भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 75

आप्लवनपूतपितामहपातितपितृपिण्डपाण्डुरितपाराम्, पर्यन्तसुप्त- सप्तर्षिकुशशयनसूचितसूर्यग्रहसूतकोपवासाम्, आचमनशुचिशची- पतिमुच्यमानार्चनकुसुमनिकरशबलाम्, शिवपुरपतितनिर्मात्यमन्दारदा- मकाम्, अनादरदारितमन्दरदरोदृषदम्, अनेकनाकनायकनिकाय- कामिनीकुचकलशविलुलितविग्रहाम्, ग्राहग्रावग्रामस्खलनमुखरितस्रोत- सम्, सुषुम्णास्रुतशशिसुधाशीकरस्तवकतारकिततीराम्, धिषणाग्निहोत्र- कार्यधूमधूसरितसैकताम्, सिद्धविरचितवालुकानिङ्गलङ्घनत्रासविद्रुत- विद्याधराम्, निर्मोकमुक्तिमिव गगनोरगस्य, लीलाललाटिकामिव त्रिविष्टपविटस्य, विक्रयवीथीमिव पुण्यपण्यस्य, दत्तार्गलामिव नरक-


मथनः शिवः । आलीयमानाः श्लिष्यन्तः । बालखिल्या । मुनिभेदाः । रोधस्तटम् । त्वङ्गोच्चरत । आप्लवनं स्नानम् । पितरो देवविशेषाः, आज्यपाः, सोमपाः, बर्हिषा- दयश्च । आचमनेत्यादिना । पितामहवन्न स्नानादिनिष्ठात्वमस्योच्यते । अत्र एव शची- पदेन संभोगसक्तत्वमिव पोषितम् । निकायः समूहः सुषुम्णाख्योऽमृतमयो रवि- रश्मिः । धिषणो बृहस्पतिः । सिद्धकृतत्वेन लिङ्गेषु भगवत्संनिधानमावेद्यते । निर्मोकः सर्पकञ्चुकः । विस्रंसतया शुक्लत्वेन लहरिकावलीत्वेन निर्मोकमुक्तिमिवेत्युत्प्रेक्षा । गगनमिवोरगः कृष्णतया । ललाटिका ललाटालंकारः विटो भुजङ्गः । उच्चोषं


अपने तरल तिलोदक से पुलकित कर रहे थे । स्नान से पवित्र ब्रह्माजी द्वारा पितरों के लिए लुढ़काये गये पिण्डों से उसका तट उज्ज्वल हो रहा था । पास में सोये सप्तर्षियों की कुश-शय्या से सूचित हो रहा था कि उन्होंने यहाँ सूर्यग्रहण के अशौच का उपवास किया है। आचमन से पवित्र होकर इन्द्र द्वारा भेंट किए गए पूजा के फूलों से वह विविध वर्ण वाली हो रही थी । शिवपुर से गिरी मंदरमाला को वह धारण कर रहा था । आयास के बिना ही उसने मन्दराचल की कन्दराओं के चट्टान तोड़ डाले थे । अनेक स्वर्ग नायकों की दिव्याङ्गनाओं के कुचकलशों से (आहत होकर) वह डोल रही थी । घड़ियालों और चट्टानों पर निपात होने से उसके प्रवाह मुखर हो उठते थे । सूर्य की (अमृतमय रश्मि) सुषुम्णा से निकले अमृत के फुहारे मन्दाकिनी के तीर पर तारों की तरह बिछ गए थे । बृहस्पति के यज्ञ से उत्पन्न धुआँ नदी की रेत को धुआंस कर रहा था । सिद्धों द्वारा बनाये गए बालू के शिवलिङ्ग का अकस्मात् लंघन हो जाने से उत्पन्न त्रास के कारण विद्याधर इधर-उधर भाग रहे थे । मानों वह मन्दाकिनी गगन-सर्प की उज्ज्वल लहराती हुई केंचुल हो, त्रिभुवनरूपी विट (धूर्त) की लीला-ललाटिका (ललाट का अहंकार) हो, पुण्यरूप सौदे की बाजार-गली हो, नरक के नगर-द्वार को बन्द करने वाली आगल ३ ह० च०