हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ हर्षचरितम् नगरद्वारस्य, अंशुकोष्णीषपट्टिकामिव सुमेरुनृपस्य, दुगूलकदलिका- मिव कैलासकुञ्जरस्य, पद्धतिमिवापवर्गस्य, नेमिमिव कृतयुगस्य सप्त- सागरराजमहिषीं मन्दाकिनीमनुसरन्ती मर्त्यलोकमवततार। अपश्य- च्चाम्बरतलस्थितैव हारमिव वरुणस्य, अमृतनिर्झरमिव चन्द्राचलस्य, शशिमणिनिष्यन्दमिव विन्ध्यस्य, कर्पूरद्रुमद्रवप्रवाहमिव दण्डकार- ण्यस्य, लावण्यरसप्रस्रवणमिव दिशाम्, स्फाटिकशिलापट्टशयनमि- वाम्बरश्रियः स्वच्छशिशिरसुरसवारिपूर्णं भगवतः पितामहस्यापत्यं हिरण्यवाहनामानं महानदम्, यं जनाः शोण इति कथयन्ति। दृष्ट्वा च तं रामणीकहृतदया तस्यैव तीरे वासमरचयत्। उवाच च सावित्री—'सखि, मधुरमयूरविरुतः कुसुमपांशुपटलसिकतिलतरु- तलाः परिमलमत्तमधुपवेणीवीणारणितरमणीया रमयन्ति मां मन्दी- शिरोवेष्टनं दिक्षु प्रसिद्धम्। दुगूलशब्दो दुकूलसमानार्थः। पद्धतिमार्गः। अपवर्गो मोक्षः। कृतयुगस्य रचितयुगकाष्ठस्य रथस्येत्यर्थः। यथा नेमिवशाद्रथग्रहणं तथा तद्वशात्कृताख्यस्य युगस्य। सप्तसागरराजः। क्षीरसमुद्रः। चन्द्राख्य पर्वंत इति केचित्। शशिमणिश्चन्द्रकान्तः। पितामहस्येति। तद्भूवत्या तदाश्रयणम्। सिकता विद्यन्ते यस्य स सिकतिलः। मत्तशब्देन सशब्दत्वम्, वेणीपदेन स तन्त्रीसन्निवेश- सादृश्यमाह। वेणी पंक्तिः। लिङ्ग्यतेऽनेनेति लिङ्गमाकारः। पञ्च ब्रह्माणि सद्योजातः, वामदेवः, अघोरः, तत्पुरुषः। ईशानश्चेति। मुद्राबन्धो विशिष्टकराङ्गुलिसन्निवेशः। (अर्गला) हो, सुमेरु पर्वत रूपी राजा की अंशुक नामक महीन वस्त्र की उष्णीष (पगड़ी) पर बंधी हुई लंबी पाट हो, कैलास रूपी हाथी की रेशमी पताका हो, मोक्ष का मार्ग हो, सतयुग के रथ की धुरा हो। आकाश में उतरी हुई सरस्वती ने भगवान् पितामह के अपत्य हिरण्यवाह नामक महानन्द को देखा जो वरुण देवता का जैसा हार हो, जो चन्द्र पर्वत से झरता हुआ अमृत-निर्झर के समान था, जो विन्ध्य पर्वत से बहता हुआ चन्द्रकान्त मणि के प्रवाह के सदृश था, जो दण्डकारण्य के कर्पूर वृक्ष से बहते हुए कपूरी प्रवाह के समान था। दिशाओं के लावण्यरस का वह जैसे सोता था। मानों वह आकाश-लक्ष्मी के शयन के लिए गढ़ा हुआ स्फटिक का शिलापट्ट (पाटा) हो। वह महानन्द स्वच्छ, शिशिर और सुरस (स्वादिष्ट) जल से भरा था, उसे लोग शोण भी कहते हैं। शोण को देखकर सरस्वती का हृदय उसकी रमणीयता में रम गया और उसने वहीं डेरा डाला। उसने सावित्री से कहा—'सखी, इस महानद के तटवर्ती कछार में मोर मधुर ध्वनि करते हैं। वृक्षों के नीचे फूलों की रज बालू की तरह ढेर हो जाती है। फूलों की गन्ध से मतवाले