भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 34, कुल 184 में से

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पृष्ठ 34

( ३२ ) इस प्रकार बाणभट्ट जितने अंश में दोषज्ञ थे उतने ही अंश में गुणज्ञ भी। फिर भी किसी विशेष के प्रति उनकी बुरी धारण न थी। बाण के साहित्य में ऐसे व्यक्ति का कोई भी निर्देश नहीं मिलता जिससे बाणभट्ट क्षुब्ध हों। कादम्बरी में उन्होंने थोड़े में ही अपनी काव्यनिर्माणशैली की ओर संकेत किया है। जैसा कि कहा जा चुका है श्लेष- प्रधान शब्दों की अद्भुत योजना बाण की शैली की विशेषता है। कादम्बरी में इस शैली की प्रांजलता का साक्षात्कार होता है। बाण के शब्दों में बाण की शैली को 'निरन्तर- श्लेषघना' कहना चाहिए। आख्यायिका और कथा महाकवि बाण आख्यायिका और कथा दोनों के लेखक हैं। हर्षचरित आख्यायिका है और कादम्बरी कथा। अमरकोश में 'आख्यायिकोपलब्धार्था' कहा है, अर्थात् आख्या- यिका वह कथा है जिसका सत्यार्थ ज्ञात हो। कथा का विषय कल्पित होता है। आगे चल कर आख्यायिका के इस लक्षण का विकास हुआ और भिन्न-भिन्न आचार्यों ने अपनी-अपनी परिभाषा की। हर्षचरित और कादम्बरी को देख कर आख्यायिका का विषय ऐतिहासिक होना और कथा का कल्पनाप्रसूत होना, ऐसा ज्ञात होता है। अग्निपुराण के अनुसार आख्यायिका वह है जिसमें लेखक के वंश की प्रशंसा कुछ विस्तार से हो, कन्याहरण, संग्राम, विप्रलम्भ आदि विपत्तियों का वर्णन हो, रीति और वृत्ति अति प्रदीप्त शैली में हों, परिच्छेदों का नाम उच्छ्वास हो, चूर्णक शैली का बाहुल्य हो तथा वक्त्र और अपवक्त्र नामक श्लोक हों (अग्नि० ३३६।१३-१४)। कथा में इसके विपरीत कुछ श्लोकों में कवि-वंश का संक्षिप्त वर्णन हो, मुख्यार्थ के अवतरण के रूप में दूसरी कथा कही जाय, जिसमें परिच्छेद न हों अथवा कहीं पर लम्बक हों (अग्नि० ३३६।१५-१७)। दण्डी ने भी काव्यादर्श में दोनों के भेद-बताने का प्रयत्न किया है। आख्यायिका का वक्ता स्वयं नायक होता है, कथा का नायक या अन्य कोई; किन्तु यह नियम सर्वत्र लागू नहीं। दण्डी दोनों में किसी विशेष अन्तर के पक्षपाती न थे। नाममात्र का ही भेद है, यही उनका तात्पर्य था। पर बाण ने दोनों को अलग-अलग माना है। हर्षचरित में वक्त्रादि छन्दों का भी प्रयोग किया है और उच्छ्वास के रूप में विभाग किया है। कथा में बाण ने इससे बिल्कुल भिन्न दृष्टि अपनाई है। आगे चल कर आचार्यों ने हर्षचरित और कादम्बरी को देख कर ही आख्यायिका और कथा के लक्षण बनाये हैं। दण्डी के अनुसार नाम-भेद वाला पक्ष किसी को सम्मत नहीं। बाण ने अनेक आख्यायिकाकार कवियों की आख्यायिकाएँ देखी थीं। सम्भवतः महाभाष्य में उल्लिखित वासवदत्ता नाम की आख्यायिका से ही बाण परिचित हों। सुबन्धु की वासवदत्ता, जो कथारूप में अभी उपलब्ध है, बाण के बाद की रचना हो। पतंजलि ने वासवदत्ता के अतिरिक्त सुमनोत्तरा और भैमरथी आख्यायिकाओं का भी

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