भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 152

११० हर्षचरितम् इति । स तमवादीत्—'भद्र ! श्रूयते दर्पशातः । यद्येवमदोषो वा पश्यामि तावद्धारणेन्द्रमेव । अतोऽर्हसि मामत्र प्रापयितुम् । अतिपरवानस्मि कूतूहलेन' इति । सोऽभाषत—'भवत्वेवम् । आगच्छतु भवान् । को दोषः । पश्यतु तावद्धारणेन्द्रम्' इति । गत्वा च तं प्रदेशं दूरादेव गम्भीरगलगर्जितैर्वियति चातक- कदम्बकैर्भुवि च भवननीलकण्ठकुलैः कलकेकाकलकलमुखरमुखैः क्रियमाणाकालकोलाहलम्, विकचकदम्बसंवादिमदसुरासौरभभरित- भुवनम्, कायवन्तमिवाकालमेघकालम्, अविरलमधुबिन्दुपिङ्गल- पद्मजालकितां सरसीमिवान्यवगाढां दशां चतुर्थीमुत्सृजन्तम्, निधीयते । जात्यन्तरितो द्वितीयां जातिं हस्तिरूपां प्राप्तः । यद्येवमिति । यदि सत्यं दर्पशातोऽयमदोषो वेति । वाशब्दश्चार्थे । यदि च न दोष इत्यर्थः । यतो रसदाना- दिमयेन केनचिद् द्रष्टुं न लभ्यते । कुतूहलेन परवान्कुतूहलायितः । गत्वेत्यादौ । दूरादेव दर्पशातमपश्यदिति सम्बन्धः । गर्जितं बृंहितम् । चातकाः स्तोककाः । नीलकण्ठा मयूराः । केका मयूररुतानि । मेघकालमिति । मेघकालश्च चातककदम्बनीलकण्ठकुलकदम्बकसौरभादियुक्तः । अविरला घना ये मधुविन्दव इव मधुविन्दवो माक्षिककणास्तद्वत्पिङ्गलाणि पद्मजालकानि संजातानि यस्याम् । 'पद्मकं बिन्दुजालं स्याद्गात्रकं करिणामिति' । यथा—'पद्मस्वस्तिकसंस्थानो बिन्दु- मिश्र कचैस्तथा । स्वङ्गिताङ्कस्तुषारामः शावः शक्तिकरः करी ॥' इत्युक्तम् । अन्ये मधुबिन्दवो मकरन्दकणास्तैः पिङ्गलानीति व्याख्येयम् । महत्सरः सरसी । अत्यव- गाढामिति । परिणताम् । दशां कालावस्थाम् । चतुर्थीमिति । 'चतुर्थ्यामवगाढायां 'भद्र, दर्पशात का नाम सुना जाता है। यदि ऐसी बात है और कोई झंझट न हो तो उस गजराज को देखूँगा। मुझे वहाँ ले चलो, मैं अपने कुतूहल के वेग से लाचार हूँ।' वह बोला—'ऐसी बात है तो आइये, झंझट क्या है ? तब तक गजराज को देख लें।' उस स्थान में जाकर बाण ने दूर ही से दर्पशात को देखा । उसकी गम्भीर चिग्घाड़ से आकाश में चातक पक्षी और पृथ्वी पर गृहमयूर अव्यक्त-मधुर एवं केका की आवाज से मुखरित हो असमय में कोलाहल कर रहे थे। उसकी गम्भीर चिग्घाड़ सुनकर आकाश में चातक पक्षी मेघ की गड़गड़ाहट समझ कर कोलाहल करने लगे और पृथिवी के गृहमयूर अपनी केका- वाणी द्वारा असमय में मुखरित हो उठे। खिले हुए कदम्ब के समान अपने मद की सुरासौरभ से उसने दिशाओं को भर दिया था। असमय में वर्षाकाल मानो शरीरधारी हो गया था। पूर्ण मधु-बिन्दुओं के कण पिङ्गल वर्ण. से पद्म-समूहों से भरी हुई सरसी की भांति सघन मधुमाक्षिकों की तरह पिङ्गल वर्ण के पद्मकः नाम के बूंदों से युक्त परिपक्व चतुर्थी अवस्था को छोड़ रहा था।