भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 184 में से

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पृष्ठ 80

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ३८ हर्षचरितम् तम्बविलम्बिन्या मालतीशेखरस्रजा सकलभुवनविजयार्जितया रूपपता- कयेव विराजमानम्, उत्सर्पिभिः शिखण्डखण्डिकापद्मरागमणेररुणे- रंशुजालैरदृश्यमानवनदेवताविधूतैर्बालपल्लवैरिव प्रमृज्यमानमार्गरणु- परुषवपुषम्, बकुलकुड्मलमण्डलीमुण्डमालामण्डनमनोहरेण कुटिल- कुन्तलस्तबकमालिना मौलिना मीलितातपं पिबन्तमिव दिवसम्, पशुपतिजटामुकुटमृगाङ्कद्वितीयशकलघटितस्येव सहजलक्ष्मीसमा- लिङ्गितस्य ललाटपट्टस्य मनःशिलापङ्कपिज्जलेन लावण्येन लिम्पन्त- मिवान्तरिक्षम्, अभिनवयौवनारम्भावष्टम्भप्रगल्भदृष्टिपाततृणीकृत- त्रिभुवनस्य चक्षुषः प्रथिम्ना विकचकुमुदकुवलयकमलसरःसहस्र- सच्छादितदशदिशं शरदभिव प्रवर्तयन्तम्, आयतनयननदीसीमन्त- सेतुबन्धेन ललाटतटशशिमणिशिलातलगलितेन कान्तिसलिलस्रोत- नितम्बशब्दो मुख्यार्थः । 'पश्चान्नितम्बः स्त्रीकट्याः' इत्यमरः । शिखण्डखण्डिका चूडाभरणम् । प्रमृज्यमानेति । वर्तमानकालोऽत्र विवक्षितः । बकुलेत्यादिना निपीय- मानातातपपुल्यवस्तुनिदर्शः । कुन्तलः केशहस्तः, स एव स्तबकः । पुष्पस्तबकः पुष्पसंघात सहजाऽकृत्रिमा, सहोत्पन्ना च । लक्ष्मीः शोभना, श्रीश्च । लावण्यमत्र कान्तिः । अवष्टम्भो गर्वः । द्राघीयसा दीर्घतरेण । सहकारः सुगन्धद्रव्यभेदः सह- दिशाएं एकत्र होकर अनुसरण कर रही हों। मालती की शेखरस्रज उससे नितम्ब तक लटक रही थी, मानों वह समस्त भुवनों की विजय करने से प्राप्त रूप की पताका से विराज- मान हों । शिखण्ड-खण्डिका नामक उसके शिरोभूषण में जड़ी हुई पद्मराग मणि की लाल किरणें फैल रही थीं, मानों दृष्टिपथ में न आने वाली वनदेवता बालपल्लवों द्वारा मार्ग की धूल से उसकी रूखर देह को झाड़ती हो । मौलसिरी के कुड्मलों से बनी हुई मुण्डमाला से मनोहर एवं घुँघराले बालों के गुच्छों से भरे हुए अपने शिर से दिन के आतप को मन्द करता हुआ वह मानों दिन को पी रहा था। उसका ललाट शिव के ललाट के मुकुटचन्द्र के दूसरे खण्ड से मानों बना हुआ था और उसमें स्वाभाविक शोभा थी, मानों वह मनःशिला के पंकसदृश लाल-पीले अपने ललाट के लावण्य से सारे अन्तरिक्ष को लीप रहा था। वह नई जवानी के आरम्भ में गर्वीले और उद्धत दृष्टिपात करने वाली अपनी आँखों से सारे संसार को तृण के बराबर समझ रहा था, ऐसी आँखों की दीर्घता से मानों वह कुमुद, कुवलय और कमल से भरे हुए हजारों सरोवरों से समस्त दिशाओं को ढकने वाली शरत् को प्रवर्तित कर रहा था। उसका नासावंश मानों दीर्घ नयनों की नदी के सीमान्त में बनाया गया पुल का बाँध हो, या उसके ललाटरूपी चन्द्रकान्तमणि के