हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकृतमन्दाकिनीद्युतेरस्य महानदस्योपकण्ठभूमयः । पक्षपाति च हृदय- मत्रैव स्थातुं मे' इति । अभिनन्दितवचना च तथेति तया तस्य पश्चिमे तीरे समवातरत् । एकस्मिंश्च शुचौ शिलातलसनाये तटलतामण्डपे गृहबुद्धिं बबन्ध । विश्रान्ता च नातिचिरादुत्थाय सावित्र्या सार्धमु- च्चितार्चनकुसुमा सस्नौ । पुलिनपृष्ठप्रतिष्ठितशिवलिङ्गा च भक्त्या परमया परब्रह्मपुरःसरां सम्यङ्मुद्राबन्धविहितपरिकरां ध्रुवागीतिगर्भा- मवनिपवनवनगगनदहनतपनतुहिनकिरणयजमानमयीमूर्त्तिरष्टावपि ध्या- यन्ती सुचिरमष्टपुष्पिकामदात् । अयत्नोपनतेन फलमूलेनामृतरसमप्य- तिशिशयिषमाणेन् च स्वादिम्ना शिशिरेण शोणवारिणा शरी- स्थितिमकरोत् । अतिवाहितदिवसा च तस्मिँल्लतामण्डपशिलातले कल्पितपल्लवशायना सुष्वाप । अन्येद्युरप्यनेनैव क्रमेण नक्तंदिनमत्य- वाहयत् ।
ध्रुवाख्या विशिष्टा गीतिः । वनं तोयम् । यजमान उग्रः । अष्टौ पुष्पाण्येवाष्ट- पुष्पिका । तत्र गन्धप्रधानं पार्थिवम्, अर्घस्नानादिकं रसप्रधानमाप्यम्, प्रदीपा- भरणप्रभादिरूपप्रधानं तैजसम्, अनुलेपनप्रभृति स्पर्शप्रधानं वायवीयम्, सुषिरा- तोद्यगीतादिकं शब्दप्रधानमाकाशीयम्, अनुध्यानं मानसम्, अस्ति सर्वत्रैवेश्वर इति निश्चयो बौद्धम्, अहमेवेश्वर इत्याहंकारिकम् । यद्वा, आसनवर्गप्रवृत्तिष्वष्टसु प्रत्ये- कमष्टपुष्पिका । अतिशेतुमभिमवितुमिच्छतातिशिशयिषमाणेन । स्वादिम्ना मृष्ट- त्वेन । शरीरस्थितिमिति । न त्वातृप्तिभोजनम् । अन्येद्युरन्यस्मिन्नहनि ।
भौंरे वीणा के समान गुञ्जार कर रहे हैं। इसके सामने मन्दाकिनी भी कुछ नहीं। मेरा हृदय भी इसी स्थान में रहने के पक्ष में है।' सावित्री ने 'तथा' कह कर सरस्वती की बात का समर्थन किया। तब सरस्वती उसे लेकर उस महानद के पश्चिमी तीर पर उतरी। वहीं एक पवित्र शिलातल से युक्त लतामण्डप को घर मान कर ठहर गई। कुछ देर तक विश्राम करने के बाद उठी और सावित्री के साथ पूजा के फूल चुन कर स्नान किया। तब उसने नदी के किनारे रेत में बैठ कर बालू का शिवलिंग प्रतिष्ठित किया और परब्रह्म की स्तुति के अनन्तर सम्यक् प्रकार से कई मुद्राबन्ध किए और ध्रुवागीति के साथ पृथिवी, वायु, जल, आकाश, अग्नि, सूर्य, चन्द्र और यजमानमयी शिव की आठ मूर्तियों का देर तक ध्यान करती हुई आठ फूलों को अर्पित किया। किसी यत्न के बिना ही मिले हुए अमृत-रस से भी बढ़ कर मीठे फल-फूल से और शोण के ठण्डे जल से उसने शरीर की