भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 155

वनानीवोपभुक्तानि पुनःपुन करटाभ्यां बहलमदामोद्व्याजेन विसृज- न्तम्, अहर्निशं विभ्रमकृतहस्तस्थितिभिरर्धखण्डितपुण्ड्रेक्षुकाण्डकण्डूयन- लिखितैरल कुलवाचालितैर्दानपट्टकैर्लभमानमिव सर्वकाननानि करिप- तीनाम्, अविरलोदविन्दुस्यन्दिना हिमशिलाशकलमयेन विभ्रमनक्षत्र- मालागुणेन शिशिरीक्रियमाणम्, सकलवारणेन्द्राधिपत्यपट्टबन्धबन्धुर- मिवोच्चैस्तरां शिरो दधानम्, मुहुर्मुहुः स्थगितापावृतदिङ्मुखाम्यां कर्णता- लतालवृन्ताभ्यां वीजयन्तमिव भर्तृभक्त्या दन्तपर्यङ्किकास्थितां राज- लक्ष्मीम्, आयतवंशक्रमांगतेन गजाधिपत्यचिह्नेन चामरेणेव चलता बाल- सतां मतः ॥' इति करटाभ्यां गण्डाम्याम् । अर्धेत्यादिनेक्षुकाण्डकस्य लेखनीसा- दृश्यमाह । लिखितैः कृतलेखैरप्यलिकुलेषु सत्सु वाचालितशब्दयोगो येषामित्यने- नालिकुलस्य लिप्यक्षररूपतां ध्वनयति । लिप्यक्षरेषु च सत्सु पाठ्यमानेषु वाचा- लता । दानपट्टकलिखितैः किंचिद्धि लभ्यते । अक्षरपाटिकैश्च तेषां हस्तस्थितिं क्रियते । दानि च वाच्यन्ते । यद्वा स्वहस्तेनाक्षरकरणं हस्तस्थितिः । हिमशिला वातवज्जीभूतं हिमम् । केचित्तु 'हिमानि हिमशकलानि चन्द्रकान्ताः' इत्याहुः । हिमस्य च तदा वर्णनानुचितत्वात् । पर्वतेभ्यो हिमानयनं सुलभमेवेति पूर्वोक्तमेद श्रेष्ठम् । यतश्चन्द्रकान्तानां दिवा स्रुतिर्न भवतीति । नक्षत्रमाला हस्त्याभरणभेदः । उच्चैस्तरामिति । उच्चं हि शिरः करिणः शस्यते । यदुक्तम्— 'समं महच्च पूर्णं च नातिस्तब्धोच्चमस्तकम् । नावाग्रं नातिपृथुलं वितानावग्रहं मृदु ॥' इति । दन्तावेव हुई मदधारा के व्याज से वह उन्हीं की गन्ध को फैला रहा था† । दिनरात वह अपने हाथ से तैयार किये गये, अर्ध-खण्डित ईख की लेखनी से लिखे गये एवं भौरों द्वारा पढ़े गये दानपट्टों से करपतियों के सभी जंगलों को मानो प्राप्त कर रहा था। निरन्तर पानी टपकाने वाले, चन्द्रकान्त के टुकड़ों से बने नक्षत्रमाला नामक आभूषण में वह ठंडा हो रहा था। वह ऊँचा मस्तक, जो मानों सभी वारणेन्द्रों के आधिपत्य के पट्टबन्ध के कारण निम्नोन्नत था, धारण कर रहा था। बार-बार उसके कानों के पंखे चलते रहते थे जिससे दिशायें ढकती और खुलती रहती थीं। इस प्रकार वह अपने स्वामी की भक्ति से दाँत से पलंग पर बैठी हुई राजलक्ष्मी को पंखा झल रहा था। वह अपनी हिलती हुई पूँछ से, जो † उस समय सहकार, कपूर, कक्ककोल, लवंग, पारिजातक आदि सुगन्धद्रव्य थे जिनसे मुखवास बनाया जाता था, उसी की गन्ध दर्पशात के मदजल में थी, क्योंकि जंगलों में उसने भी इनके वृक्षों का उपयोग किया था। ८ ह०