भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 150

१०८ हर्षचरितम्

लोहपीठकठिनखुरमण्डलैः, अतिजवतृटनभयान्निर्मितान्त्राणीवोदराणि वृत्तानि धारयद्भिः, उद्यद्द्रोणीविभज्यमानपृथुजघनैः, जगतीदोलायमान- बालपल्लवैः, कथमप्युभयतो निखातदृढभूरिपाशसंयमननियन्त्रितैः, आय- तैरपि पश्चात्पाशबन्धपरवशप्रसारितैकाङ्घ्रिभिरायततरैरिवोपलक्ष्यमाणैः, बहुगुणसूत्रग्रथितग्रीवागण्डकैः, आमीलितलोचनैः, दूर्वारसश्यामळफेनल- वशबलान् दशनगृहीतमुक्तान् फरफरितत्वचः कण्डूजुषः प्रदेशान् प्रचाल- यद्भिः, सालसवलितवालधिभिः, एकशफविश्रान्तिश्रमस्रस्तशिथिलित- जघनार्धैः, निद्रया प्रध्यायद्भिश्च, स्खलितहुंकारमन्दमन्दशब्दायमानैश्च, ताडितखुरधरणीरणितमुखरशिखरखुरलिखितक्ष्मातलैर्घासमभिलषद्भिश्च, प्रकीर्यमाणयवसग्रासरसमत्सरसमुद्भूतक्षोभैश्च, प्रकुपितचण्डचण्डालहुङ्कार- कातरतरतरलतारकैश्च, कुङ्कुमप्रमृष्टिपिञ्जराङ्गतया सततसन्निहितनीरा- ऽस्थूलप्रगुणप्रांस्यतैनिर्मांसऋजुजङ्घैः । उक्तं च—'जङ्घे वृत्ते दीर्घे निर्मांसे पूजिते निगूढसिरे' इति । मण्डलशब्देन वृत्तत्वमुच्यते । तदुक्तम्—'खुरास्तुरङ्गे वृत्ताश्च ह्रस्वाश्च सुदृढा घनाः' इति । तथा शिलातलनभैः खुरैरिति । उदराणीति । तदुक्तम्- 'उदरं वृत्तमगुरु मृगस्योपचितं तथा । अच्छिद्रह्रस्ववृत्ताल्पसमकुक्षि च पूजितम् ॥' इति । द्रोणी शोभाविशेषः । यदाह— 'पृष्ठोरःकटिपार्श्वस्थमांसोत्कर्षणनिर्मिता । द्रोणिकेति प्रशंसन्ति शोभा वाजिनि पञ्चमी ॥' इति । बाला एव पल्लवाः । उभयत इति । अत्युद्दामवेगवत्त्वादुभयत्र पाशबन्धः । गण्डको भूषणभेदः । फरफरिताः पुनः पुनरीषत्कम्पिताः । वालधिः पुच्छः । शफः समुद्गयुक्तः पादः । खुरधरणी खुराग्रःकाष्ठपट्टाच्छादिता भूः । चण्डालोऽश्वपालः । प्रमृष्टिः प्रमार्जनम् । विता- प्रकट होता हुआ शोभा-विशेष उनके पुट्ठों को विभक्त कर रहा था। पूँछ के बाल जमीन तक लटक रहे थे। किसी प्रकार अगाड़ी और पिछाड़ी गड़ी हुई, मजबूत रस्सियों से बंध कर उन्हें नियन्त्रण में रखा गया था। वे लम्बे थे, फिर भी पिछाड़ी बाँधने से उनका एक पैर बिल्कुल फल गया था, इससे और भी उनकी लम्बाई बढ़ गई थी। उनके गले का गण्डक नामक अलंकार तिगुने-चौगुने सूत में गूँथा हुआ था। वे अपने खुजलाइट युक्त अंगों, जो दूब के रस से सांवले फेनों से रंग गये थे, जिन्हें दांतों से पकड़ कर छोड़ दिया था तथा जो फरफरा रहे थे, को चलाते रहते थे। आलस्य के साथ पूँछ टेढ़ी करते थे। एक ही खुर की टेक लेकर विश्राम करने से वे थक जाते और उनकी आधी जांघ हटाने लगती। नींद में कुछ सोच रहे थे। हूँफकर धीरे-धीरे हिनहिनाने लगते थे। खुर से पृथ्वी पर ताड़न से मुखर खुरों के अग्र-भाग से पृथ्वी पर लिखते और घास की अभिलाषा कर रहे थे।