हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उच्छ्वासः ११७ पादपं भूनन्दनस्य, तथा च संगीतगृहं कर्णतालताण्डवानाम्, आपानमण्डपं मधुपमण्डलानाम्, अन्तःपुरं शृङ्गाराभरणानाम्, मदनोत्सवं मदलीला- लास्यानाम्, अक्षुण्णप्रदोषं नक्षत्रमालामण्डलानाम्, १अकालप्रावृट्कालं मदमहानदीपूरप्लवानाम्, अलीकशरत्समयं सप्तच्छदवनपरिमलानाम्, अपूर्वहिमागमं शीकरनीहाराणाम्, मिथ्याजलधरं गर्जिताडम्बराणां दर्पशातमपश्यत् । आसीच्चास्य चेतसि—'नूनमस्य, निर्माणे गिरयो ग्राहिताः परमाणु- ताम् । कुतोऽन्यथा गौरवमिदम् । आश्चर्यमेतत् । विन्ध्यस्य दन्तावादिव- राहस्य करः' इति विस्मयमानमेवं दौवारिकोऽब्रवीत्— 'पश्य,— मिथ्यैवालिखितां मनोरथशतैर्निःशेषनष्टां प्रियं चिन्तासाधनकल्पनाकुलधियां भूयो वने विद्विषाम् । नन्दनम्' । कर्णतालानां ताण्डवानीव ताण्डवानि । अन्यत्र,—लाभप्रधानानि ताण्ड- वानि । मधुपा भ्रमराः, विटाश्च । शृङ्गारः सिन्दूरादिदानम्, रसभेदश्च । अक्षुण्णः परिपूर्णः, अभ्रादिनानावृतः अपूर्वो वा । ग्राहिताः प्रापिताः । मिथ्यैवेति । तस्या निःशेषनष्टत्वात्पुनरभावप्रसङ्गात्निःशेषे- त्याद्यभिप्रायेणाह—मनोरथशतैरिति । तस्यां व्यापाररहितत्वाच्छून्यमनस्कत्वा- थे । पृथ्वी के नन्दनवन का वह पारिजात-वृक्ष था जिसमें सैकड़ों भौंरे झंकार रहे थे । कानों के संचालन रूप नृत्य का यह संगीतगृह था, भौरों का आपानमण्डप था, शृङ्गार और आभरणों का अन्तःपुर था, मदलीला के नृत्य का मदनोत्सव था, नक्षत्रमाला ( एक अलंकार ) का वह कभी नष्ट न होने वाला प्रदोष था, मद की महानदी के प्रवाह का वह असामयिक वर्षाकाल था, सप्तच्छदवन के सौरभो का मिथ्या शरत्काल था । जलकण के शीकरों का वह अपूर्व समागम था । गरज-तरज के आडम्बर का वह मिथ्या मेघ था । बाण ने मन में सोचा—'निश्चय ही दर्पशात के बनाने में पर्वतों के परमाणु लगे होंगे, नहीं तो इसमें इतनी गुरुता कहाँ से आती ? आश्चर्य होता है । यह हाथी क्या है। दाँतों वाला विन्ध्य पर्वत है । अथवा सूँड़ से युक्त भगवान् आदिवराह है ।' इस तरह आश्चर्य में पड़े हुए बाण से दौवारिक ने कहा—'देखो— 'पराजित होकर वन में भागे शत्रु राजा अपनी समूल नष्ट धन-सम्पत्ति को फिर १. अकाण्डप्रावृट् ।