हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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की है । वस्तु की भावात्मक रचना में जब तक शब्दों की मरोड़ से उत्पन्न नवत्व का साक्षात्कार नहीं मिलता तब तक कवि प्रशंसा के पात्र नहीं, सम्भवतः बाण की यही दृष्टि थी । यह भी बात नहीं कि जाति या स्वभावोक्ति-शैली बाण को सर्वथा अनभिमत थी, उन्होंने अग्राम्या जाति की प्रशंसा की है, अर्थात् वह स्वभावोक्ति जो केवल वस्तु के यथार्थ रूप का चित्रण न होकर सुन्दरतापूर्ण चित्रण हो, बाण को सर्वथा मान्य थी । बाण कविता में समन्वय दृष्टि के पक्षपाती थे । वे एकांगी दृष्टि को कविता के लिए उपयुक्त नहीं मानते थे । उन दिनों प्रायः पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण के कवि लोग एकांगी दृष्टि से काव्य लिखते थे, जैसा कि बाण ने स्वयं निर्देश किया है— श्लेषप्रायमुदीच्येषु प्रतीच्येष्वर्थमात्रकम् । उत्प्रेक्षा दाक्षिणात्येषु गौडेष्वक्षरडम्बरम् ॥ ( हर्ष० ) अर्थात् उत्तर के लोगों में श्लेष-प्रधान शैली में रचना करने की प्रवृत्ति है, पश्चिम के लोग अर्थमात्र पर ध्यान देते हैं, भाषा कैसी भी हो अर्थ बढ़िया होना चाहिए । दाक्षिणात्य लोग उत्प्रेक्षा करने में खूब पड़ हैं, उत्प्रेक्षाशैली उड़न्त भरना या हद तक कल्पना करना है, गौड़ देश के निवासी कवियों में अक्षराडम्बर ही खूब चलता है । अक्षराडम्बर अर्थात् विकट शब्दों की योजना की आनुप्रासिक प्रवृत्ति से तात्पर्य है । इस प्रकार चारों ओर साहित्यिक समाज में एकांगी दृष्टि से काव्य-निर्माण की प्रवृत्ति चल पड़ी थी जो बाण को अभिप्रेत न थी । बाण कविता में सब शैलियों का समन्वय मानते थे । बाण की दृष्टि में बढ़िया काव्य वह है जिसमें पांच बातों का मेल हो— नवोऽर्थो जातिरग्राम्या श्लेषोऽक्लिष्टः स्फुटो रसः । विकटाक्षरबन्धश्च कृत्स्नमेकत्र दुर्लभम् ॥ ( हर्ष० श्लोक १।८ ) अर्थात् विषय की नवीनता, सुन्दर लगने वाली स्वभावोक्ति, श्लेष ऐसा जो क्लिष्ट न हो, स्फुट रस, जिसके निर्णय के लिए सहृदय को विशेष माथा-पच्ची न करनी पड़े, विकट या भारी भरकम शब्दों की योजना । बाण का कहना है कि सब मिल कर ये पाँचों बातें किसी एक काव्य में दुर्लभ हैं, परन्तु सच्चे अर्थ में वही काव्य कहने योग्य है जिसमें इन सब का समन्वय हो । बाण ने अपने काव्यों में इनके समन्वय का हमेशा ध्यान रखा है । बाण की यह समन्वयप्रधान शैली किसी प्रकार के एकांगी दृष्टिकोण के अधीन नहीं रही, यही उसकी विशेषता है । सचमुच श्लाघनीय रचना समन्वयप्रधान दृष्टिकोण का कवि ही कर सकता है, बाण की सफलता का रहस्य भी यही है । बाण रचना में विषय की सर्व- धिक नूतनता, सरल श्लेष-प्रधान शैली की अद्भुत योजना, वस्तुओं का अग्राम्य यथार्थ वर्णन, समासबहुल पदविन्यास तथा कथावस्तु का ग्रंथन, इन सब का विलक्षण सामंजस्य मिल जाता है ।