भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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द्वितीय उच्छ्वासः १०९ जनानलरक्ष्यमाणैरिवोपरिविततवितानैः, पुरःपूजिताभिमतदैवतैः, भूपाल- वल्लभैस्तुरङ्गैरारचितां मन्दुरां विलोकयन्, कुतूहलाक्षिप्तहृदयः किंचिदन्त- रमतिक्रान्तो हस्तवामेनात्युच्चतया निरवकाशमिवाकाशं कुर्वाणम्, महता कदलीवनेन परिवृतपर्यन्तं सर्वतो मधुकरमयीभिर्मदस्स्रुतिभिर्नदीभिरिवापत- न्तीभिरापूर्यमाणम्, आशामुखविसर्पिणा बकुलवनानामिव विकसतामामो- देन लिम्पन्तं घ्राणेन्द्रियं दूरादव्यक्तमभिधिष्ण्यागारमपश्यत् । अपृच्छच्च- ‘अत्र देवः किं करोति ?' इति । असावकथयत्—'एष खलु देवस्यौपवाह्यो बाह्यं हृदयं जात्यन्तरित आत्मा बहिश्चराः प्राणा विक्रमक्रीडासुहृद्दर्पशात इति यथार्थनामा वारणपतिः । तस्यावस्थानमण्डपोऽयं महान् दृश्यते' नकं रक्तकम् । देवतात्र गोविन्दः आरचितां भूषिताम् । हस्तवामशब्दो भाष्यकृता वामहस्तमार्ग इत्यर्थे धृतः । बकुलेत्यादिना प्राशस्त्यमेव पोषयति । तदुक्तम्—'माल- तीमुक्तपुंनागबकुलोपमसौरभम् । दानं पिष्टाम्बुसदृशं मुञ्चञ्श्वेतं तु शीतलम् ॥' इति । श्लैष्मिका दानलक्षणम् । एवं च घर्मलक्षणे तु प्रकोपसमयेऽपि तथाविधमद- वर्णनया श्लेषप्रकृतित्वं प्रकाशयति—'श्लेष्मप्रकृतिकं श्रेष्ठं मद्रजाति तथैव च' इति च शास्त्रकृता दर्शितम् । धिष्ण्यं मण्डपम् । औपवाह्यः क्रीडा हस्ती । यस्मात्केचन संनाह्याः केचिद्भद्रजातीया उभयस्वभावा भवन्ति करिणः । अस्य च यद्यपि विक्रम- क्रीडासुहृदित्यनेन दर्पशात इति यथार्थनामा वारणपतिरित्यनेन च सांन्नाह्यत्व- मेवोक्तम्, तथाप्यौपवाह्य इति कथनेऽद्वंद्वयेऽपि योग्यत्वाद्वद्रजातीयत्वं चास्य बिखेरी जाती हुई घासों के मत्सर से क्षुब्ध हो उठे थे। सईसों की तगड़ी डंपटान सुनकर मारे डर के उनकी पुतलियाँ दीन भाव से फिरने लगती थीं। उनके अङ्ग मानों केसर से मले गये थे अतः मानों उनके समीप सदा नीराजन अग्नि जलती हो । उनके ऊपर चंदोवे तने हुये थे। उनके सामने अभीष्ट देवता पूजे गये थे। मन्दुरा को देखकर बाण का हृदय कुतूहल से भर गया और कुछ आगे बढ़कर बायीं ओर दूर होने से अव्यक्त से हाथोसाल को देखा जो अत्यन्त ऊँचा होने से आकाश को अवकाशहीन बना रहा था। केलों के विशाल वन से वह चारों ओर से घिरा हुआ था। सब ओर से नदियों की भाँति बहती हुई मद की धारायें थीं जिन पर भौरें झूल रहे थे। उसकी गन्ध दिशाओं में इस प्रकार फैल रही थी मानों मौलसिरी के फूलने की गन्ध नाक में भर रही हो। बाण ने मेखलक से पूछा—'यहाँ महाराज क्या करते हैं ?' उसने कहा—'यह महाराज का क्रीड़ाहस्ती यथार्थनामा दर्पशात है, जिसे वे युद्ध में साथ ले जाते हैं। यह महाराज का बाहरी हृदय है, दूसरे स्वरूप में आत्मा है, बहिश्चर प्राण है। उसका यह विशाल अवस्थान मण्डप दिखाई दे रहा है।' बाण ने उससे कहा—