भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 52

१० | हर्षचरितम् 'आढ्यराजकृतोत्साहैर्हृदयस्थैः स्मृतैरपि । जिह्वान्तःकृष्यमाणेव न कवित्वे प्रवर्तते ॥ १८ ॥ तथापि नृपतेर्भक्त्या भीतो निर्वहणाकुलः । करोम्याख्यायिकाम्भोदौ जिह्वाप्लवनचापलम् ॥ १९ ॥ सुखप्रबोधललिता सुवर्णघटनोज्ज्वलैः । शब्दैराख्यायिका भाति शय्येव प्रतिपादकैः ॥ २० ॥ आढ्येति । आढ्यराजः कश्चित्कविः । उत्साहो नृत्ते तालविशेषः । उदीर्यमाणऽ- गीत्याधारभूतपदोपचारात्काव्यमप्युत्साह इति केचित् । यत्र पूर्वं श्लोकेनार्थ उपक्षि- प्यते, पश्चात्स एव गद्येन वितन्यते, मध्ये वृत्तानिबन्धश्च भवति, स परिसमाप्तार्थ उत्साह उच्यत इत्यन्ये । अपिः समुच्चये । यद्वा—आढ्यराजहृदयस्था अप्यन्तर्जिह्वां नाकर्षयन्ति, तत्कथा त एव स्मृता इत्यपि शब्दार्थः ॥ १८ ॥ एवमनौद्धत्यमुक्तवाह—तथेत्यादि । तथापीत्थं जानन्नपि जिह्वाप्लवनलक्षणं चापलं करोमि । यतो नृपतेर्भक्त्याहमभि इतः समन्ताद्युक्तः । निर्वहणे समाप्ता- वाकुलः । जिह्वा चाम्भावकालवातस्तत्र वहन्त्यां कश्चिद्यथा प्लवनरूपं चापलं करोति । अत्र पक्षे—अभीतोऽत्रस्तः निर्वहणं पारप्राप्तिः । 'कृत्ये च' इति णत्वम् ॥ १९ ॥ सुखेत्यादि । सुखेन जायासम्मितत्वेन हृदयाह्लादनपूर्वम्, न तु वेदितहासादि- वत्, यः प्रबोधः प्रकृष्टं बोधनं धर्मादिसाधनव्युत्पत्तिः । उक्तं च—'कटुकोषधि- आढ्यराज के उत्साह या महान् कार्य को हृदयस्थ करके स्मरण करने पर मानो मेरी जीभ मुँह के भीतर की ओर खिंची जा रही है और कविता करने में प्रवृत्त नहीं हो रही है (निष्कर्ष यह कि आढ्यराज के सामने मैं कवि बनने का साहस नहीं कर पा रहा हूँ) ॥ १८ ॥ ऐसा जानता हुआ भी मैं सम्राट् के प्रति अपने असाधारण अनुराग से प्रेरित होकर आख्यायिका रूपी समुद्र को पार करने में आकुलता और भय का अनुभव करते हुए भी अपनी जीभ (अर्थात् वाणी द्वारा) के चप्पू द्वारा तैरने की चपलता कर रहा हूँ ॥ १९ ॥ बिना किसी आयास के सुखपूर्वक समझ में आ जाने से सुन्दर लगने वाली और आकर्षक रचना वाले एवं विवक्षित अर्थ को व्यक्त करने वाले शब्दों से आख्यायिका उस शय्या के समान शोभित है जिसपर सुखपूर्वक नींद तोड़ी जाती है और जो सोने से मढ़े पायों से चमकती है ॥ २० ॥ १. आद्य । २. घटनोज्ज्वला; घटिटोज्ज्वला ।