भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 184 में से

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पृष्ठ 44

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri २ हर्षचरितम् 'हरकण्ठग्रहानन्दमीलिताक्षीं नमाम्युमाम् । कालकूटविषस्पर्शजातमूर्च्छागमामिव ॥ २ ॥ लग्नं च पट्टबन्धादिवदुत्प्रेक्षणानन्तरमुन्नते पृष्ठदेशे चन्द्रतुल्यं श्वेतं चामरं क्रियत इति स्थितिः । केचित्पुनः—त्रैलोक्यनगरस्यारम्भे मूलं मूलकारणं परमाणवस्तेषामुपाय- श्रयेण मूलकारणत्वात्स्तम्भ इव । ते हि तद्वशात्कार्यमारभन्ते । तस्य निमित्त- कारणत्वादित्याहुः । 'स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः' इति नामसहस्रे दृष्टत्वाद्धरेः, 'शम्भु- र्ब्रह्मत्रिलोचनो' इत्यभिधानकोशदर्शनाच्च ब्रह्मणोऽपि नमस्कारोऽयमित्यन्ते वदन्ति । व्याकुर्वते च हरिपक्षे—त्रैलोक्याक्रमणकाले । यद्वा—'यस्याग्निरास्यं द्योर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ मही' इत्यभिप्रायेण तुङ्गमूच्छ्रितं शुभलक्षणं यच्छिरस्तच्चुम्बिचन्द्र एव चामरं तेन चारवे । ब्रह्मपक्षे—चन्द्रः स्वर्णं तन्मयं चामरमिव चामरं केशकलापा 'हिरण्यकेशो हि ब्रह्मा त्रैलोक्यादीनि शेषं सर्वत्र तुल्यमिति ॥ १ ॥ हरेत्यादिना । प्रियं प्रति गाढस्नेहादि सौकुमार्यं चोपमयोच्यते । कालकूटविषेति अर्थसार्थः सामान्यपदप्रयोगो मेरुमहीधरचूतवृक्षादिवत् । आग्रमः प्रारम्भः ॥ २ ॥ उमा को प्रणाम करता हूँ, जिनकी आँखें शिव के कण्ठालिङ्गन के आनन्द से मूँद गई हैं, मानों शिव के गले में स्थित कालकूट विष के स्पर्श हो जाने से उन्हें मूर्च्छा आ गई हो ॥ २ ॥ कहा है, जिस प्रकार शङ्कर के उन्नत मस्तक पर चन्द्र की शोभा है उसी प्रकार प्राचीन वास्तुकला के अनुसार पहले मूलस्तम्भों पर चन्द्राकृति चँवर बनाये जाते थे, जो स्तम्भ के उपरिभाग में लगे होते थे । चन्द्र के साथ चँवर का अभेद इस अंश में भी है कि दोनों श्वेतवर्ण एवं श्रमापहारक हैं, चन्द्र की किरणों के समान ही चँवर के उजले केश-जाल छिटके रहते हैं । किसी के अनुसार ईश्वर (शिवजी) जगत् के निमित्त कारण होने से त्रिभुवन रूपी नगर के आरम्भ में मूल अर्थात् मूलकारण (उपादान कारण) परमाणुओं के आधार हैं, स्तम्भ हैं। किसी ने इस श्लोक को ब्रह्माजी और विष्णु के पक्ष में भी लगाया है । विष्णु के वामनावतार में त्रैलोक्य को लांघने के समय उनके सिर से चन्द्र का चँवर लग गया, अथवा आकाश रूप उनके सिर से चँवर रूप चन्द्र लगा रहता है । और ब्रह्माजी हिरण्यकेश होने के कारण स्वर्णमय केशकलाप वाले हैं। इस पक्ष में चन्द्र का अर्थ हिरण्य या सुवर्ण है । पाठान्तरम्—१. हरकण्ठाग्रहानन्द । २. स्पर्शाज्जात । CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

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