हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ | हर्षचरितम् एवमतिक्रामत्सु दिवसेषु गच्छति च काले याममात्रोद्गते च रवा- वुत्तरस्यां ककुभि प्रतिशब्दपूरितवनगह्वरं गम्भीरतारतरं तुरङ्गहेषित- ह्लादमशृणोत् । उपजातकुतूहला च निर्गत्य लतामण्डपादवलोकयन्ती विकचकेतकीगर्भपत्रपाण्डुरं रजःसङ्घातं नातिदवीयसि संमुखमपत- न्तमपश्यत् । क्रमेण च सामीप्योपजायमानाभिव्यक्ति तस्मिन्महति शफरोदरधूसरे रजसि पयसीव मकरचक्रं प्लवमानं पुरः प्रधावमा- नेन, प्रलम्बकुटिलकचपल्लवघटितललाटजजूटकेन, धवलदन्तपत्रिका- द्युतिहसितकपोलभित्तिना, पिनद्धकृष्णागुरुपङ्ककल्कच्छुरणकृष्ण- शबलकषायकञ्चुकेन, उत्तरीयकृतशिरोवेष्टनेन, वामप्रकोष्ठनिविष्टस्पष्ट- यामः प्रहरः । नक्तंदिवशब्देन तत्कालनिर्वर्तनीयं कर्मैव लक्ष्यते । गम्भीरश्चिर- कालस्थितः । तारतरो दूरदेशश्रूयमाणः । हेषितमश्वशब्दः । तद्रूपो ह्लादो ध्वनि- स्तम् । क्रमेणेत्यादावश्ववृन्दं संददर्शेति संबन्धः । शफरा मत्स्याः । तदुदरवत्तद्व- धूसरे । प्रलम्बेत्यादिना सज्जत्वमुक्तम् । कचाः । केशाः । सौकुमार्यात्पल्लवानीव । घटितललाटजूटता दाक्षिणात्येषु वेषः । दन्तपत्रिका कर्णामरणभेदः । पिनद्धो बद्धः । कृष्णागुरुणः पङ्को निघृष्टं कृष्णागुरुः, तस्य शुष्कस्य सतः कल्कक्षूर्णः, तच्छुरणा- त्कृष्णेन गुणेन शबलं कषायं साधिवासितं कञ्चुकं वारबाणं यस्य । उत्तरीयेत्यादिना । सन्नद्धतां वर्मादिप्रसङ्गं चाह । वामेत्यनेनाश्रमस्वभाववर्णना शृङ्गारिता चोक्ता । रक्षा मात्र के लिए अत्यल्प भोजन किया । इस प्रकार उसी लतामण्डप के शिलातल पर पत्तों की सेज बनाकर लेट गई । दूसरे दिन इसी क्रम से उसने रात-दिन गुजारे । इस तरह कई दिन बीत गए । समय बहुत चला गया । एक रोज एक पहर दिन चढ़ गया, तब सावित्री को उत्तर दिशा की ओर घोड़ों की हिनहिनाहट भरी आवाज सुन पड़ी, वह अपने शब्दों से वन की घांधियों को भर रही थी और अत्यन्त गम्भीर एवं तीखी थी। सरस्वती के मन में कुतूहल हुआ तो लतामण्डप से निकल आई और उसने सामने थोड़ी ही दूर पर खिले हुए केवड़े के पत्तेदार गर्भ के समान सफेद उड़ती हुई धूलराशि को देखा। क्रम से जब वह और भी समीप आ गई तो मछली के पेट के समान धूसर वर्ण वाले उस धूलि-पटल में एक सहस्र प्रायः युवकों को पैदल सेना के साथ घोड़े इस तरह चलते हुए दिखाई पड़े मानों जल में झुण्ड के झुण्ड मगर तैर रहे हों । (पैदल सेना के दो हजार जवान) आगे की ओर दौड़ते आ रहे थे । उनके सिर पर लम्बे और घुँघराले बालों का बंधा हुआ जूड़ा था । उनके कपोलों पर हाथीदांत के बने पत्ते हँसी की चमक उत्पन्न कर रहे थे । वे काले अगुरु की बुँदकियों के छींटे वाले लाल रंग के कंचुक कसे हुए थे ।