हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३३ ) उल्लेख किया है। तात्पर्य यह कि बाण का हर्षचरित संस्कृत-साहित्य की पहली आख्यायिका नहीं, पर यह अवश्य है कि उपलब्ध पहली आख्यायिका यही दृष्टिपथ में आती है। बाण की शैली अब हमें संक्षेप में बाण की शैली के आधार पर वर्णनों का अध्ययन कर लेना चाहिए। बाण के समय से ही चार प्रकट की गद्यशैलियाँ चल पड़ी थीं, जिनमें बाण के साहित्य में तीन मिलती है, जैसे—एक दीर्घ समास वाली, दूसरी अल्प समास वाली और तीसरी समास-रहित । लम्बे-लम्बे समासों वाली शैली को उत्कलिका, छोटे- छोटे समासों वाली शैली को चूर्णक और समासरहित शैली को आविद्ध कहते हैं। बाण को इन तीनों शैलियों में बड़ी सफलता प्राप्त थी। उन्हें किसी विशेष शैली पर आग्रह नहीं था, फिर भी उत्कलिका अर्थात् दीर्घ समास वाली शैली बाण के चित्रात्मक प्रसंग के अनुकूल पड़ती थी। इसलिए बाण वर्णनों में प्रायः इसका आश्रयण करते हैं। हर्षचरित के दधीचिवर्णन, ग्रीष्मवर्णन आदि प्रसंगों में विशेष रूप से यह शैली प्रयुक्त है। वर्णनों में चलचित्र के समान शब्दों के माध्यम से छोटे-छोटे चित्र प्रस्तुत करने पड़ते हैं। संस्कृत भाषा की महती विशेषता है कि उन लघु चित्रों को प्रस्तुत करने में कवि कई शब्दों को गूँथकर एक लड़ी बना डालता है। बाण के जिस वर्णन को लीजिए, उसमें दीर्घ समासोंवाली शैली मिलेगी। वर्णन के अन्त में प्रायः बाण उत्कलिका को छोड़कर समासरहित आविद्ध शैली का आश्रयण करते हैं। आविद्ध शैली में किसी चित्र को प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। वस्तु से सम्बन्धित कुछ बातों की सामान्य चर्चा के लिए यह उपयोगी है। बाण ने अपने वर्णनों में प्रायः ऐसा ही किया है। चूर्णकशैली को जिसमें छोटे-छोटे समास होते हैं, बाण खूब लिखते हैं। इसके लिए कोई खास नियम नहीं है। वर्णन करते-करते कभी-कभी शास्त्रीय उपदेश भी करने की प्रवृत्ति बाण के साहित्य में जगह-जगह मिलती है। उसमें प्रायः अल्पसमास चूर्णकशैली बाण को पसंद है। बाण की शैली का निखरा हुआ रूप हर्षचरित के चतुर्थ उच्छ्वास में जहाँ राज्यश्री के विवाह का प्रसंग है, मिलता है। हर्षचरित की अपेक्षा कादम्बरी के वर्णन चित्रमयता और प्राञ्जलता तथा सरसता की दृष्टि से अपूर्व बन पड़े हैं। महाश्वेता, कादम्बरी आदि के वर्णनों में बाण की अलौकिक वर्णन-क्षमता का परिचय मिलता है। बाण स्वयं कादम्बरी में गद्य की उत्कृष्ट शैली की ओर संकेत करते हुए लिखते हैं— उत्कृष्टकविगद्यमिव विविधवर्णश्रेणिप्रतिपाद्यमानाभिनवार्थसञ्चयम् ।' अर्थात् नाना प्रकार के वर्णों द्वारा नये अर्थ-समूह का प्रतिपादन करने वाला गद्य उत्कृष्ट होता है अथवा वह उत्कृष्ट कवि द्वारा लिखा जाता है। रीति की दृष्टि से बाण में पाञ्चाली रीति का प्राचुर्य है : स्वयं भोजराज भी इसे स्वीकार करते हैं— ३ ह० भू०