भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 184 में से

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पृष्ठ 153

अनवरतमवतंसशङ्खैरामन्द्रकर्णतालदुन्दुभिध्वनिभिः पञ्चमीप्रवेशमङ्गला- रम्भमिव सूचयन्तम्, अविरतचलनचित्रत्रिपदोललितलास्यलयैर्दोलाय- मानदीर्घदेहाभोगवतया मेदिनीविदलनभयेन भारमिव लघयन्तम्, दिग्भित्तितटेषु कायकिव कण्डूयमानम्, आहवायोदस्तहस्ततया दिग्द्वार- णानिवाह्वयमानम्, ब्रह्मस्तम्भमिव स्थूलनिशितदन्तेन करपत्रेण पाटयन्तम्, अमान्तं भुवनाभ्यन्तरे बहिरिव निर्गन्तुमीहमानम्; सर्वतः- सरसकिसलयलतालासिभिर्लेशिकैश्चिरपरिचयोपचितैर्वनेरिव विक्षिप्तं, सशैवलबिसविसरशबलसलिलैः सरोभिरिव चाधोरणैराधीयमाननिदाघ- समयसमुचितोपचारानन्दम्, अपि च प्रतिगजदानपवनादानदूरोत्क्षिप्ते- नानेकसमरविजयगणनालेखाभिरिव वलिवलयराजिभिस्तनीयसीभिस्तर- ङ्गितोदरेणातिस्थवीयसा हस्तार्गलदण्डे नार्गलयन्तमिव सकलं सकुलशैल- समुद्रद्वीपकाननं ककुभां चक्रवालम्, एकं करान्तरापितेनोत्पलाशेन लेखाबिन्दुभिराचितः' इत्युक्तम् । शङ्खैः । शङ्खशब्दैरित्यर्थः । कर्णेत्यादि । कर्णौ च दुन्दुभिश्वनितौ । 'कर्णौ च करिणः कार्यंकारिणो सत्प्रशंसिनौ' इति । पञ्चमो दशा त्रिपदी । एकपदोत्क्षेपे पादत्रयावस्थितिः । लयो लीलाः । आहवः संग्रामः । ब्रह्मस्तम्भो ब्रह्माण्डम् । करपत्रं क्रकचं स्थूलनिशितदन्तं भवति । तच्च भेदयति स्तम्भम् । अमान्तमवर्तमानम् । लेशिकैर्घासिकैः । आधोरणैर्गजारोहैः । वलयाकारा वलिर्वलिवलयम् । अर्गलयन्तं सनाटकं कुर्वाणम् । कुमुदवनानीत्युत्प्रेक्षा । दन्तयो- र्वर्णप्राशस्त्यमाह—'पयःकुमुदकुन्दाभौ केतकीकुमुदद्युती । मृगाङ्ककिरणालोको कीर्ति- निरन्तर कानों के शंख गम्भीर कर्णताल तथा दुन्दुभि के समान आवाज द्वारा मानों वह पांचवीं स्वास्थ्यदशा के प्रवेश का मंगळारम्भ सूचित कर रहा था। अपने तीन पैरों पर खड़ा होकर सुन्दर नृत्य की मुद्रा में स्थूल शरीर को निरन्तर लम्बित कर रहा था, मानों पृथिवी के धँस जाने के भय से बोझ को हल्का कर रहा हो। मानों वह (झूमता हुआ) दिशाओं की भीतों में अपनी देह खुजला रहा था। मानों अपनी सूँड़ उठा-उठाकर दिग्गजो को युद्ध के लिए गुहार रहा था। अपने मोटे-मोटे और तेज दाँतों के आरे से मानों ब्रह्माण्ड को फाड़ रहा था । वह संसार में न अटने के कारण मानो बाहर निकलना चाहता था। मेघों की भाँति बहुत दिनों के परिचित घसियारे सरस पत्तों और लताओं से उसे नचा रहे थे, तथा सरोवरों की भाँति महावत सेवार सहित कमलनाल के जलों को छिड़क कर ग्रीष्म-काल के समुचित उपचार का आनन्द उसे दे रहे थे। वह अपनी सूँड के अर्गलादण्ड को जिसमें मानो अनेक समरों की विजय की गणना-लेख हों, ऐसे महीन चारों ओर की लकीरों से मध्यभाग में युक्त था, प्रति-

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