भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ३२ हर्षचरितम्

मानयामि मुनेर्वचनम्' इत्युक्त्वोत्थाय कृतमहीतलावतरणसंकल्पा परित्यज्य वियोगविक्लवं स्वपरिजनं ज्ञातिवर्गमविगणय्यावगणा त्रिः प्रदक्षिणीकृत्य चतुर्मुखं कथमप्यनुनयनिवर्तितानुयायिव्रतिव्राता ब्रह्मलोकतः सावित्री- द्वितीया निर्जगाम। ततः क्रमेण ध्रुवप्रवृत्तां धर्मधेनुमिवाधोधावमानधवलपयोधराम्, उद्धुरध्वनिम्, अन्धकमथनमौलिमालतीमालिकाम्, आलीयमान- बालखिल्यरुद्धरोधसम्, अरुन्धतीधौततारक्वचम् त्वङ्गतुङ्गतराङ्गतरो- त्तरलतरतारतारकाम्, तापसविकीर्णतरलतिलोदकपुलकितपुलिनाम्

लयो यस्य स ब्रह्मा, सरथ। पर्यनुयुक्ता उपपत्त्या बोधिता। अवगणा केवला सावित्रीव्यतिरेकेण नान्यपरिवारा। कथमपीति। न भृत्यादिवत्। व्रतव्रातस्त- पस्विसमूहः। तत इत्यादावीदृशं मन्दाकिनीमनुसरन्ती सरस्वती मर्त्यलोकमवतारेति संब- न्धः। ध्रुवं नित्यं वियत्। तस्मात्प्रवृत्ताम्। ध्रुवस्तारकाविशेषो ध्रुवाश्नित्यस्थानाद्वा विष्णोर्वा, ध्रुवावूरू पश्चाद्भागौ सक्थिनी ध्रुवे वा, तयोः प्रकर्षेण वृत्तां परिवर्तुलां वा अध इति पदेन धावनक्रियासहत्वाज्जलस्य ग्रहणं सूच्यते। अत एव धवलाः शुक्लाः पयोधरा मेघा यस्यास्ताम्। इतरत्राधो धावमानाः पयःपूर्णत्वाल्लम्बमानाः क्षीरस्रुतेश्च धवलाः स्तना यस्या। अधो धावमानं वेगेन प्रसरद्धवलं पयो धारयति या ताम्, अथो धावमानो धावलो यः पयोधो वत्सस्तं राति ददाति या ताम्, धवलो वृष- स्तस्मै पयो धारयति या तां वेत्यादिकाः कुव्याख्या एव। उद्धर उद्धटः। अन्धक-

, मुनि दुर्वासा के वचन मानती हूँ।' यह कह कर पृथिवी पर उतरने के लिए संकल्प करके उठी और वियोग से व्याकुल अपने परिवार को छोड़, अपने बन्धु-बांधवों को न मान, ब्रह्मा जी की तीन बार प्रदक्षिणा करके, साथ आते हुए तपस्वियों को किसी प्रकार अनुनय-विनय द्वारा लौटा कर, अकेले सावित्री को साथ ले ब्रह्मलोक से निकल पड़ी। तब क्रम से सरस्वती सात सागरों की पटरानी मंदाकिनी का अनुसरण करती हुई मर्त्यलोक में उतरीं। वह मंदाकिनी ध्रुव (नित्यस्थान, विष्णु) से निकली हुई कामधेनु के समान नीचे लटकते हुए पयोधरों (मेघों, स्तनों) को धारण कर रही थी। उसकी ध्वनि गम्भीर थी। वह अंधक के शत्रु भगवान् शंकर के मस्तक की मालती-माला थी। तटपर बालखिल्य मुनियों की भीड़-भाड़ थी। अरुन्धती वहाँ वल्कल का संमार्जन करती थी। उसकी दौड़ती हुई ऊँची लहरों पर चंचल तारे हिलोरें ले रहे थे। उसकी रेतों को तापस CC-0. Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection