भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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११६ | हर्षचरितम्


कालं परिणतिषु, राहुं तीक्ष्णकरग्रहणेषु, लोहिताङ्गं वक्रचारेषु, अलातचक्रं मण्डल भ्रान्तिविज्ञानेषु, मनोरथसंपादकं चिन्तामणिपर्वतं विक्रमस्य, दन्तमुक्ताशैलस्तम्भनिवासप्रासादमभिमानस्य, घण्टाचामरमण्डनमनो- हरमिच्छासंचरणविमानं मनस्वितायाः, मदधारादुर्दिनान्धकारं गन्धो- दकधारागृहं क्रोधस्य, सकाञ्चनप्रतिमं महानिकेतनमहंकारस्य, सगण्ड- शैलप्रस्रवणं क्रीडापर्वतमवलेपस्य, सदन्ततोरणं वज्रमन्दिरं दर्पस्य, उच्चकुम्भकूटाट्टालकविकटं संचारिगिरिदुर्गं राज्यस्य, कृतानेकबाणविवर- सहस्रं लोहप्राकारं पृथिव्याः, शिलीमुखशतझांकारितं पारिजात-


कर्मविपाकेषु च कालमहरादिरूपम् । तीक्ष्णं कृत्वा करेण हस्तेन ग्रहणम्, रविश्च तीक्ष्णकरः । लोहिताङ्गोऽङ्गारकः । वक्रं कुटिलम् । पश्चाच्च मण्डलाकृत्या भ्रान्ते- र्भ्रमणस्य विज्ञानानि कौशलातिशयगतिः । गोमूत्रिकामण्डले त्रिविधा हि गतिः । तत्रालातचक्रमुलमुकचक्रं भ्रमणं करोति । मनोरथसम्पादकमिति । शेषे षष्ठीसमासः । 'कर्मण्यण्' इति वाऽणिक्कृते स्वार्थे कः । दन्तौ मुक्ताशैलस्य श्वेतपाषाणस्य स्तम्भा- विव यस्य । अन्यत्र—दन्तस्य मुक्ताशैलानां च स्तम्भा यत्र । प्रतिमा दन्तकोशः, देवताकृतिश्च । महानिकेतनं साधुदेवगृहम् । गण्डावेव शैलौ तत्र प्रस्रवणं दाननि- र्यासः । सह तेन वर्तते निर्झरश्च । 'महतो मुक्तपाषाणान्गण्डशैलान्प्रचक्षते ।' संचारी जङ्गमः । यदाह कौटिल्यः—'हस्तिनो हि जङ्गमं दुर्गम्' इति । कृतान्येकानि बाणविवरसहस्राणि यस्य तम् । प्राकारेषु बाणानुत्स्रष्टुं विवरसहस्राणि क्रियन्ते, य इन्द्रकोशा इति चाणक्यादिषु प्रसिद्धाः । भून्न्दनो राजा । 'देवोद्यानं च


प्रहार करने में काल, सूंड से प्रचण्ड आघात करने में (कर से ग्रहण में या सूर्य के ग्रहण करने में) राहु, टेढ़े चाल में मंगलग्रह और मण्डलाकार भ्रमण करने में अलातचक्र था। वह विक्रम का चिन्तामणि पर्वत था जो सब प्रकार के मनोरथ को सम्पन्न करने वाला था। वह अभिमान का निवासभवन था जिसमें मुक्ताशैल के दो खम्भे दाँतों के रूप में लगे थे। वह मनस्विता का स्वेच्छाचारी विमान था जो घण्टा और चैंवर के आभूषणों से सुसज्जित था। क्रोध का वह सुगन्धित जल से भरा हुआ धारा गृह था जिससे मद की धारा के हमेशा बरसते रहने से अन्धकार छाया हुआ था। वह अहंकार का महानिकेतन था जिसमें सोने की मढ़ी हुई प्रतिमाएँ थी। वह अवलेप का क्रीड़ापर्वत था, उसके गण्डस्थल से झरने के रूप में मद की धारा झरती रहती थी। दर्प का वह वज्रमन्दिर था जिसमें दाँतों के तोरण लगे हुये थे। वह राज्य का संचरणशील गिरिदुर्ग था, जिससे कुम्भ के रूप में ऊपरी भाग में अट्टालक था। वह पृथ्वी की लौह दीवार था जिसमें बाणों की मार से हजारों छिद्र बने