भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 157

द्वितीय उच्छ्वासः ११५ दर्पेण, श्वसन्तमिव शौर्येण, मूर्च्छन्तमिव मदेन, त्रुट्यन्तमिव तारुण्येन, द्रवन्तमिव दानेन, वल्गन्तमिव बलेन, माद्यन्तमिव मानेन, उद्यन्त- मिवोत्साहेन, ताम्यन्तमिव तेजसा, लिम्पन्तमिव लावण्येन, सिञ्चन्त- मिव सौभाग्येन, स्निग्धं नखेषु, परुषं रोमविषये, गुरुं मुखे, सच्छिष्यं विनये, मृदुं शिरसि, दृढं परिचयेषु, ह्रस्वं स्कन्धबन्धे, दीर्घमायुषि, दरिद्रमुदरे, सततप्रवृत्तं दाने, बलभद्रं मदलीलासु, कुलकलत्रमायत्त- तासु, जिनं क्षमासु, वह्निवर्षं क्रोधमोक्षेषु, गरुडं नागोद्धृतिषु, नारदं कलहकुतूहलेषु, शुष्काशानिपातमवस्कन्देषु, मकरं वाहिनीक्षोभेषु, आशी- विषं दशनकर्मसु, वरुणं हस्तपाशाकृष्टिषु, यमवागुरामरातिसंवेष्टनेषु, त्यादि दर्पाधिकरणसमुचितक्रियाप्रतिपादनसामिप्रायं व्याख्येयम् । स्निग्धमिति । उक्तं च—'नखाः स्निग्धाः सिताः शस्ताः' इति । परुषं निष्कृपम् । यश्च स्निग्धः प्रीतिमान्स कथं परुषः प्रीतिशून्यो भवतीति विरोधः । एवं गुरुर्विस्तीर्णः, आचा- र्यश्च । विनय इति । उक्तं च—'विनये मुनिभिस्तुल्याः क्रुद्धा नागाश्च राक्षसाः । निस्त्रिंशस्याधिकत्वाच्च शस्त्रं नागा महीपतेः ॥' इति । स्कन्धबन्धे ग्रीवामूले । दरिद्रः कृशः दुर्गतश्च । दानं मदवारि वितरणं च । बलभद्रो हलधरः । मदो दानम्, सुराकृतश्च । नागाः करिणः, सर्पाश्च । कलहो रणोऽपि । अविदितशत्रुसैन्ये पातोऽवस्कन्दः । मकरं कूर्मम् । वाहिनी सेना नदी च । दशनकर्म दन्तव्यापारः, दशनरूपा च क्रिया । हस्त एव पाशः, प्रशस्तहस्तो हस्तपाश इति वा । हस्ते च पाशः । वागुरा जालम् । परिणतिषु दन्तविदारणकर्मसु । कालं यमम् । शुभाशुभादि- से श्वास ले रहा था, मद से मूर्च्छित हो रहा था, जवानी से उसके अङ्ग-अङ्ग टूट रहे थे, दान- जल के रूप में वह ढल रहा था, बल से मचल रहा था, मान के कारण अपने मद को और भी प्रकट कर रहा था, उत्साह से उठ रहा था, तेज से तमतमा रहा था, वह अपने भड़कीले चेहरे से सबको लिंप रहा था, सौभाग्य से सींच रहा था, स्निग्धता उसके नखों में थी, परुषता उसके रोमों में, गुरुता मुख में, सच्छिष्यता विनय में, मृदुता सिर में, दृढ़ता परिचय में, ह्रस्वता ग्रीवामूल में, लम्बी आयु, पेट छोटा और दान में हमेशा उसकी प्रवृत्ति थी, वह मद- लीलाओं में बलभद्र, अधीनता स्वीकार करने में कुलांगना, क्षमा करने में जिन, क्रोध और त्याग करने में अग्नि और वर्षा, नागों (हाथियों, सर्पों) को उठा लेने में गरुड़, झगड़े के कुतू- हल में नारद, आक्रमण में शुष्क वज्रपात, वाहिनी (सेना या नदी)को क्षुभित करने में मकर, काटने में सर्प, सूंड से पकड़ कर खींच लेने में वरुण, शत्रुओं को घेरने में यमपाश, दांतों का