भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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आयाततः कथमप्ययं स्मृतिपथं शून्येभवच्चेतसां नागेन्द्रः सहते न मानसगतानाशागजेन्द्रानपि ॥ तदेहि । पुनरप्येनं द्रक्ष्यसि । पश्य तावद्देवम्' इत्यभिधीयमानश्च तेन मदजलपङ्किलकपोलपट्टपतितां मत्तामिव मदपरिमलेन मुकुलितां कथमपि तस्माद् दृष्टिमाकृष्य तेनैव दौवारिकेणोपदिश्यमानवर्त्मा समतिक्रम्य भूपालकुलसहस्रसंकुलानि त्रीणि कक्षान्तराणि चतुर्थे मुक्तास्थानमण्ड- पस्य पुरस्तादजिरे स्थितम्, दूरादूर्ध्वस्थितेन प्रांशुना कर्णिकारगौरेण व्यायामव्यायतवपुषा शस्त्रिणा मौलेन शरीरपरिवारलोकेन पंक्ति- स्थितेन कार्तस्वरस्तम्भमण्डलेनेव परिवृतम्, आसन्नोपविष्टविशिष्टेष्ट-

देवाह—सहत इत्यादि । मानसं मनः, सरोभेदोऽपि । आशाः दिशः, अभिलाषोऽपि । देवमिति इत्यादौ । चक्रवर्तिनं हर्षमद्राक्षीदिति संबन्धः । मदजलेन पङ्किले कपोल- पट्टे पतिताम् । मत्तामिवेति । मत्तश्च पतति, मुकुलितदृष्टिश्च भवति, गतिवैकल्या- दन्येन कृष्यते । भोजनं मोक्तव्यम् । भुक्ते सत्यास्थानं लोकदर्शनं तदर्थं मण्डप- स्तस्य । ऊर्ध्वस्थितेत्यादि साधारणम् । प्रांशुन्नोन्नतेन, अन्यत्र,—प्रकृष्टा अंशवो यस्य तेन । कर्णिकारमारग्वधपुष्पम् । व्यायामः श्रमः । व्यायतं विभक्तावयवम्, विशे- षेण दीर्घं च । शस्त्रिणा सायुधेन, स्तम्भा अपि शस्त्रेण वध्यन्ते । मौलभृतकश्रेणि- मित्रामित्राटविकभेदेन षट्प्रकाराः सहाया भवन्ति । अन्यत्र—मूले बुध्ने भवं मौलम् । बुध्नप्रतिष्ठमित्यर्थः । पंक्तिस्थितेनेति साधारणम् । कातंस्र्वरं सुवर्णम्, यस्योद्घृष्यमाणस्य सतः कुंकुमस्येव रागो जायते; सौगन्ध्यं च तद्धरिचन्दनम् ।

से प्राप्त करने के सैकड़ों मनोरथों की चिन्तापूर्ण कल्पना करने लगते हैं, पर किसी प्रकार जब उन्हें दर्पशात का स्मरण हो जाता है तब अत्यन्त निरास हो जाते हैं। इस प्रकार यह गजराज मन के आशारूपी गजेन्द्रों को भी सह नहीं पाता।' तो चलो, फिर इसे देखना। तब तक महाराज के दर्शन करो। दौवारिक के इस प्रकार कहने पर बाण ने दर्पशात के मदजल से पंकिल गण्डस्थल पर पड़ी हुई मतवाली-सी तथा मद के सौरभ से मूंदी हुई अपनी दृष्टि को किसी प्रकार फेर कर उसी दौवारिक द्वारा मार्ग बताये जाने पर चलकर हजारों राजाओं से भरी तीन ड्योढ़ियों को पार करके चौथी में चक्रवर्ती महाराज हर्ष को देखा। वे मुक्तास्थानमण्डप के सामने आंगन में बैठे हुए थे। दूर पर खड़े, प्रांशु (लम्बे, पक्ष में उत्कृष्ट किरणों वाले) कर्णिकार की भांति और व्यायाम से विभक्त शरीर वाले, शस्त्रधारी मौल (एक प्रकार के सहायक) अङ्गरक्षक लोग पंक्ति में खड़े सुवर्णस्तम्भ के मण्डल की भांति उनके चारों ओर विद्यमान थे। उनके समीप विशिष्ट प्रेमी जन बैठे थे।