्रवण किया है। विवाह करके नियमित गृहस्थ हूँ। तो मुझ में क्या भुजंगपना है ? † मेरा † का मे भुजङ्गता—मेरे जीवन में कौन-सी ऐसी बात है जिसे भुजंगता कही जाय ? भुजंगता उस व्यक्ति में रहती है जो कामी है, मुझमें नहीं, मैंने किसी स्त्री में भुजंगता नहीं की अर्थात् अपनी भुजाओं में आलिंगन नहीं किया। अथवा भुजंगता तो काम (मदन) में होती है न कि मुझ-जैसे में।