भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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द्वितीय उच्छ्वासः अतिगम्भीरे भूपे कूप इव जनस्य निरवतारस्य । दधति समीहितसिद्धिं गुणवन्तः पार्थिवा घटकाः ॥ १ ॥ रागिणि नलिने लक्ष्मीं दिवसो निदधाति दिनकरप्रभवाम् । अनपेक्षितगुणदोषः परोपकारः सतां व्यसनम् ॥ २ ॥ अथ तत्रानवरताध्ययनध्वनिमुखराणि, भस्मपुण्ड्रकपाण्डुरललाटैः कपिलशिखाजालजटिलैः कृशानुभिरिव क्रतुलोभागतैर्बटुभिरध्यास्यमा- अतीत्यादि । यस्य क्रोधादिभावगण इङ्गितादिना परेण न चेत्यते स गम्भीरः । उक्तं च—'यस्य प्रसादादाकारात्क्रोधहर्षभयादयः । भावस्या नोपलभ्यन्ते तद्गाम्भी- र्यमुदाहृतम् ॥' इति । अगाधश्च । अवतरणमवतारः, प्रवेशनम् । अवतरन्ति येने- त्यवतारः, सोपानादिश्च । समीहितसिद्धिं राजगृह आत्मनः प्रवेशलक्षणम् जल- ग्रहणलक्षणं च । गुणा औदार्यादयः, आकर्षणरज्जुवश्च । पार्थिवा राजानः, पृथ्वो- विकाराश्च । घटयन्ति वाञ्छितेन प्रयोजयन्तीति घटकाः, कुम्भाश्च । अनेन तादृशे राज्ञि बाणस्य कृष्ण एव समीहितसिद्धिरध्यास्यत इति सूचितम् ॥ १ ॥ रागिणि रक्ते, विषयाभिलाषिणि च । लक्ष्मीं शोभाम्, समृद्धिं च । अत्र नलिना- दिकमप्रस्तुतम् बाणाद्यास्तु प्रस्तुताः । अनेन कृष्ण ईदृशे बाणे राजप्रभवां श्रियं निधास्यतीत्युक्तम् ॥ १ ॥ अथेत्यादिना । बाणो बान्धवानां भवनानि भ्रमन्सुखमतिष्ठदिति संबन्धः । शिखा चूडा, ज्वाला च । सोमो यज्ञियं द्रव्यम् । केदारिका स्वल्पं क्षेत्रम् । प्रघटनेषु तथो- चितत्वात् । अहरिता हरिताः संपद्यमाना हरितायमानाः लोहितादित्वात्क्यङ् । जैसे किसी गहरे कुएँ से जल लेने के लिए सोपान आदि के अभाव से उतरना कठिन है ऐसी स्थिति में डोर के साथ घड़े की सहायता से जल निकालते हैं, उसी प्रकार अत्यन्त गम्भीर वाले राजा के पास न पहुँच पाया हुआ व्यक्ति गुणवान् संयोजक लोगों की सहायता से ही अपनी इष्ट-सिद्धि कर पाता है† ॥ १ ॥ राग से भरे हुए कमल में दिन सूर्य से उत्पन्न शोभा-सम्पत्ति को आहित कर देता है । दूसरे का उपकार करना सज्जनों का एक स्वाभाविक व्यसन होता है, जिसमें वे किसी के गुण-दोष की ओर ध्यान नहीं देते‡ ॥ २ ॥ वहाँ तब बाण स्नेहपूर्वक अपने चिरदृष्ट बन्धु-बान्धवों के घर जा-जाकर मिलता हुआ सुख से रहने लगा । ब्राह्मणों के वे घर निरन्तर अध्ययन की ध्वनि से मुखरित हो रहे † यहां गुणवान् पार्थिव घटक से कृष्णवर्धन का संकेत है जिन्होंने बाण की इष्टसिद्धि, उसे हर्षवर्धन से मिला कर, की थी । द्वितीय उच्छ्वास में यही प्रसंग वर्णित है । ‡ दिवस अर्थात् कृष्ण, सूर्य अर्थात् सम्राट् हर्ष से शोभा-सम्पत्ति लेकर नलिन अर्थात् बाण को अर्पित करते हैं, यह प्रस्तुत में तात्पर्य है ।