हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३१ ) कहा गया है कि बाण मनमाने ढंग की कविता करने वाले वाचाल एवं अनुत्पादक कवियों से खूब चिढ़े हुए थे। दूसरे कवि के वर्णों को बदल कर उनके स्थान में अपने शब्द रख कर काव्य निर्माण की प्रवृत्ति रखने वाले कवि बाण के शब्दों में चोर होते हैं। वे सहज ही पकड़े जाते हैं। ऐसे कवियों की रचना किसी अंश में आदर के योग्य नहीं। बाण की दृष्टि में कविता की भूमिका अपने स्वरूप में सर्वथा मौलिक और महत्वपूर्ण है। कविता की सिद्धि के लिए कवि को महती साधना करनी पड़ती है। साधना-विहीन कवि किसी प्रकार भी कविता की उच्च भूमिका में नहीं पहुँच सकता। बाण ने किसी विशेष कवि का नाम लेकर इस प्रकार की कुछ भी निन्दा की बात नहीं कही है। व्यक्तिगत आक्षेप बाण को अभिमत नहीं। प्रशंसा के अवसर पर वे विशेष कवियों की चर्चा हृदय खोल कर करते हैं। इसी प्रसंग में बाण ने अनेक कवियों का आदर-पूर्वक स्मरण किया है। सर्वविद् महर्षि व्यास और आख्यायिका निर्माण करने वाले कवीश्वरों की वन्दना के पश्चात् बाण अपने पूर्ववर्ती गद्यकाव्य वासवदत्ता की प्रशंसा करते हैं। वासवदत्ता सुबन्धु- कृत होनी चाहिए। किन्तु कुछ विद्वानों की कथा के रूप में सुबन्धु की उपलब्ध श्लेष-बहुल- रचना वासवदत्ता आख्यायिका के प्रसंग में कवियों के दर्प को विचलित करने वाली बाण की निर्दिष्ट (आख्यायिका) वासवदत्ता से अतिरिक्त लगती है। अस्तु, वे वासवदत्ता के गुण से प्रभावित अवश्य थे, पर अन्य कवियों की तरह विगलित-दर्प न थे, क्योंकि कादम्बरी के आरम्भिक पद्यों में बाण ने अपनी कथा को 'निरन्तरश्लेषघना' और 'अतिद्वयी' अर्थात् वासवदत्ता और गुणाढ्यकृत बृहत्कथा का अतिक्रमण करने वाली कहा है। फिर बाण ने भट्टार हरिचन्द्र नामक कवि के गद्यबन्ध चर्चा की है, जिसमें पद- बन्ध उज्ज्वल, मनोहर तथा अनुप्रास के रूप में क्रम से वर्णों की स्थिति है। उसकी शैली बाण के लिए आदर्श थी। भट्टार हरिचन्द्र के गद्यबन्ध के उपलब्ध न होने से यह ठीक पता नहीं चलता कि वे कौन थे। सम्भावना है कि राजशेखर ने जिन हरिचन्द्र का उल्लेख किया है वे ही बाण के भट्टार हरिचन्द्र हों। इस प्रकार बाण ने सातवाहन के सुभाषित- कोश गाथासप्तशती, प्रवरसेन की प्रसिद्ध रचना सेतुबन्ध और भास के यशस्वी नाटकों का सादर संस्मरण किया है। महाकवि कालिदास बाणभट्ट के अत्यन्त प्रिय कवि थे। बाण ने उसकी मधुरसान्द्र सूक्तियों में खूब आनन्द लिया था। सचमुच कालिदास के बाद बाण का ही नाम लिया जा सकता है। बाण ने कालिदास को खूब समझा है और उनकी शैली को आदर्श मान कर और भी पल्लवित रूप में निर्माण करने की अद्भुत क्षमता अर्जित की है। गुणाढ्य की बृहत्कथा और आढ्यराज नामक कवि के काव्योत्साह भी बाण के लिए आश्चर्यकारी थे। आढ्यराज की प्रशंसा में बाण कहते हैं कि जिह्वा ही भीतर की ओर खिंच जाती है और कविता करने के लिए प्रवृत्त नहीं होती।