भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 156

११४ हर्षचरितम् धिना विराजमानम्, स्वच्छशिशिरशीकरच्छलेन दिग्विजयपीताः सरित इव पुनःपुनर्मुखेन मुञ्चन्तम्, क्षणमवधानदाननिःस्पन्दीकृतसक- लावयवानामन्यद्विरदडिण्डिमाकर्णनाङ्गवलनानामन्ते दीर्घफूत्कारैः परिभव- दुःखमिवावेदयन्तम्, अलब्धयुद्धमिवात्मानमनुशोचन्तम्, आरोहाधिरूढि- परिभवेन लज्जमानमिवाङ्गुलीलिखितमहीतलं, मदं मुञ्चन्तम्, अवज्ञा- गृहीतमुक्तकवलकुपितारोहाटनानुरोधेन मदन्द्रीनिमीलितनेत्रत्रिभागस्, कथं कथमपि मन्दमन्दमनादरादाददानं कवलान्, अर्धजग्धतमालपल्लवस्स्रु- तश्यामलरसेन प्रभूततया मदप्रवाहमिव मुखेनाप्युत्सृजन्तम्, 'चलन्तमिव तदवस्थानसमुचितत्वात् । पर्यङ्किका च दन्तमयः पर्यङ्कः आस्त इति श्लेषः । आयत- वंशः, वक्रवंशः, शरवंशः' बालवंशश्चेति चत्वारो वंशाः । तेषु बालवंश आयत एव शास्त्रकृतामभिप्रेतः । तथा च-'यावत्पूरितपार्श्वस्थ वंशश्चापलताकृतिः । शुमो ज्ञेयो गजेन्द्राणामायतः कुरुते सुखम् ॥' इति तैरुक्तम् । आयताद्वंशात्तत्क्रमेण गोपु- च्छवदायत इति विग्रहः । समानाहों हि वालधिः शोकं करोति । यदुक्तम्- 'वकं स्थूलं च ह्रस्वं च पुच्छं कचविवर्जितम् । समानाहं हिं नागस्य भर्तुः शोककरं स्मृतम् ॥' इति । वंशं पृष्ठास्थि, कुलं च । क्रम आनुपूर्वी; पारम्पयं च । वालधिः पुच्छम् । लज्जमानमिति । एष लज्जते स भूमि लिखति, दर्प चोज्झति । अंगुली करिकराग्रावयवः, करशाखा च । तन्द्रो आलस्यम्, गाढनिद्रा वा । चलन्तमिव- उसके आयत पृष्ठवंश से निकली हुई, उसके गजाधिपत्य का चिह्न एवं चामर के समान थी, शोभित हो रहा था। अधिपति है। वह अपने मुँह से ठण्डे और सफेद जल के फुहारे बार-बार फेंकता रहता था, मानों दिग्विजय के समय सोखी हुई नदियों को उगल रहा हो । क्षण भर ध्यान देने से सभी अङ्गों को निश्चल कर देने वाले, दूसरे हाथियों के डिण्डिम घोष ( यशोगान ) के श्रवण से उत्पन्न अङ्गों के चाञ्चल्यरहित हो जाने से लम्बे फूत्कारों द्वारा अपने परिभव का कष्ट मानों आवेदन कर रहा था। वह पश्चात्ताप अनुभव करता कि उसे युद्ध करने का अवसर नहीं दिया जा रहा है। दूसरे उसकी पीठ पर चढ़ते तो वह अपना परिभव महसूस करके अपने नखों से जमीन पर कुछ लिखने लगता। मद का त्याग कर रहा था। उसने कौर लेकर भी अवज्ञा से छोड़ दिया, इसपर महावत ने कुपित होकर खाने के लिए अनुरोध किया तो उसने मद से अलसा कर आँखें बन्द कर लीं। बहुत प्रयत्न करने पर रह-रहकर अनादर से कौर ले लेता था। आधा खाये हुए तमाल-पत्रों से चूता हुआ सांवला पानी इतना अधिक हो गया था, मानों वह मुख से भी मद-प्रवाह को छोड़ रहा था। दर्प से वह मानो काँप रहा था, शौर्य से जीवित था, शौर्य १. दलन्त ।