भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

प्रथम उच्छ्वासः ३९ सेव द्राघीयसा नासावंशेन शोभमानम्, अतिसुरभिसहकारकर्पूर- कक्कोललवङ्गपारिजातकपरिमलपुचा मत्तमधुकरकुलकोलाहलमुखरेण मुखेन सनन्दनवनं वसन्तमिव अवतारयन्तम्, आसन्नसुहृत्परिहास- भावनोत्तानितमुखमुग्धहसितेर्दशनज्योत्स्नास्नपितदिङ्मुखैः पुनः- पुनर्नभसि संचारिणं चन्द्रालोकमिव कल्पयन्तम्, कदम्बमुकुलस्थूल- मुक्ताफलयुगलमध्याध्यासितमरकतस्य त्रिकण्टककर्णाभरणस्य प्रेङ्खतः प्रभया समुत्सर्पन्त्या कृतसकुसुमहिरत्कुन्दपल्लवकर्णावतंस- मिवोपलक्ष्यमाणम्, आमोदितमृगमदपङ्कलिखितपत्रभङ्गभास्वरम्, भुजयुगलमुद्दाममकराक्रान्तशिखरमिव मकरकेतुकेतोः दण्डद्वयं दधानम्, धवलब्रह्मसूत्रसीमन्तितं सागरमथनसामर्षगङ्गास्रोतस्संदानित- मिव मन्दरं देहमुद्वहन्तम्, कर्पूरक्षोदमुष्टिच्छुरणपांशुलेनेव कारफलेनैव क्रियते । पारिजातकोऽनेकद्रव्यसंस्कृतो मुखवासविशेषः, देववृक्षश्च । वसन्तश्चैवंविधेनैव मुखेन प्रारम्भेणोपलक्षितो भवति । रत्नत्रितयेन कृतं त्रिकोण- कण्टकाख्यं कर्णाभरणम् । मृगमदः कस्तूरिका । संदानितं बद्धम् । वेष्टितमित्यर्थः । कुचावत्र कान्तासंबन्धिनादेय चक्रवाकयुगलं तस्य कृते पुलिनसदृशम् । कोणः पल्लवः । पृष्ठतः पश्चाद्भागे कक्ष्यायाः परिवलनाधिकसूत्रितिरित्युक्तः । क्षिप्तो लम्ब- शिलातल से चू कर बहता हुआ कान्ति का प्रवाह हो, ऐसे वह अपने नासावंश से सुशो- भित था। सहकार, कर्पूर, कक्कोल, लवङ्ग ओर पारिजातक इन पाँच सुगन्धित पदार्थों की गन्ध उसके मुख से निकल रही थी, उस पर मतवाले भौंरे गुञ्जार रहे थे, मानों वह चन्दन वन के सहित वहाँ वसन्त को उतार रहा था। वह जब कभी अपने पास के मित्रों के साथ परिहास की भावना से मुँह ऊँचा करके हँसता था तो समस्त दिशाएँ उसके दातों की चाँदनी में धुल जाती थी और मानों वह आकाश में बार-बार संचरण करने वाले चन्द्रा- लोक का निर्माण कर रहा था। उसके कान में त्रिकंटक नाम का गहना था, जो कदम्ब के कुडमल के समान दो स्थूल मोतियों के बीच में पन्ने का जड़ाव करके बनाया गया था, ऐसे त्रिकंटक की प्रभा फैल रही थी, मानों उस युवक ने फूल के सहित कुन्द के हरे पल्लवों को कर्णावतंस बना लिया हो। सुगन्धित कस्तूरी के पंक की बनी हुई पत्ररेखाओं से उसके दोनों हाथ चमक रहे थे, मानों कामदेव की पताका के बड़े-बड़े मकरों से आक्रान्त शिखर वाले दो डंडे हों। मानों समुद्रमंथन से क्रुद्ध गंगा की धाराओं से जकड़े हुए मन्दराचल के समान श्वेत यज्ञोपवीत से वेष्टित शरीर को वह धारण कर रहा था।