हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
पृष्ठ 36, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३४ ) शब्दार्थयोः समो गुम्फः पाञ्चाली रीतिरिष्यते । शीलाभट्टारिकावाचि बाणोक्तिषु च सा यदि ॥ (सरस्वतीकण्ठाभरण) अर्थात् शब्द और अर्थ का समान रूप से गुम्फन पाञ्चाली रीति में होता है, वह शीलाभट्टारिका और बाण दोनों की उक्तियों में पाई जाती है। विषय के अनुरूप शब्दावली का प्रयोग ही पाञ्चाली रीति का तात्पर्य है। बाण इसके सिद्धहस्त कवि हैं। इस भूमिका में बाण के जीवन और साहित्य के सम्बन्ध में कुछ उपयोगी बातों की चर्चा की गई है। आशा है बाण के विद्यार्थी इससे लाभान्वित होंगे। श्रद्धेय डा० वासुदेव शरण जी अग्रवाल ने हर्षचरित और कादम्बरी पर अलग-अलग अपना सांस्कृतिक अध्ययन प्रस्तुत किया। भूमिका में मैंने उनकी दृष्टि का बहुत अंश में अनुसरण करने का प्रयत्न किया है। बाण के साहित्य को जानने के लिए जो कुछ अन्य स्रोत भी मिले हैं मैंने उनका उपयोग किया है। अनुवाद के सम्बन्ध में हर्षचरित का अनुवाद मैंने किया यह कहने की हिम्मत मुझमें नहीं। अनुवाद आरम्भ करने के पूर्व मैंने अपने गुरुदेव डा० अग्रवाल जी से इस सम्बन्ध में पूछा था। उन्होंने सहर्ष अनुमति दी और उत्साहित किया। तत्काल स्वयं चौखम्बा विद्याभवन के अध्यक्ष महोदय से उन्होंने बातें भी कर लीं और मुझे अनुवाद तैयार करने के लिए सूचित किया। उन्होंने उत्साहित करते हुए यह कहा कि कहीं शंका हो तो पूछ लेना। मैंने अपना कार्य आरम्भ कर दिया। इसी बीच अध्यापनार्थ मुझे वैद्यनाथधाम गुरुकुल आना पड़ा। मैं ज्यों-ज्यों आगे बढ़ता गया मेरी कठिनाइयाँ भी बढ़ने लगीं। किसी- किसी प्रसंग में मैंने अपने आपको सर्वथा असमर्थ पाया। अनुवाद की परिसमाप्ति की लोलुपता और गुरुदेव का असांनिध्य दोनों ने मुझे अहोरात्र उद्वेलित किया, तब मैंने ऐसे प्रसंगों में 'हर्षचरित एक सांस्कृतिक अध्ययन' की शरण ली और बड़ी सरलता से पूरे ग्रन्थ का अनुवाद तैयार कर लिया। इस अनुवाद की आधारभित्ति गुरुदेव की कृति ही है। अतः गुरुदेव के लिए मैं अपनी कृतज्ञता कैसे प्रकट करूँ ? आशा है वे मेरी विवशताजन्य धृष्टता को क्षमा कर देंगे। चौखम्बा विद्याभवन के अध्यक्ष महोदय धन्यवाद के पात्र हैं, जिन्होंने मेरे अनुवाद को अपने यहाँ से प्रकाशित किया और आगे के कार्य के लिए भी प्रेरित किया है। जगन्नाथ पाठक