भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 120

७८ हर्षचरितम् नानि, सेकसुकुमारसोमकेदारिकाहरितायमानप्रघनानि, कृष्णाजिन- विकीर्णशुष्यत्पुरोडाशीयश्यामाकतण्डुलानि, बालिकाविकीर्यमाणनीवार- बलीनि, शुचिशिष्यशतानीयमानहरितकुशपूलीपलाशसमिन्धि, इन्धनगो- मयपिण्डकूटसंकटानि, आमिक्षीयक्षीरक्षारिणीनामग्निहोत्रधेनूनां खुरवल- यैर्विलिखिताजिरवितर्दिकानि, कमण्डलव्यमृत्पिण्डमर्दनव्यग्रयतिजनानि, वैतानवेदीशङ्कव्यानामौदुम्बरीणां शाखानां राशिभिः पवित्रितपर्यन्तानि वैश्वदेवपिण्डपाण्डुरितप्रदेशानि, हविर्धूमधूसरिताङ्गणविटपिकिसलयानि, वत्सीयबालकलालितललत्तरलतर्णकानि, क्रीडत्कृष्णसारच्छागशावक- प्रघनान्यङ्कनानि । 'उशन्ति प्रघनामिरूयामेकदेशे तु वेश्मनः' । पुरोडाशीयेत्यादि सहितेत्यर्थं ईयंः। बालिका कुमार्यः । नीवारा अकृष्टपच्या व्रोहयः । कूटो राशिः । आमिक्षीयमिति । तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेवामिक्षा । 'आमिक्षा सा शृतोष्णे या क्षीरे स्याद्दधियोगतः' इति । तस्यै हितमामिक्षीयम् । आमिक्षाप्रकृतित्वमस्य च योग्यत्वात् । अग्निहोत्रेषु तस्या अनाम्नातत्वात्, यद्वा, —यदन्नस्य जुहुयादिति । यस्या अपि हवनं भवत्येव । वलयैः समूहैः । वितर्दिका वेदिका । कमण्डलुमुनिकर कस्तस्मै हिताः कमण्डल्व्याः । 'उगवादिभ्यो यत्' । यतीनां निष्किञ्चनत्वादादरत्त्वाच्च स्वयंकरणम् । वितानो यज्ञः, तत्र भवा वैतानो यज्ञाग्निकार्यभूः । शंकुः कीलकः, तस्मै हितः शङ्कव्यः । औदुम्बरीणामिति । तासां याज्ञियत्वात् । वत्सेभ्यो हिता वत्सी- याः वत्सपरिचर्यातुराः तर्णकाः सद्योजाता वत्साः । कृष्णसारेति छागविशेषणम् । थे । त्रिपुण्ड भस्म से मस्तक को उज्ज्वल किए हुए सोमयज्ञों के लोभी वटु वहां इकट्ठे थे जो कपिल वर्ण वाली ज्वाला की जटाओं से शोभित अग्नि के समान प्रतीत होते थे । आंगनों में सोम की क्यारियां सींचने से हरी हो रही थीं । बिछे हुए कृष्णाजिन पर पुरोडाश बनाने के लिए सांवा पसार कर सुखाया जा रहा था । कुमारी कन्याएँ बिना जोत के पके हुए नीवारों की बलि बिखेर रही थीं । सैकड़ों शिष्य पवित्र होकर कूशा की हरी आंटियाँ और पलाश की समिधाएँ इकट्ठी कर रहे थे । जलावन के लिए लिए गोबर के कण्डो का ढेर लगा था । आमिक्षा† बनाने के योग्य दूध देने वाली गौएँ अपने खुरों से आँगन की वेदियाँ कोड़ रही थीं । यती लोग कमण्डलुओं को मिट्टी से मलने में व्यग्र थे । वैतान अग्नियों की वेदी में लगाए जाने वाले शंकुओं के लिए गूलर की शाखाएँ किनारे रखी थीं । स्थान स्थान पर वैश्वदेवों के उजले पिण्डे रख दिए गए थे । आँगन के पेड़ के पत्ते यज्ञ- धूम से बिलकुल धूमिल हो रहे थे । देख-रेख करने वाले लड़के उचकते हुए सद्योजात † एक प्रकार का दूध से बना यज्ञीय पदार्थ । यह तप्त दूध में दही डाल कर बनाया जाता है और वैश्वदेव के लिए अर्पित किया जाता है ।