हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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में चल कर हड़बड़ा गए और कथा को शीघ्र समाप्त कर डाला। कहीं उत्तर भाग में भी पूर्व भाग के टक्कर की रचना हो गई है। फिर भी बाण-पुत्र यह कहते हुए तनिक भी रुकते नहीं कि मैंने पिता की वाणी के समुद्रगामी प्रवाह में अपनी वाणी की धारा मिला दी जिससे कथा समाप्ति को प्राप्त सके। उनका यह कथन सर्वथा सत्य है। बाण की धारा में मिल पाने से ही उनकी वाणी यह काम कर सकी, अन्यथा बाण-जैसे वर्णनशिल्पी के सामने किसी दूसरे का डट पाना कभी सम्भव न था। बाण-पुत्र में कुछ-कुछ कवित्व का जो गुण था वह उनके पिता के आशीर्वाद का ही फल था। उन्होंने कादम्बरी के सम्बन्ध में कहा है— कादम्बरीरसभरेण समस्त एव मत्तो न किञ्चिदपि चेतयते जनोऽयम् । भीतोऽस्मि यन्न रसवर्णविवर्जितेन तच्छेषमात्मवचसाऽप्यनुसन्दधानः ॥ अर्थात् कादम्बरी (एक प्रकार की मदिरा तथा कादम्बरीकथा) के उत्तम रस को पीकर सहृदय जनों का वर्ग बिल्कुल छक कर अपनी सुध-बुध खो बैठा है। ऐसी स्थिति में रस और वर्ण से विहीन अपनी बाणी द्वारा कादम्बरी की पूर्ति करते हुए मुझे कुछ भय नहीं, क्योंकि बेहोशी में किसी को पता न चलेगा। बाण की दृष्टि में काव्य का स्वरूप बाण की शैली जानने से पूर्व हमें बाण के विचार में काव्य के स्वरूप को जान लेना चाहिए। बाण काव्य के स्वरूप के सम्बन्ध में अपनी अलग दृष्टि रखते हैं, जैसा कि हर्ष- चरित के आरम्भ में उन्होंने समझाया है। बाण को उन कवियों की कविता पसंद न थी जो राग द्वेष में भर कर मनमाने ढंग से बकवास करते हैं। बाण के अनुसार ऐसे 'वाचाल' और 'कामकारी' लोग ही कुकवि हो जाते हैं। नई वस्तु उत्पन्न करने वाला ही सच्चे अर्थ में कवि कहलाने योग्य है और वही 'उत्पादक' है। बाण केवल स्वभावोक्ति (जाति) के पक्षपाती न थे। प्रायः उन दिनों साहित्य में कविता के नाम पर प्रचुर मात्रा में स्वभा- वोक्तिशैली का प्रचलन था। बाण की प्रतिक्रिया यह थी कि स्वभावोक्ति किसी प्रकार भी कविता नहीं हो सकती; क्योंकि उसमें नवीनता का सर्वथा अभाव रहता है। आगे चलकर अलंकारशास्त्र के आचार्यों ने वक्रोक्तिवाद को खड़ा करके बाण के निर्दिष्ट मार्ग का अनुसरण किया। स्वभावोक्ति एक अलंकारमात्र तक सीमित रह गई। वस्तु के यथार्थ रूप में कोई आकर्षण नहीं रहता, अन्यथा कविता लिखने की कोई आवश्यकता ही नहीं। कवि वस्तु के यथार्थ रूप को बदल डालता है और अपनी प्रतिभा से नई वस्तु का निर्माण करता है, यही बाण का अभिप्रेत पक्ष था। वक्रोक्ति ने श्लेषप्रधान शैली को उत्पन्न किया। श्लेषपूर्ण शैली का काव्य निर्माण भी चल पड़ा। उसकी झलक बाण के पूर्ववर्त्ती सुबन्धु की प्रत्यक्षरश्लेषमय रचना वासवदत्ता में मिलती है। यह शैली बाण की भी पसंद थी। कादम्बरी में उन्होंने लगातार श्लेषों से भरी हुई (निरन्तरश्लेषघना) शैली की प्रशंसा