भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 184 में से

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पृष्ठ 82

४० हर्षचरितम् कान्तोच्चकुचचक्रवाकयुगलविपुलपुलिनेनोरःस्थलेन स्थूलभुजायाम- पुञ्जितम्, पुरो विस्तारयन्तमिव दिक्‍चक्रम्, पुरस्तादीषदधोनाभि- निहितककोणकमनीयेन पृष्ठतः कक्ष्याधिकक्षिप्तपल्लवेनोभयतःसंवलन- प्रकटितोरुत्रिभागेन हारीतहरिता निबिडनिपीडितेनाधरवाससा विभज्यमानतनुतरमध्यभागम्, अनवरतश्रमोपचितमांसकठिनविकट- मकरमुखसंलग्नजानुभ्यामतिविशालवक्षःस्थलोपलवेदिकोत्तम्भनशिलास्त- म्भाभ्यां चारुचन्दनस्थासकस्थूलतरकान्तिभ्यामूरुदण्डाभ्यामुप- हसन्तमिवैरावतकरायामम्, १अतिभरितोरुभारवहनखेदेनेव तनु- तरजङ्घाकाण्डम्, कल्पपादपपल्लवद्वयस्येव पाटलस्योभयपार्श्ववि- मानः पल्लवो यस्य तत् । संवलनं संकोचनम् । हारीतः पक्षिभेदः । हरिता नीलेन । मकरमुखं जानुनोरुपरिभागः । उत्तम्भनं धारणम् । स्थासकश्चन्द्रकः । आयामो दैर्ध्यम् । न केवलमायामं शुक्‍लत्वमप्युपहसन्तम् । धर्मयोरेकनिर्देशोऽन्यसंवित्साह- चर्यात । 'अतिभरितोरुभारवहनेन' इति पाठः । ऊरु एव भारः । प्रशस्ता जङ्घा कपूर के चूर्ण की मूठों से धूसरित उसकी छाती कान्ता के ऊँचे स्तन रूपी चक्रवाक युगल के लिए चौड़ी रेतीली जमीन थी, ऐसी छाती से वह मानों अपनी स्थूल भुजाओं के आयात में पुंजीभूत दिशाओं को फैला रहा था। हारीत पक्षी के समान नील वर्ण का कस कर बँधा हुआ अधोवस्त्र उसकी पतली कमर को विभाजित कर रहा था, सामने की ओर नाभि से कुछ नीचे उसका एक कोना बहुत अच्छा लग रहा था, उस अधोवस्त्र का कच्छ भाग पीछे की ओर पल्ला खोंसने के बाद भी कुछ ऊपर निकला रहता था। दोनों ओर शरीर के मोड़ने से दाहिनी जांघ का कुछ भाग दिखाई दे जाता था। वह अपने ऊरुदण्डों से ऐरावत की सूँड का मानों उपहास कर रहा था, दोनों जांघों का मांस हमेशा व्यायाम करते रहने से बढ़ गया था, वे ऐसी लगती थीं मानों कठिन और विकट मगर के मुख में फँस गई हों, वे चौड़ी छाती के चबूतरे को धारण करने के लिए शिलास्तम्भ थीं। चन्दन के सुंदर थप्पे से उसकी जाँघों में कान्ति और भी निखर उठी थी। हद से ज्यादा उभरी हुई जाँघों के भार-वहन करने से खिन्न होकर मानों उसकी टांगें पतली हो रही थीं। कल्पवृक्ष के दो पल्लवों के समान ललछूहू रंग के दोनों ओर लटकते हुए पैरों के नखों की किरणें डोलती हुई मानों घोड़ों का चामरमाला नामक अलंकार बना रही थीं। १. अतिभरितोरुभागभर ।