भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 154

११२ हर्षचरितम् कदलीदण्डेनान्तर्गतशीकरसिच्यमानमूलम्, मुक्तपल्लवमिवापरं लीलाव- लम्बिना मृणालजालकेन समररसोच्चरोमाञ्चकण्टकितमिव दन्तकाण्ड- मुद्वहन्तम्, विसर्पन्त्या च दन्तकाण्डयुगलस्य कान्त्या सरःक्रीडास्वा- दितानि कुमुदवनानीव बहुधा वमन्तम्, निजयशोराशिवमिव दिशाम- र्पयन्तम्, कुकरिकीटपाटनदुर्विदग्धान् सिंहानिवोपहसन्तम्, कल्पद्रुम- दुकूलमुखपटमिव चात्मनः कलयन्तम्, हस्तकाण्डदण्डोद्धरणलीलासु च लक्ष्यमाणेन रक्तांशुकसुकुमारतरेण तालुना कवलितानि रक्तपद्म- वनानीव वर्षन्तम्, अभिनवकिसलयराशीनिवोद्गिरन्तम्, कमलकवलगीतं मधुरसमिव स्वभावपिङ्गलेन वमन्तं चक्षुषां, चूतचम्पकलवलीलवङ्ग- क्कोकोलवन्त्येलालतामिश्रितानि सहसकाराणि कर्पूरपूरितानि पारिजातक- कल्याणकारको ।।' इत्युक्तम् । रक्तांशुकेति । उक्तं च—'रक्तोष्ठतालुरसनम्' इति । स्वभावपिङ्गलेनेति । उक्तं च 'शशिसूर्यसमामासे कलविङ्काक्षसन्निभे । प्रसन्नमधु- पिङ्गे च स्थिरे चामीलने तथा ॥ अपरिस्राविणी चैव कुशाग्निनिभभास्वरे । नेत्रे शस्ते समे स्निग्धे दीर्घे चाविलपक्ष्मणो ।।' इति । चूतेत्यादिना प्रशस्तत्वमाह । यदाह—'उभयस्रुतिरप्येष विवर्णो हर्षवर्जितः । यदि स्यादपगन्धश्च तदासो न द्वन्द्वी हाथी के मद-जल की वायु ग्रहण करके दूर ऊपरं उठाया मानों कुल पर्वतों, समुद्रों, द्वीपों और जंगलों सहित दिशाओं के चक्रवाल को अर्गलित कर रहा हो । उसने अपने दांत के बीच सूँड़ से कदली का पत्ररहित दण्ड रख लिया था यथा उसके पानी से दन्तमूल सिंच रहा था मानों उसका पल्लवरहित दूसरा दन्तकाण्ड लीला से लटकाये मृणालों से प्रतीत होता था कि समर के अनुराग से उत्पन्न रोमाञ्च के कंटक से युद्ध हो, इस प्रकार वह अपने दोनों दांतों का धारण कर रहा था । उसके दोनों दाँतों की कान्ति आगे की ओर फैल रही थी, मानों वह जलक्रीडा के समय चखे हुए कुमुदवनों को अनेक प्रकार से वमन कर रहा था, अपनी यशो- राशि को दिशाओं के लिए (दाँत की किरणों के रूप में) अर्पित कर रहा था, उन शेरों पर हँस रहा था जो क्षुद्र गजों को विदीर्ण करके मतवाले बन जाते हैं, या वह कल्पवृक्ष के दुकूल का अपना मुखपट (रुमाल) बना रहा था। जब वह अपनी सूँड़ लीला से उठाया करता तो उसके मुख का रक्तांशुक के समान सुकुमार तालुभाग दिखाई देने लगता था, वह मानों गटके हुए लाल कमलों को बरसाने लगा हो, या नये-नये लाल पत्तों को उगल रहा हो । वह अपनी स्वाभाविक पीली आँखों से मानो कमलों के ग्रास के साथ पिये मधुरस का उदिगरण कर रहा था। सहकार और कपूर से युक्त पारिजात के वन का उसने उपभोग किया जिनमें आम, चंपक, लवली, लवंग, इलायची के भी आस्वाद लिये थे, मानों इसी से दोनों कपोलों से बहती