हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
पृष्ठ 79, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उच्छ्वासः ३७ हाटककटकेन, द्विगुणपट्टपट्टिकागाढग्रन्थिग्रथितासिधेनुना, अनवरत- व्यायामकृतकर्कशशरीरे, वातहरिणयूथेनेव मुहुर्मुहुः खमुड्डोयमानेन, लङ्घितसमविषमावटविटपेन, कोणधारिणा, कृपाणपाणिना, सेवा- गृहीतविविधवनकुसुमफलमूलपर्णेन, 'चल चल, याहि याहि, अप- सर्पापसर्प, पुरः प्रयच्छ पन्थानम्' इत्यनवरतकृतकलकलेन युवप्रायेण, सहस्रमात्रेण पदातिजनेन सनाथमश्ववृन्दं सददर्श । मध्ये च तस्य सार्धचन्द्रेण मुक्ताफलजालमालिना विविधरत्न- खण्डखचितेन शङ्खक्षीरफेनपाण्डुरेण क्षीरोदेनेव स्वयं लक्ष्मीं दातु- मागतेन गगनगतेनातपत्रेण कृतच्छायम्, अच्छाच्छेनाभरणद्युतीनां निवहेन दिशामिव दर्शनानुरागलग्नेन चक्रवालेनानुगम्यमानम्, आनि- 'प्रकोष्ठमन्तरं विद्यादरत्निमणिबन्धयोः' । हाटकं स्वर्णम् । यदेव द्विगुणाऽत एव गाढग्रन्थिसहत्वन् । ग्रथिताविस्रंसिनी । असिधेनुश्छुरिकः । वातहरिणो यो वाता- भिमुखं धावति । अवट उन्मार्गः । कोणो लगुडः । मध्य इत्यादि । तस्य च मध्येऽष्टादशवर्षदेशीयं युवानमद्राक्षीदिति सम्बन्धः । क्षीरोदस्याप्यर्थंचन्द्रादि सर्वं योज्यम् । छाया कान्तिरिप । चक्रवालेन समूहेन । उन्होंने अपने सिर पर चादर की पगड़ी बाँध ली थी । उनके बायें हाथ की कलाइयों में सोने के कड़े थे । उनकी कमर में कपड़े की दोहरी पेटी की मजबूत गाँठ थी और उसमें छुरी खोंसी हुई थी । निरन्तर व्यायाम करने से उनका बदन कड़ा था । हवा से बात करने वाले हिरनों की तरह वे मानों आकाश में उड़ते-चल रहे थे । वे ऊबड़-खाबड़ जमीन, खाइयों और झाड़ियों को डाँकते जाते थे । कुछ सैनिक मुँगरी या डंडे लिये थे और कुछ के हाथ में तलवारें थीं । सहायता के लिए उन्होंने बनैले फूल, फल, मूल और पत्ते ले लिये थे । 'चलो-चलो', 'जाओ जाओ', 'आगे रास्ता दो' इस तरह हमेशा शोर-गुल मचा रहे थे । सरस्वती ने घोड़ों की उस टुकड़ी के बीच में अट्ठारह वर्ष के एक अश्वारोही युवक को देखा । अर्धचन्द्र से युक्त, मोतियों की मालाओं वाला, अनेक प्रकार के रत्नों से खचित, शंख और दूध के फेन की तरह उजला छत्र उस पर छाया कर रहा था, मानों लक्ष्मी को उसे स्वयं अर्पित करने के लिए क्षीरसमुद्र ही आकाश में लहरा रहा हो । आभूषणों की निर्मल किरणें इस तरह उसका पीछा कर रही थी मानों उसके दर्शन के अनुराग से सारी