हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
पृष्ठ 161, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उच्छ्वासः ११९ लोकम्, हरिचन्दनरसप्रक्षालिते तुषारशीकरशीतलतले दन्तपाण्डुरपादे शशिमय इव मुक्ताशैलशिलापट्टशयने समुपविष्टम्, शयनीयपर्यन्तविन्यस्ते समर्पितसकलविग्रहभारं भुजे, दिङ्मुखविसर्पिणि देहप्रभाविताने वितत- मणिमयूखे घर्मसमयसुभगे सरसीव मृदुमृणालजालजटिलजले सराजकं रम- माणम्, तेजसः परमाणुभिरिव केवलैर्निर्मितम्, अनिच्छन्तमपि बलदा- रोपयितुमिव सिंहासनम्, सर्वावयवेषु सर्वलक्षणैर्गृहीतम्, गृहीतब्रह्मचर्य- मालिङ्गितं राजलक्ष्म्या, प्रतिपन्नासिधाराधारणव्रतमविसंवादिनं राजर्षिम्, शशिमय इति वक्ष्यमाणाभिप्रायेण । तुषारेत्यादिना शीतत्वममुष्य दर्शयति । दन्ते तद्वच्च पाण्डुरे पादे । रश्मयोऽपि पादाः । मुक्तेत्यादिना शुक्लतयापि शशिमय इवेत्येतदेव पोषयति । विग्रहः कायः, रणश्च । घर्मेत्यादि । मणीनां स्वभावात एव शीतत्वात्तदीया मयूखा अपि ह्लादयन्ति । यो हि बलवानारोप्यते स सर्वाङ्गेषु गृह्यते । गृहीतब्रह्मचर्यमिति । स्वदारसंतुष्ट ऋतुकालगामी । 'गृहस्थोचितव्यापारो ब्रह्मचार्येव' इति श्रुतेः । यत्त्वेवमनुश्रूयते—'यावन्मया न सकला जिता भूमिस्ता- वन्मे ब्रह्मचर्यम्' इति श्रीहर्षः प्रतिज्ञातवान् । द्वादशभिश्च वर्षेर्जित्वा तां महिषीम- ब्रवीत्—'प्रतिज्ञा मे निर्व्यूढा' इति । ततो रोषात् 'अहमपि द्वादशवर्षं ब्रह्मचर्यं चरामि' इति सा प्रतिज्ञामकरोत् । इति ब्रह्मचर्येणाज्ञाकालोऽतिवाहितः । यश्च गृहीतब्रह्मचर्यः स कथं योषितालिङ्ग्यत इति विरोधः । असिधारा खड्गधारा, व्रतविशेषश्च । यत्र स्त्रीपुंसावकपटौ ब्रह्मचर्येण तिष्ठतः । यश्च प्रतिपन्नेषु विश्वा- सितेषु खड्गधारां पातयति स कस्मान्न विसंवदते; नान्यथा भवति कथं च राजर्षि- रसावुच्यत इति विरोधः । यश्च राजर्षिरुत्तममुनिर्गृहीतासिधारो ब्रह्मचारी च मुक्ताशैल की शिलाओं से निर्मित पट्टशयन पर, जो हरिचन्दन के रस से धुला हुआ, हिम के फुहारों से ठंडा, हाथीदांत के उज्ज्वल गोड़ों वाला एवं मानों चन्द्रमा को गढ़कर बना हुआ था, विराजमान थे । शयन के सिरे की ओर टिकी हुई भुजा पर वे सारे शरीर का भार डाले थे। उनके शरीर का प्रभा-वितान एवं मणियों का किरण जाल दिशाओं में फैल रहा था, मानों वे कोमल मृणालों से भरे तालाब में ग्रीष्म के समय उन राजाओं के साथ स्नान का आनन्द ले रहे थे, मानों केवल तेज के परमाणुओं से उनका निर्माण हुआ था। ऐसा लगता था कि उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें सिंहासन पर बैठने के लिए बाध्य किया गया था । उनके समस्त अंगों में सब के सब लक्षण दिखाई दे रहे थे । ब्रह्मचर्य ग्रहण करके भी राजलक्ष्मी से आलिङ्गित थे ।† † हर्ष ने राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद यह प्रतिज्ञा की थी कि जब तक मैं सम्पूर्ण भूमि को दिग्विजय न कर लूँगा तब तक ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा ।