भारतकोश
संग्रह पर लौटें

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ३२ हर्षचरितम्

मानयामि मुनेर्वचनम्' इत्युक्त्वोत्थाय कृतमहीतलावतरणसंकल्पा परित्यज्य वियोगविक्लवं स्वपरिजनं ज्ञातिवर्गमविगणय्यावगणा त्रिः प्रदक्षिणीकृत्य चतुर्मुखं कथमप्यनुनयनिवर्तितानुयायिव्रतिव्राता ब्रह्मलोकतः सावित्री- द्वितीया निर्जगाम। ततः क्रमेण ध्रुवप्रवृत्तां धर्मधेनुमिवाधोधावमानधवलपयोधराम्, उद्धुरध्वनिम्, अन्धकमथनमौलिमालतीमालिकाम्, आलीयमान- बालखिल्यरुद्धरोधसम्, अरुन्धतीधौततारक्वचम् त्वङ्गतुङ्गतराङ्गतरो- त्तरलतरतारतारकाम्, तापसविकीर्णतरलतिलोदकपुलकितपुलिनाम्

लयो यस्य स ब्रह्मा, सरथ। पर्यनुयुक्ता उपपत्त्या बोधिता। अवगणा केवला सावित्रीव्यतिरेकेण नान्यपरिवारा। कथमपीति। न भृत्यादिवत्। व्रतव्रातस्त- पस्विसमूहः। तत इत्यादावीदृशं मन्दाकिनीमनुसरन्ती सरस्वती मर्त्यलोकमवतारेति संब- न्धः। ध्रुवं नित्यं वियत्। तस्मात्प्रवृत्ताम्। ध्रुवस्तारकाविशेषो ध्रुवाश्नित्यस्थानाद्वा विष्णोर्वा, ध्रुवावूरू पश्चाद्भागौ सक्थिनी ध्रुवे वा, तयोः प्रकर्षेण वृत्तां परिवर्तुलां वा अध इति पदेन धावनक्रियासहत्वाज्जलस्य ग्रहणं सूच्यते। अत एव धवलाः शुक्लाः पयोधरा मेघा यस्यास्ताम्। इतरत्राधो धावमानाः पयःपूर्णत्वाल्लम्बमानाः क्षीरस्रुतेश्च धवलाः स्तना यस्या। अधो धावमानं वेगेन प्रसरद्धवलं पयो धारयति या ताम्, अथो धावमानो धावलो यः पयोधो वत्सस्तं राति ददाति या ताम्, धवलो वृष- स्तस्मै पयो धारयति या तां वेत्यादिकाः कुव्याख्या एव। उद्धर उद्धटः। अन्धक-

, मुनि दुर्वासा के वचन मानती हूँ।' यह कह कर पृथिवी पर उतरने के लिए संकल्प करके उठी और वियोग से व्याकुल अपने परिवार को छोड़, अपने बन्धु-बांधवों को न मान, ब्रह्मा जी की तीन बार प्रदक्षिणा करके, साथ आते हुए तपस्वियों को किसी प्रकार अनुनय-विनय द्वारा लौटा कर, अकेले सावित्री को साथ ले ब्रह्मलोक से निकल पड़ी। तब क्रम से सरस्वती सात सागरों की पटरानी मंदाकिनी का अनुसरण करती हुई मर्त्यलोक में उतरीं। वह मंदाकिनी ध्रुव (नित्यस्थान, विष्णु) से निकली हुई कामधेनु के समान नीचे लटकते हुए पयोधरों (मेघों, स्तनों) को धारण कर रही थी। उसकी ध्वनि गम्भीर थी। वह अंधक के शत्रु भगवान् शंकर के मस्तक की मालती-माला थी। तटपर बालखिल्य मुनियों की भीड़-भाड़ थी। अरुन्धती वहाँ वल्कल का संमार्जन करती थी। उसकी दौड़ती हुई ऊँची लहरों पर चंचल तारे हिलोरें ले रहे थे। उसकी रेतों को तापस CC-0. Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection

आप्लवनपूतपितामहपातितपितृपिण्डपाण्डुरितपाराम्, पर्यन्तसुप्त- सप्तर्षिकुशशयनसूचितसूर्यग्रहसूतकोपवासाम्, आचमनशुचिशची- पतिमुच्यमानार्चनकुसुमनिकरशबलाम्, शिवपुरपतितनिर्मात्यमन्दारदा- मकाम्, अनादरदारितमन्दरदरोदृषदम्, अनेकनाकनायकनिकाय- कामिनीकुचकलशविलुलितविग्रहाम्, ग्राहग्रावग्रामस्खलनमुखरितस्रोत- सम्, सुषुम्णास्रुतशशिसुधाशीकरस्तवकतारकिततीराम्, धिषणाग्निहोत्र- कार्यधूमधूसरितसैकताम्, सिद्धविरचितवालुकानिङ्गलङ्घनत्रासविद्रुत- विद्याधराम्, निर्मोकमुक्तिमिव गगनोरगस्य, लीलाललाटिकामिव त्रिविष्टपविटस्य, विक्रयवीथीमिव पुण्यपण्यस्य, दत्तार्गलामिव नरक-


मथनः शिवः । आलीयमानाः श्लिष्यन्तः । बालखिल्या । मुनिभेदाः । रोधस्तटम् । त्वङ्गोच्चरत । आप्लवनं स्नानम् । पितरो देवविशेषाः, आज्यपाः, सोमपाः, बर्हिषा- दयश्च । आचमनेत्यादिना । पितामहवन्न स्नानादिनिष्ठात्वमस्योच्यते । अत्र एव शची- पदेन संभोगसक्तत्वमिव पोषितम् । निकायः समूहः सुषुम्णाख्योऽमृतमयो रवि- रश्मिः । धिषणो बृहस्पतिः । सिद्धकृतत्वेन लिङ्गेषु भगवत्संनिधानमावेद्यते । निर्मोकः सर्पकञ्चुकः । विस्रंसतया शुक्लत्वेन लहरिकावलीत्वेन निर्मोकमुक्तिमिवेत्युत्प्रेक्षा । गगनमिवोरगः कृष्णतया । ललाटिका ललाटालंकारः विटो भुजङ्गः । उच्चोषं


अपने तरल तिलोदक से पुलकित कर रहे थे । स्नान से पवित्र ब्रह्माजी द्वारा पितरों के लिए लुढ़काये गये पिण्डों से उसका तट उज्ज्वल हो रहा था । पास में सोये सप्तर्षियों की कुश-शय्या से सूचित हो रहा था कि उन्होंने यहाँ सूर्यग्रहण के अशौच का उपवास किया है। आचमन से पवित्र होकर इन्द्र द्वारा भेंट किए गए पूजा के फूलों से वह विविध वर्ण वाली हो रही थी । शिवपुर से गिरी मंदरमाला को वह धारण कर रहा था । आयास के बिना ही उसने मन्दराचल की कन्दराओं के चट्टान तोड़ डाले थे । अनेक स्वर्ग नायकों की दिव्याङ्गनाओं के कुचकलशों से (आहत होकर) वह डोल रही थी । घड़ियालों और चट्टानों पर निपात होने से उसके प्रवाह मुखर हो उठते थे । सूर्य की (अमृतमय रश्मि) सुषुम्णा से निकले अमृत के फुहारे मन्दाकिनी के तीर पर तारों की तरह बिछ गए थे । बृहस्पति के यज्ञ से उत्पन्न धुआँ नदी की रेत को धुआंस कर रहा था । सिद्धों द्वारा बनाये गए बालू के शिवलिङ्ग का अकस्मात् लंघन हो जाने से उत्पन्न त्रास के कारण विद्याधर इधर-उधर भाग रहे थे । मानों वह मन्दाकिनी गगन-सर्प की उज्ज्वल लहराती हुई केंचुल हो, त्रिभुवनरूपी विट (धूर्त) की लीला-ललाटिका (ललाट का अहंकार) हो, पुण्यरूप सौदे की बाजार-गली हो, नरक के नगर-द्वार को बन्द करने वाली आगल ३ ह० च०

३४ हर्षचरितम् नगरद्वारस्य, अंशुकोष्णीषपट्टिकामिव सुमेरुनृपस्य, दुगूलकदलिका- मिव कैलासकुञ्जरस्य, पद्धतिमिवापवर्गस्य, नेमिमिव कृतयुगस्य सप्त- सागरराजमहिषीं मन्दाकिनीमनुसरन्ती मर्त्यलोकमवततार। अपश्य- च्चाम्बरतलस्थितैव हारमिव वरुणस्य, अमृतनिर्झरमिव चन्द्राचलस्य, शशिमणिनिष्यन्दमिव विन्ध्यस्य, कर्पूरद्रुमद्रवप्रवाहमिव दण्डकार- ण्यस्य, लावण्यरसप्रस्रवणमिव दिशाम्, स्फाटिकशिलापट्टशयनमि- वाम्बरश्रियः स्वच्छशिशिरसुरसवारिपूर्णं भगवतः पितामहस्यापत्यं हिरण्यवाहनामानं महानदम्, यं जनाः शोण इति कथयन्ति। दृष्ट्वा च तं रामणीकहृतदया तस्यैव तीरे वासमरचयत्। उवाच च सावित्री—'सखि, मधुरमयूरविरुतः कुसुमपांशुपटलसिकतिलतरु- तलाः परिमलमत्तमधुपवेणीवीणारणितरमणीया रमयन्ति मां मन्दी- शिरोवेष्टनं दिक्षु प्रसिद्धम्। दुगूलशब्दो दुकूलसमानार्थः। पद्धतिमार्गः। अपवर्गो मोक्षः। कृतयुगस्य रचितयुगकाष्ठस्य रथस्येत्यर्थः। यथा नेमिवशाद्रथग्रहणं तथा तद्वशात्कृताख्यस्य युगस्य। सप्तसागरराजः। क्षीरसमुद्रः। चन्द्राख्य पर्वंत इति केचित्। शशिमणिश्चन्द्रकान्तः। पितामहस्येति। तद्भूवत्या तदाश्रयणम्। सिकता विद्यन्ते यस्य स सिकतिलः। मत्तशब्देन सशब्दत्वम्, वेणीपदेन स तन्त्रीसन्निवेश- सादृश्यमाह। वेणी पंक्तिः। लिङ्ग्यतेऽनेनेति लिङ्गमाकारः। पञ्च ब्रह्माणि सद्योजातः, वामदेवः, अघोरः, तत्पुरुषः। ईशानश्चेति। मुद्राबन्धो विशिष्टकराङ्गुलिसन्निवेशः। (अर्गला) हो, सुमेरु पर्वत रूपी राजा की अंशुक नामक महीन वस्त्र की उष्णीष (पगड़ी) पर बंधी हुई लंबी पाट हो, कैलास रूपी हाथी की रेशमी पताका हो, मोक्ष का मार्ग हो, सतयुग के रथ की धुरा हो। आकाश में उतरी हुई सरस्वती ने भगवान् पितामह के अपत्य हिरण्यवाह नामक महानन्द को देखा जो वरुण देवता का जैसा हार हो, जो चन्द्र पर्वत से झरता हुआ अमृत-निर्झर के समान था, जो विन्ध्य पर्वत से बहता हुआ चन्द्रकान्त मणि के प्रवाह के सदृश था, जो दण्डकारण्य के कर्पूर वृक्ष से बहते हुए कपूरी प्रवाह के समान था। दिशाओं के लावण्यरस का वह जैसे सोता था। मानों वह आकाश-लक्ष्मी के शयन के लिए गढ़ा हुआ स्फटिक का शिलापट्ट (पाटा) हो। वह महानन्द स्वच्छ, शिशिर और सुरस (स्वादिष्ट) जल से भरा था, उसे लोग शोण भी कहते हैं। शोण को देखकर सरस्वती का हृदय उसकी रमणीयता में रम गया और उसने वहीं डेरा डाला। उसने सावित्री से कहा—'सखी, इस महानद के तटवर्ती कछार में मोर मधुर ध्वनि करते हैं। वृक्षों के नीचे फूलों की रज बालू की तरह ढेर हो जाती है। फूलों की गन्ध से मतवाले

कृतमन्दाकिनीद्युतेरस्य महानदस्योपकण्ठभूमयः । पक्षपाति च हृदय- मत्रैव स्थातुं मे' इति । अभिनन्दितवचना च तथेति तया तस्य पश्चिमे तीरे समवातरत् । एकस्मिंश्च शुचौ शिलातलसनाये तटलतामण्डपे गृहबुद्धिं बबन्ध । विश्रान्ता च नातिचिरादुत्थाय सावित्र्या सार्धमु- च्चितार्चनकुसुमा सस्नौ । पुलिनपृष्ठप्रतिष्ठितशिवलिङ्गा च भक्त्या परमया परब्रह्मपुरःसरां सम्यङ्मुद्राबन्धविहितपरिकरां ध्रुवागीतिगर्भा- मवनिपवनवनगगनदहनतपनतुहिनकिरणयजमानमयीमूर्त्तिरष्टावपि ध्या- यन्ती सुचिरमष्टपुष्पिकामदात् । अयत्नोपनतेन फलमूलेनामृतरसमप्य- तिशिशयिषमाणेन् च स्वादिम्ना शिशिरेण शोणवारिणा शरी- स्थितिमकरोत् । अतिवाहितदिवसा च तस्मिँल्लतामण्डपशिलातले कल्पितपल्लवशायना सुष्वाप । अन्येद्युरप्यनेनैव क्रमेण नक्तंदिनमत्य- वाहयत् ।

ध्रुवाख्या विशिष्टा गीतिः । वनं तोयम् । यजमान उग्रः । अष्टौ पुष्पाण्येवाष्ट- पुष्पिका । तत्र गन्धप्रधानं पार्थिवम्, अर्घस्नानादिकं रसप्रधानमाप्यम्, प्रदीपा- भरणप्रभादिरूपप्रधानं तैजसम्, अनुलेपनप्रभृति स्पर्शप्रधानं वायवीयम्, सुषिरा- तोद्यगीतादिकं शब्दप्रधानमाकाशीयम्, अनुध्यानं मानसम्, अस्ति सर्वत्रैवेश्वर इति निश्चयो बौद्धम्, अहमेवेश्वर इत्याहंकारिकम् । यद्वा, आसनवर्गप्रवृत्तिष्वष्टसु प्रत्ये- कमष्टपुष्पिका । अतिशेतुमभिमवितुमिच्छतातिशिशयिषमाणेन । स्वादिम्ना मृष्ट- त्वेन । शरीरस्थितिमिति । न त्वातृप्तिभोजनम् । अन्येद्युरन्यस्मिन्नहनि ।

भौंरे वीणा के समान गुञ्जार कर रहे हैं। इसके सामने मन्दाकिनी भी कुछ नहीं। मेरा हृदय भी इसी स्थान में रहने के पक्ष में है।' सावित्री ने 'तथा' कह कर सरस्वती की बात का समर्थन किया। तब सरस्वती उसे लेकर उस महानद के पश्चिमी तीर पर उतरी। वहीं एक पवित्र शिलातल से युक्त लतामण्डप को घर मान कर ठहर गई। कुछ देर तक विश्राम करने के बाद उठी और सावित्री के साथ पूजा के फूल चुन कर स्नान किया। तब उसने नदी के किनारे रेत में बैठ कर बालू का शिवलिंग प्रतिष्ठित किया और परब्रह्म की स्तुति के अनन्तर सम्यक् प्रकार से कई मुद्राबन्ध किए और ध्रुवागीति के साथ पृथिवी, वायु, जल, आकाश, अग्नि, सूर्य, चन्द्र और यजमानमयी शिव की आठ मूर्तियों का देर तक ध्यान करती हुई आठ फूलों को अर्पित किया। किसी यत्न के बिना ही मिले हुए अमृत-रस से भी बढ़ कर मीठे फल-फूल से और शोण के ठण्डे जल से उसने शरीर की

३६ | हर्षचरितम् एवमतिक्रामत्सु दिवसेषु गच्छति च काले याममात्रोद्गते च रवा- वुत्तरस्यां ककुभि प्रतिशब्दपूरितवनगह्वरं गम्भीरतारतरं तुरङ्गहेषित- ह्लादमशृणोत् । उपजातकुतूहला च निर्गत्य लतामण्डपादवलोकयन्ती विकचकेतकीगर्भपत्रपाण्डुरं रजःसङ्घातं नातिदवीयसि संमुखमपत- न्तमपश्यत् । क्रमेण च सामीप्योपजायमानाभिव्यक्ति तस्मिन्महति शफरोदरधूसरे रजसि पयसीव मकरचक्रं प्लवमानं पुरः प्रधावमा- नेन, प्रलम्बकुटिलकचपल्लवघटितललाटजजूटकेन, धवलदन्तपत्रिका- द्युतिहसितकपोलभित्तिना, पिनद्धकृष्णागुरुपङ्ककल्कच्छुरणकृष्ण- शबलकषायकञ्चुकेन, उत्तरीयकृतशिरोवेष्टनेन, वामप्रकोष्ठनिविष्टस्पष्ट- यामः प्रहरः । नक्तंदिवशब्देन तत्कालनिर्वर्तनीयं कर्मैव लक्ष्यते । गम्भीरश्चिर- कालस्थितः । तारतरो दूरदेशश्रूयमाणः । हेषितमश्वशब्दः । तद्रूपो ह्लादो ध्वनि- स्तम् । क्रमेणेत्यादावश्ववृन्दं संददर्शेति संबन्धः । शफरा मत्स्याः । तदुदरवत्तद्व- धूसरे । प्रलम्बेत्यादिना सज्जत्वमुक्तम् । कचाः । केशाः । सौकुमार्यात्पल्लवानीव । घटितललाटजूटता दाक्षिणात्येषु वेषः । दन्तपत्रिका कर्णामरणभेदः । पिनद्धो बद्धः । कृष्णागुरुणः पङ्को निघृष्टं कृष्णागुरुः, तस्य शुष्कस्य सतः कल्कक्षूर्णः, तच्छुरणा- त्कृष्णेन गुणेन शबलं कषायं साधिवासितं कञ्चुकं वारबाणं यस्य । उत्तरीयेत्यादिना । सन्नद्धतां वर्मादिप्रसङ्गं चाह । वामेत्यनेनाश्रमस्वभाववर्णना शृङ्गारिता चोक्ता । रक्षा मात्र के लिए अत्यल्प भोजन किया । इस प्रकार उसी लतामण्डप के शिलातल पर पत्तों की सेज बनाकर लेट गई । दूसरे दिन इसी क्रम से उसने रात-दिन गुजारे । इस तरह कई दिन बीत गए । समय बहुत चला गया । एक रोज एक पहर दिन चढ़ गया, तब सावित्री को उत्तर दिशा की ओर घोड़ों की हिनहिनाहट भरी आवाज सुन पड़ी, वह अपने शब्दों से वन की घांधियों को भर रही थी और अत्यन्त गम्भीर एवं तीखी थी। सरस्वती के मन में कुतूहल हुआ तो लतामण्डप से निकल आई और उसने सामने थोड़ी ही दूर पर खिले हुए केवड़े के पत्तेदार गर्भ के समान सफेद उड़ती हुई धूलराशि को देखा। क्रम से जब वह और भी समीप आ गई तो मछली के पेट के समान धूसर वर्ण वाले उस धूलि-पटल में एक सहस्र प्रायः युवकों को पैदल सेना के साथ घोड़े इस तरह चलते हुए दिखाई पड़े मानों जल में झुण्ड के झुण्ड मगर तैर रहे हों । (पैदल सेना के दो हजार जवान) आगे की ओर दौड़ते आ रहे थे । उनके सिर पर लम्बे और घुँघराले बालों का बंधा हुआ जूड़ा था । उनके कपोलों पर हाथीदांत के बने पत्ते हँसी की चमक उत्पन्न कर रहे थे । वे काले अगुरु की बुँदकियों के छींटे वाले लाल रंग के कंचुक कसे हुए थे ।

प्रथम उच्छ्वासः ३७ हाटककटकेन, द्विगुणपट्टपट्टिकागाढग्रन्थिग्रथितासिधेनुना, अनवरत- व्यायामकृतकर्कशशरीरे, वातहरिणयूथेनेव मुहुर्मुहुः खमुड्डोयमानेन, लङ्घितसमविषमावटविटपेन, कोणधारिणा, कृपाणपाणिना, सेवा- गृहीतविविधवनकुसुमफलमूलपर्णेन, 'चल चल, याहि याहि, अप- सर्पापसर्प, पुरः प्रयच्छ पन्थानम्' इत्यनवरतकृतकलकलेन युवप्रायेण, सहस्रमात्रेण पदातिजनेन सनाथमश्ववृन्दं सददर्श । मध्ये च तस्य सार्धचन्द्रेण मुक्ताफलजालमालिना विविधरत्न- खण्डखचितेन शङ्खक्षीरफेनपाण्डुरेण क्षीरोदेनेव स्वयं लक्ष्मीं दातु- मागतेन गगनगतेनातपत्रेण कृतच्छायम्, अच्छाच्छेनाभरणद्युतीनां निवहेन दिशामिव दर्शनानुरागलग्नेन चक्रवालेनानुगम्यमानम्, आनि- 'प्रकोष्ठमन्तरं विद्यादरत्निमणिबन्धयोः' । हाटकं स्वर्णम् । यदेव द्विगुणाऽत एव गाढग्रन्थिसहत्वन् । ग्रथिताविस्रंसिनी । असिधेनुश्छुरिकः । वातहरिणो यो वाता- भिमुखं धावति । अवट उन्मार्गः । कोणो लगुडः । मध्य इत्यादि । तस्य च मध्येऽष्टादशवर्षदेशीयं युवानमद्राक्षीदिति सम्बन्धः । क्षीरोदस्याप्यर्थंचन्द्रादि सर्वं योज्यम् । छाया कान्तिरिप । चक्रवालेन समूहेन । उन्होंने अपने सिर पर चादर की पगड़ी बाँध ली थी । उनके बायें हाथ की कलाइयों में सोने के कड़े थे । उनकी कमर में कपड़े की दोहरी पेटी की मजबूत गाँठ थी और उसमें छुरी खोंसी हुई थी । निरन्तर व्यायाम करने से उनका बदन कड़ा था । हवा से बात करने वाले हिरनों की तरह वे मानों आकाश में उड़ते-चल रहे थे । वे ऊबड़-खाबड़ जमीन, खाइयों और झाड़ियों को डाँकते जाते थे । कुछ सैनिक मुँगरी या डंडे लिये थे और कुछ के हाथ में तलवारें थीं । सहायता के लिए उन्होंने बनैले फूल, फल, मूल और पत्ते ले लिये थे । 'चलो-चलो', 'जाओ जाओ', 'आगे रास्ता दो' इस तरह हमेशा शोर-गुल मचा रहे थे । सरस्वती ने घोड़ों की उस टुकड़ी के बीच में अट्ठारह वर्ष के एक अश्वारोही युवक को देखा । अर्धचन्द्र से युक्त, मोतियों की मालाओं वाला, अनेक प्रकार के रत्नों से खचित, शंख और दूध के फेन की तरह उजला छत्र उस पर छाया कर रहा था, मानों लक्ष्मी को उसे स्वयं अर्पित करने के लिए क्षीरसमुद्र ही आकाश में लहरा रहा हो । आभूषणों की निर्मल किरणें इस तरह उसका पीछा कर रही थी मानों उसके दर्शन के अनुराग से सारी

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ३८ हर्षचरितम् तम्बविलम्बिन्या मालतीशेखरस्रजा सकलभुवनविजयार्जितया रूपपता- कयेव विराजमानम्, उत्सर्पिभिः शिखण्डखण्डिकापद्मरागमणेररुणे- रंशुजालैरदृश्यमानवनदेवताविधूतैर्बालपल्लवैरिव प्रमृज्यमानमार्गरणु- परुषवपुषम्, बकुलकुड्मलमण्डलीमुण्डमालामण्डनमनोहरेण कुटिल- कुन्तलस्तबकमालिना मौलिना मीलितातपं पिबन्तमिव दिवसम्, पशुपतिजटामुकुटमृगाङ्कद्वितीयशकलघटितस्येव सहजलक्ष्मीसमा- लिङ्गितस्य ललाटपट्टस्य मनःशिलापङ्कपिज्जलेन लावण्येन लिम्पन्त- मिवान्तरिक्षम्, अभिनवयौवनारम्भावष्टम्भप्रगल्भदृष्टिपाततृणीकृत- त्रिभुवनस्य चक्षुषः प्रथिम्ना विकचकुमुदकुवलयकमलसरःसहस्र- सच्छादितदशदिशं शरदभिव प्रवर्तयन्तम्, आयतनयननदीसीमन्त- सेतुबन्धेन ललाटतटशशिमणिशिलातलगलितेन कान्तिसलिलस्रोत- नितम्बशब्दो मुख्यार्थः । 'पश्चान्नितम्बः स्त्रीकट्याः' इत्यमरः । शिखण्डखण्डिका चूडाभरणम् । प्रमृज्यमानेति । वर्तमानकालोऽत्र विवक्षितः । बकुलेत्यादिना निपीय- मानातातपपुल्यवस्तुनिदर्शः । कुन्तलः केशहस्तः, स एव स्तबकः । पुष्पस्तबकः पुष्पसंघात सहजाऽकृत्रिमा, सहोत्पन्ना च । लक्ष्मीः शोभना, श्रीश्च । लावण्यमत्र कान्तिः । अवष्टम्भो गर्वः । द्राघीयसा दीर्घतरेण । सहकारः सुगन्धद्रव्यभेदः सह- दिशाएं एकत्र होकर अनुसरण कर रही हों। मालती की शेखरस्रज उससे नितम्ब तक लटक रही थी, मानों वह समस्त भुवनों की विजय करने से प्राप्त रूप की पताका से विराज- मान हों । शिखण्ड-खण्डिका नामक उसके शिरोभूषण में जड़ी हुई पद्मराग मणि की लाल किरणें फैल रही थीं, मानों दृष्टिपथ में न आने वाली वनदेवता बालपल्लवों द्वारा मार्ग की धूल से उसकी रूखर देह को झाड़ती हो । मौलसिरी के कुड्मलों से बनी हुई मुण्डमाला से मनोहर एवं घुँघराले बालों के गुच्छों से भरे हुए अपने शिर से दिन के आतप को मन्द करता हुआ वह मानों दिन को पी रहा था। उसका ललाट शिव के ललाट के मुकुटचन्द्र के दूसरे खण्ड से मानों बना हुआ था और उसमें स्वाभाविक शोभा थी, मानों वह मनःशिला के पंकसदृश लाल-पीले अपने ललाट के लावण्य से सारे अन्तरिक्ष को लीप रहा था। वह नई जवानी के आरम्भ में गर्वीले और उद्धत दृष्टिपात करने वाली अपनी आँखों से सारे संसार को तृण के बराबर समझ रहा था, ऐसी आँखों की दीर्घता से मानों वह कुमुद, कुवलय और कमल से भरे हुए हजारों सरोवरों से समस्त दिशाओं को ढकने वाली शरत् को प्रवर्तित कर रहा था। उसका नासावंश मानों दीर्घ नयनों की नदी के सीमान्त में बनाया गया पुल का बाँध हो, या उसके ललाटरूपी चन्द्रकान्तमणि के

प्रथम उच्छ्वासः ३९ सेव द्राघीयसा नासावंशेन शोभमानम्, अतिसुरभिसहकारकर्पूर- कक्कोललवङ्गपारिजातकपरिमलपुचा मत्तमधुकरकुलकोलाहलमुखरेण मुखेन सनन्दनवनं वसन्तमिव अवतारयन्तम्, आसन्नसुहृत्परिहास- भावनोत्तानितमुखमुग्धहसितेर्दशनज्योत्स्नास्नपितदिङ्मुखैः पुनः- पुनर्नभसि संचारिणं चन्द्रालोकमिव कल्पयन्तम्, कदम्बमुकुलस्थूल- मुक्ताफलयुगलमध्याध्यासितमरकतस्य त्रिकण्टककर्णाभरणस्य प्रेङ्खतः प्रभया समुत्सर्पन्त्या कृतसकुसुमहिरत्कुन्दपल्लवकर्णावतंस- मिवोपलक्ष्यमाणम्, आमोदितमृगमदपङ्कलिखितपत्रभङ्गभास्वरम्, भुजयुगलमुद्दाममकराक्रान्तशिखरमिव मकरकेतुकेतोः दण्डद्वयं दधानम्, धवलब्रह्मसूत्रसीमन्तितं सागरमथनसामर्षगङ्गास्रोतस्संदानित- मिव मन्दरं देहमुद्वहन्तम्, कर्पूरक्षोदमुष्टिच्छुरणपांशुलेनेव कारफलेनैव क्रियते । पारिजातकोऽनेकद्रव्यसंस्कृतो मुखवासविशेषः, देववृक्षश्च । वसन्तश्चैवंविधेनैव मुखेन प्रारम्भेणोपलक्षितो भवति । रत्नत्रितयेन कृतं त्रिकोण- कण्टकाख्यं कर्णाभरणम् । मृगमदः कस्तूरिका । संदानितं बद्धम् । वेष्टितमित्यर्थः । कुचावत्र कान्तासंबन्धिनादेय चक्रवाकयुगलं तस्य कृते पुलिनसदृशम् । कोणः पल्लवः । पृष्ठतः पश्चाद्भागे कक्ष्यायाः परिवलनाधिकसूत्रितिरित्युक्तः । क्षिप्तो लम्ब- शिलातल से चू कर बहता हुआ कान्ति का प्रवाह हो, ऐसे वह अपने नासावंश से सुशो- भित था। सहकार, कर्पूर, कक्कोल, लवङ्ग ओर पारिजातक इन पाँच सुगन्धित पदार्थों की गन्ध उसके मुख से निकल रही थी, उस पर मतवाले भौंरे गुञ्जार रहे थे, मानों वह चन्दन वन के सहित वहाँ वसन्त को उतार रहा था। वह जब कभी अपने पास के मित्रों के साथ परिहास की भावना से मुँह ऊँचा करके हँसता था तो समस्त दिशाएँ उसके दातों की चाँदनी में धुल जाती थी और मानों वह आकाश में बार-बार संचरण करने वाले चन्द्रा- लोक का निर्माण कर रहा था। उसके कान में त्रिकंटक नाम का गहना था, जो कदम्ब के कुडमल के समान दो स्थूल मोतियों के बीच में पन्ने का जड़ाव करके बनाया गया था, ऐसे त्रिकंटक की प्रभा फैल रही थी, मानों उस युवक ने फूल के सहित कुन्द के हरे पल्लवों को कर्णावतंस बना लिया हो। सुगन्धित कस्तूरी के पंक की बनी हुई पत्ररेखाओं से उसके दोनों हाथ चमक रहे थे, मानों कामदेव की पताका के बड़े-बड़े मकरों से आक्रान्त शिखर वाले दो डंडे हों। मानों समुद्रमंथन से क्रुद्ध गंगा की धाराओं से जकड़े हुए मन्दराचल के समान श्वेत यज्ञोपवीत से वेष्टित शरीर को वह धारण कर रहा था।

४० हर्षचरितम् कान्तोच्चकुचचक्रवाकयुगलविपुलपुलिनेनोरःस्थलेन स्थूलभुजायाम- पुञ्जितम्, पुरो विस्तारयन्तमिव दिक्‍चक्रम्, पुरस्तादीषदधोनाभि- निहितककोणकमनीयेन पृष्ठतः कक्ष्याधिकक्षिप्तपल्लवेनोभयतःसंवलन- प्रकटितोरुत्रिभागेन हारीतहरिता निबिडनिपीडितेनाधरवाससा विभज्यमानतनुतरमध्यभागम्, अनवरतश्रमोपचितमांसकठिनविकट- मकरमुखसंलग्नजानुभ्यामतिविशालवक्षःस्थलोपलवेदिकोत्तम्भनशिलास्त- म्भाभ्यां चारुचन्दनस्थासकस्थूलतरकान्तिभ्यामूरुदण्डाभ्यामुप- हसन्तमिवैरावतकरायामम्, १अतिभरितोरुभारवहनखेदेनेव तनु- तरजङ्घाकाण्डम्, कल्पपादपपल्लवद्वयस्येव पाटलस्योभयपार्श्ववि- मानः पल्लवो यस्य तत् । संवलनं संकोचनम् । हारीतः पक्षिभेदः । हरिता नीलेन । मकरमुखं जानुनोरुपरिभागः । उत्तम्भनं धारणम् । स्थासकश्चन्द्रकः । आयामो दैर्ध्यम् । न केवलमायामं शुक्‍लत्वमप्युपहसन्तम् । धर्मयोरेकनिर्देशोऽन्यसंवित्साह- चर्यात । 'अतिभरितोरुभारवहनेन' इति पाठः । ऊरु एव भारः । प्रशस्ता जङ्घा कपूर के चूर्ण की मूठों से धूसरित उसकी छाती कान्ता के ऊँचे स्तन रूपी चक्रवाक युगल के लिए चौड़ी रेतीली जमीन थी, ऐसी छाती से वह मानों अपनी स्थूल भुजाओं के आयात में पुंजीभूत दिशाओं को फैला रहा था। हारीत पक्षी के समान नील वर्ण का कस कर बँधा हुआ अधोवस्त्र उसकी पतली कमर को विभाजित कर रहा था, सामने की ओर नाभि से कुछ नीचे उसका एक कोना बहुत अच्छा लग रहा था, उस अधोवस्त्र का कच्छ भाग पीछे की ओर पल्ला खोंसने के बाद भी कुछ ऊपर निकला रहता था। दोनों ओर शरीर के मोड़ने से दाहिनी जांघ का कुछ भाग दिखाई दे जाता था। वह अपने ऊरुदण्डों से ऐरावत की सूँड का मानों उपहास कर रहा था, दोनों जांघों का मांस हमेशा व्यायाम करते रहने से बढ़ गया था, वे ऐसी लगती थीं मानों कठिन और विकट मगर के मुख में फँस गई हों, वे चौड़ी छाती के चबूतरे को धारण करने के लिए शिलास्तम्भ थीं। चन्दन के सुंदर थप्पे से उसकी जाँघों में कान्ति और भी निखर उठी थी। हद से ज्यादा उभरी हुई जाँघों के भार-वहन करने से खिन्न होकर मानों उसकी टांगें पतली हो रही थीं। कल्पवृक्ष के दो पल्लवों के समान ललछूहू रंग के दोनों ओर लटकते हुए पैरों के नखों की किरणें डोलती हुई मानों घोड़ों का चामरमाला नामक अलंकार बना रही थीं। १. अतिभरितोरुभागभर ।

लम्बिनः पादद्वयस्य दोलायमानैर्नखमयूखैरश्वमण्डनचामरमालामिव रचयन्तम्, अभिमुखमुच्चैरुद्ध्वद्भिरतिचिरमुपरिविश्राम्यद्भिरिव वलितविकटं पतद्भिः खुरैः खण्डितभुवि प्रतिक्षणदशनविमुक्तखण- खणायितखरखलीने दीर्घघ्राणलीनलालिके ललाटलुलितचारुचामीकर- चक्रमे शिञ्जानशातकौम्भायानशोभिनि मनोरंहसि गोलाङ्गूलकपोलकाल- कायलोम्नि नीलसिन्धुवारवर्णे वाजिनि महति समारूढम्, उभयतः पर्याणपट्टश्लिष्टहस्ताभ्यामासन्नपरिचारकाभ्यां दोधूयमानधवलचामरिका- युगलम्, अग्रतः पठतो वन्दिनः सुभाषितमुत्कण्टकितकपोलफलकेन लग्नकर्णोत्पलकेसरपक्ष्मशकलेनेव मुखशशिना भावयन्तम्, अनङ्ग- युगावतारमिव दर्शयन्तम्, चन्द्रमयीमिव सृष्टिमुत्पादयन्तम्, विलास-

जङ्घाकाण्डम्। कल्पपादपसम्बन्धितया न केवलं लोहित्यं सौकुमार्यञ्चोच्यते। याव- त्सकलसंपत्फलप्रदत्वादिकप्रकर्षान्तरम् । अतिचिरमित्यादिनानाकुलत्वमुच्यते। यदु- क्तम्—'आवृत्ताः कुञ्चिताः स्थूलदलपाल्यग्रसंस्थिताः । विवर्ज्याश्चाकुलपदन्यासेन गम- नेन च ॥' इति विकटं चित्रम् । खुरैरिति । तद्व्यापारवैचित्र्याद्बहुत्वमग्रिमयोरेव । एवंविधसंनिवेशसंभवात् । खलीनं कविका । लालिका कविकाशेखरम् । आयानं हयमण्डनमाला । गोलाङ्गुलः कृष्णमुखो वानरः । नीलेत्यादौ कुमुदकुन्दमृणालगौर इत्यादिवन्न पौनरुक्त्यम् । महतोति । उक्तं च—'सर्वलक्षणहीनोऽपि महाकायः प्रशस्यते' इति । आसन्नेत्यनेन विश्वसनीयत्वमुक्तम् । अनङ्गयुगेति । अनङ्गजन्मना यदुपलक्षितं युगं कालविशेषस्तस्य नूतनमदसाहश्यात् । यद्वा—अनङ्गयोयुगं तद-

मन के समान वेग वालं, लंगूर के मुँह की तरह काले रोंगटे वाले सिन्धुवार जैसे नीले, तगड़े घोड़े पर वह सवार था। वह घोड़ा अपने खुरों से जो सामने देर तक उठे रह जाते और विकट रूप में टेढ़े होकर गिरते, जमीन को छोड़ रहा था । वह काँटेदार लगाम को प्रतिक्षण अपने दाँतों से छोड़ता तो खड़-खड़ आवाज होती । घोड़े की नाक पर सामने की ओर लगाम का कमानीदार हिस्सा और माथे पर सोने का पदक झूल रहा था । आवाज करती हुई सुवर्ण की आयान नामक माला से वह घोड़ा सुशोभित हो रहा था । अपने अश्व के पलान का एक हाथ से सहारा लेकर उसके दोनों ओर दो आसन्न परिचारक चँवर झल रहे थे । आगे आगे जो बन्दीजन सुभाषित पाठ कर रहा था उसे सुन कर उसके मुख- चन्द्र के दोनों कपोलभाग रोमाञ्चित हो रहे थे मानों उसके कर्णोत्पल का पराग झर गया

४२ हर्षचरितम् प्रायमिव जीवलोकं जनयन्तम्, अनुरागमयमिव सर्गान्तरमारभ- यन्तम्, शृङ्गारमयमिव दिवसमापादयन्तम्, रागराज्यमिव प्रवर्त- यन्तम्, आकर्षणाञ्जनमिव चक्षुषोः, वशीकरणमन्त्रमिव मनसः, स्वस्थावेशचूर्णमिवेन्द्रियाणाम्, असंतोषमिव कौतुकस्य, सिद्धयोग- मिव सौभाग्यस्य, पुनर्जन्मदिवसमिव मन्मथस्य, रसायनमिव यौव- 'नस्य, एकाराज्यमिव रामणीयकस्य, कीर्तिस्तम्भमिव रूपस्य, मूल- कोशमिव लावण्यस्य, पुण्यकर्मपरिणाममिव संसारस्य, प्रथमांकुर- मिव कान्तिलतायाः, सर्गाभ्यासफलमिव प्रजापतेः, प्रतापमिव विभ्रमस्य, यशःप्रवाहमिव वैदग्ध्यस्य, अष्टादशवर्षदेशीयं युवानम- द्राक्षीत् । वतारमिव । द्वित्वासंख्यापूर्वकत्वात् । चन्द्रमयीमिवेति कान्तिमयतवेन । आकर्ष- र्षणाञ्जनं वशीकरणार्थं कज्जलम् । असंतोषमिवेत्ति । यस्यैनं प्राप्य कौतुकं न निवर्तते, तस्य संतोष एव नास्ति । केषांचिदेव द्रव्याणां संबन्धो यो न कदा- चित्कार्ये व्यभिचरति स सिद्धयोगः । सौभाग्यं तावत्सर्वं किंचन वशीकुरुते, ए- चास्य तदेव सिद्धयोग इव तदाश्रयणेन निःशेषलोकवशीकरणक्षमत्वम् जन्मदिवस- मिति । तद्गोचरपतितानां कामोत्पत्तेः । रसायनमिवेति । यथा रसायनवशात्कवि- त्परिपूणंथ स्थिरश्च भवति, तद्वदेतदाश्रयेण यौवनम् । ईषदसमाप्तोऽष्टादशवर्षोऽष्टा- दशवर्षदेशीयस्तम् । न परेण संश्लिष्टस्तुरङ्गो यस्य तम् । तधीचस्य तु पर्याप्ति- श्लिष्टाद्युक्तम् । परिणतवयस्त्वेन सत्यवादिना सावित्रीसरस्वत्यो प्रति च विभ्रम- कारित्वमुच्यते । अन्यथोपक्रम एव संभाषणमात्रं न प्रवर्तते । हो। मानों वह अनङ्ग युग का अवतार दिखला रहा था, सारी सृष्टि को चन्द्रमय बना रहा था, सारे प्राणिलोक को विलासमय कर रहा था, राग के राज्य का प्रवर्त्तन कर रहा था, मानों वह नेत्र रूप आकर्षणाञ्जन, मन का वशीकरणमंत्र, इन्द्रियों को विवश करने वाला चूर्ण, कुतूहल का असन्तोष, सौभाग्य का सिद्धियोग, कामदेव का पुनर्जन्मदिन, यौवन का रसायन, सौन्दर्य का एकच्छत्र राज्य, रूप का कीर्तिस्तम्भ, लावण्य का मूल कोश, संसार के सारे पुण्यकर्मों का परिणाम, कान्ति रूपी लता का पहला अंकुर, ब्रह्मा के सृष्टिनिर्माण के अभ्यास का फल-स्वरूप, विभ्रम का प्रताप और वैदग्ध्य का यश- प्रवाह था ।

[Header] प्रथम उच्छ्वासः । ४३

पार्श्वे च तस्य द्वितीयमपरसंश्लिष्टतुरङ्गम्, प्रांशुमुत्तप्ततपनीयस्तम्भा- कारम्, परिणतवयसमपि व्यायामकठिनकायम्, नीचनखश्मश्रुकेशम्, शुक्तिखलतिम्, ईषत्तुन्दिलम्, रोमशोरःस्थलम्, अनुल्बणोदारवेषतया जरामपि विनयमिव शिक्षयन्तम्, गुणानपि गरिमाणमिवानयन्तम्, महानुभावतामपि शिष्यतामिवानयन्तम्, आचारस्याप्याचार्यमिव कुर्वाणम्, वलक्षवारबाणधारिणम्, धौतदुकूलपट्टिकापरिवेष्टित- मौलिं पुरुषम् । अथ स युवा पुरोयायिनां यथादर्शनं प्रतिनिवृत्यातिविस्मितमनसां कथयतां पदातीनां सकाशादुपलभ्य दिव्याकृति तत्कन्यायुगलमुपजात- कुतूहलः प्रतूर्णतुरगो दिदृक्षुस्तं लतामण्डपोद्देशमाजगाम । दूरादेव

शुक्तिखलतिं शुक्लाकारखल्वाटम् । तुन्दिलं लम्बोदरम् । अत एवास्य विकु- क्षिरिति नाम । अनुल्बणोऽनुद्धतः । उदारः श्रेष्ठः । जरामिति । जरा किल सर्वं- विनयं शिक्षयति । महानुभावता महाशयता । अनुभावयति कार्यमकार्यं वा बोध- यतीत्यनुभावः । शिष्यतामिति । परशासनदक्षकर्मं महानुभावतया तत एवावसो- यत इत्युक्तं भवति । आचारः शास्त्रकारप्रदर्शिता विशिष्टा नीतिः । स च सर्वस्मि- न्नाचार्यकमवलम्बते । संस्कारातिशयमापादयतीत्यर्थः । वलक्षः शुक्लः । वारबाणः कञ्चुकः । मौलयः केशाः । अथेति । नतु गतागतिकतया सर्वचेतनामभिप्रायेण सौन्दर्यमेतयोरभिव्यज्यते । प्रतिनिवृत्य न पुनः प्रसङ्गत उपेत्य । कन्याकत्वादेतन्नानुचितम् । प्रतूर्णी वेगगामी ।

उस नवयुवक के बगल में एक दूसरे पुरुष को देखा । वह भी दूसरे घोड़े पर सवार था । उसका कद लम्बा था । उसकी आकृति तपे हुए सोने के खम्भे के समान था । अवस्था अधेड़ होने पर भी उसका शरीर व्यायाम से गँठा हुआ था । उसके दाढ़ी, मूँछ और नाखून साफ-सुथरे कटे हुए थे । बाल झड़ जाने से बिलकुल सितुहे-जैसा लगता था । उसकी तोंद निकल आई थी । छाती में बाल जम गए थे, वेष सौम्य और श्रेष्ठ था, मानो वह अपनी वृद्धावस्था को भी विनय की सीख दे रहा था, गुणों में भी गौरव भर रहा था, महानुभावता को भी शिष्य बना रहा था, आचारों का भी आचार्य हो रहा था । वह उज्ज्वल कंचुक पहने हुए और सिर में धुली हुई दुकूलपट्टिका बाँधे हुए था । वह युवक देखकर लौटे हुए अग्रगामी पैदल सैनिकों से दिव्य आकृति वाली दो कन्याओं के विषय में सुनते ही कुतूहल से भर कर देखने के लिए उत्सुक हो घोड़े को तेज कर

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ४४ हर्षचरितम्

च तुरगादवततार। निवारितपरिजनश्च तेन द्वितीयेन साधुना सह चरणाभ्यामेव सविनयमुपससर्प । कृतोपसंग्रहणौ तौ सावित्री समं सरस्वत्या किसलयासनदानादिना सकुसुमफलार्घ्यावसानेन वनवासोचितेनातिथ्येन यथाक्रममुपजग्राह । आसीनयाश्च तयोरासीन नातिचिरमिव स्थित्वा तं द्वितीयं प्रवयसमुद्दिश्यावादीत्—'आर्य, सहजलज्जाधनस्य प्रमदाजनस्य प्रथमाभिभाषणमशालीनता, विशेषतो वनमृगीमुग्धस्य कुलकुमारीजनस्य । केवलमियमलोकनकृतार्थेषु चक्षुषे स्पृहयन्ती प्रेरयत्युदन्तश्रवणकुतूहलिनी श्रोत्रवृत्तिः । प्रथम- दर्शने चोपायनमिवोपनयति सज्जनः प्रणयम् । अप्रगल्भमपि जनं प्रभवता प्रश्रयेणार्पितं मनो मध्विव वाचालयति । अयत्नेनैवातिनम्रे साधौ धनुषीव गुणः परां कोटिमारोपयति विस्रम्भः । जनयन्ति च विस्मयमतिधीरधियामप्यदृष्टपूर्वा दृश्यमाना जगति स्रष्टुः सृष्टयति-

साधुना विनीतेन । 'उपसंग्रहणं धीराः कथयन्त्यभिवादनम् ।' आतिथ्यमेवोप- जग्राहापूजयत् । 'प्रवयाः स्यात्परिणतः' अशालीनता धृष्टता । वनशब्देन मृगी- सामान्येऽपि जनसंपर्काद्विभावमाह । उपायनं ढौकनिका । उपनयति ढौकयति । प्रगल्भमित्यादि । मनःकर्तृ अप्रगल्भमपि जनं वाचालयति । कीदृशम् ? प्रभवता स्वामिना प्रश्रयेण प्रत्यर्पितं दत्तमैवंविधमस्मदीयं युष्मासु मन इति बहिः प्रकाशितं यच्च परतश्च केनापि प्रभावशीलेन ढौकितं मध्वप्रगल्भमपि जनं कुलयोषितप्रायं

उस लतामण्डप के समीप पहुँच गया । कुछ ही दूर पर घोड़े से उतर गया । अपने और साथियों को उसने रोक दिया और उस सज्जन पार्श्वचर को साथ लेकर पैदल ही विनीत भाव से आया । सरस्वती के साथ सावित्री ने उन दोनों का अभिवादन किया और वन- वास के योग्य फूल एवं अर्घ्य आदि से उनका क्रम से आतिथ्य-सत्कार किया । दोनों पूर्ण रूप से स्थिर हुए तो वह स्वयं बैठी और कुछ ही देर ठहर कर उस दूसरे वृद्ध सज्जन से बोली—'आर्य, सहजलज्जाशील नारियों का पहले पहल बोल बैठना बड़ी धृष्टता है, विशेष कर तो उनका जो वन्य मृगी की भाँति मुग्ध कुलकुमारियाँ हैं । आँखें तो देखकर कृतार्थ हो गईं, पर केवल कर्णेन्द्रिय की वृत्ति वृत्तान्त सुनने के लिए कुतूहल से प्रेरित कर रही है । प्रथम दर्शन में ही सज्जन व्यक्ति उपहार के रूप में प्रणय को समर्पित करता है । प्रभावशाली विनय से अर्पित किया हुआ मन मध के समान अधृष्ट जन को भी वाचाल बना देता है । अत्यन्त नम्र स्वभाव वाले सज्जन में बिना यत्न के ही विश्वास CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ४५ प्रथम उच्छ्वासः शयाः । यतस्त्रिभुवनाभिभावि रूपमिदमस्य महानुभावस्य । सौजन्य- परतन्त्रा चेयं देवानांप्रियस्यातिभद्रता कारयति कथां न तु युवति- जनसहोत्था तरलता । वत्कथयागमनेनापुण्यभाक्कतम्रो विजृम्भित- विरहव्यथः शून्यतां नीतो देशः ? क्व वा गन्तव्यम् ? को वायमपहृतहर- हुंकाराहंकारोऽपर इवानन्यजो युवा ? किंनाम्नो वा समृद्धतपसः पितुर- यममृतवर्षी कौस्तुभमणिरिव हतेर्हृदयमाह्लादयति ? का चास्य त्रिभु- वननमस्या विभातसंध्येव महतस्तेजसो जननी ? कानि वास्य पुण्य भाञ्जि भजन्त्यभिख्यामक्षराणि ? आर्यपरिज्ञानेऽप्ययमेव क्रमः कौतुकानुरोधिनो हृदयस्य' इत्युक्तवत्यां तस्यां प्रकटितप्रश्रयोऽसौ वाचालयति किंचन जल्पयति । अत्रापि प्रश्रयेणेति साभिप्रायम् । तथा च—'अन्यं- यान्यवनितागतचित्तं चित्तनाथमभिशङ्कितवत्या । पीतभूरिसुरयापि न मोदे निर्वृ- तिर्हि मनसो मदहेतोः ॥' इत्युक्तम् । नम्रे प्रह्वे, कुब्जे च । गुणो विनयादिः, ज्या च । कोटिः प्रकर्षः, धनुःशिखा च । देवानांप्रियस्येति पूजावचनम् । षष्ठ्या अलुक् । अत्रागमनेत्यादिना ब्रह्मोक्तशापबुद्ध्या दधीचस्य तद्धर्तुंयोग्यतया कतम इति देशोत्कर्षकुलादिकं पृच्छति । कस्येति । देवस्य । सिद्धा देवाः । अनन्यजः कामः । महतस्तेजस इति । महच्च तेजः सूर्याख्यम् । अभिख्या नाम । अयमेव क्रम इति । यथास्योत्पत्त्यादिकं तद्वद्भवतोऽपीत्यर्थः । कला उपायः । भूरिति रेफान्तो भूवाची । अधिक हो जाता है, जैसे धनुष के अग्रभाग तक उसका गुण बढ़ जाता है। पहले कभी नहीं देखे गए फिर देखे जाने वाले विधाता के उत्कृष्ट निर्माण और लोगों में अत्यन्त आश्चर्य को उत्पन्न कर देते हैं। बात यह है कि इन महानुभावों का रूप त्रिभुवन को अभिभूत कर देने वाला है। देवानांप्रिय की सौजन्य से भरी यह अतिभद्रता ही मुझे बोलने के लिए तत्पर कर रही है, युवतियों में स्वभावतः होने वाली चंचलता नहीं। तो कहिए इन्होंने किस पुण्यहीन देश को अपनी विरह-व्यथा के द्वारा सूना कर दिया है। ये कहाँ जायँगे ? ये मानों दूसरे कामदेव हैं जो शिव के हुँकारजनित अहंकार को न मानकर उत्पन्न हो गया है। कौन हैं ये ? बढ़ी हुई तपस्या वाले किस पिता के अमृतवर्षी-स्वभाव से ये हृदय को आह्लादित करते हैं जैसे कौस्तुभमणि विष्णु के हृदय को ? त्रिभुवन द्वारा नमन करने योग्य और महान् तेजस्वी को उत्पन्न करने वाली प्रभात की सन्ध्या कौन इनकी जननी है ? कौन से पुण्यवान् अक्षर इनके नाम में जुड़ते हैं ! आर्य के सम्बन्ध में जानने के लिए इस कुतूहल भरे हृदय के प्रश्न क्रमशः ये ही हैं।' सावित्री के इतना पूछने पर विनय

४६ ॥हर्षचरितम्॥ प्रतिव्याजहार—'आयुष्मति, सतां हि प्रियंवदता कुलविद्या । न केवल- माननं हृदयमपि च ते चन्द्रमयमिव सुधाशीकरशीतलैराह्लादयति वचोभिः । सौजन्यजन्मभूमयो भूयसा शुभेन सज्जननिर्माणशिल्पकला इव भावदृशो दृश्यन्ते । दूरे तावदन्योन्यस्याभिलपनमभिजातः सह दृशोऽपि मिश्रीभूता महतीं भूमिमारोपयन्ति । श्रूयताम्—अयं खलु भूषणं भार्गववंशस्य भगवतो भूर्भुवःस्वस्त्रितयतिलकस्य, अदभ्रप्रभाव- स्तम्भितजम्भारिभुजस्तम्भस्य, सुरासुरमुकुटमणिशिलाशयनदुर्ल- लितपादपङ्केरुहस्य, निजतेजःप्रसरप्लुष्टपुलोम्नश्च्यवनस्य बहिर्वृत्तिः जीवितं दधीचो नाम तनयः । जन्यन्यस्य जितजगतोऽनेकपार्थिव- सहस्रानुयातस्य शर्यातस्य सुता राजपुत्री त्रिभुवनकन्यारत्नं सुकन्या नाम । तां खलु देवीमन्तर्वत्नीं विदित्वा वैजनने मासि प्रसवाय पिता भुव इति रेफान्तः पातालवाची । भूश्च भुवश्च स्वश्च भूर्भुवःस्वः, एषां त्रयमिति समासः । अदभ्रोऽनल्पः । जम्भारिरिन्द्रः । स ह्यश्विभ्यां यज्ञभागभुजौ कुर्वावामिति चिरं प्रार्थितः । तथेति प्रतिपद्य ताभ्यां भागं दददिन्द्रेणोद्यतवज्रेण रोषितः । तत- स्तेनास्य सवज्रः स्तम्भितो भुज इति । दुर्ललितोऽलभ्यविषयः । प्लुष्टपुलोम्न इति अनवरतं रुदत्यां दुहितरि कोपान्मात्रा गुहाणेमामित पुलोम्नो राक्षसस्योक्तम् तत्तस्तां प्रतिगृह्य तत्रैव स्थापयित्वा क्वापि गते रक्षसि सा भृगुणा विवाहिता । तच्च प्रकट करते हुए पार्श्वचर ने उत्तर दिया—'आयुष्मती, प्रिय बोलना तो सज्जनों की कुलविद्या है । केवल तुम्हारा मुख ही नहीं, प्रत्युत हृदय भी चन्द्रमय है, क्योंकि वह अमृत के शीतल फुहारों के सदृश वचनों से आह्लादित कर रहा है । आपके सदृश लोग जो सौजन्य की जन्मभूमि हैं बड़े ही शुभकर्मों से मिलते हैं, क्योंकि वे सज्जनों के निर्माण की शिल्पकला के स्वरूप हैं । ऐसे कुलीन लोगों के साथ परस्पर बातचीत करना तो दूर है, इनके साथ आँखें ही मिलाकर गौरव की स्थिति में पहुँचा देती हैं । तो सुनिए—यह भार्गववंश के कुलभूषण, महर्षि च्यवन का बहिश्चर प्राण पुत्र दधीच है, इसके पिता भगवान् च्यवन पृथिवी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग लोक में प्रसिद्ध हैं । उन्होंने अपनी तपस्या के प्रभाव से इन्द्र की भुजशक्ति को भी स्तम्भित कर दिया है । उनके चरण-कमल सुर-असुरों की मुकुटमणिशिला पर शयन के शौकीन हैं । अपने तेज से उन्होंने पुलोमा नामक दैत्य को भस्म कर डाला है । ऐसे पिता के पुत्र इस दधीच की जननी का नाम सुकन्या है जो जगद्विजयी सहस्रों नृपतियों से अनुगत शर्यात की सुता, राजपुत्री एवं त्रिभुवन की कन्याओं में रत्न के समान है । देवी सुकन्या को गर्भिणी जान उसके पिता दसवें महीने में प्रसव के लिए अपने

पत्युः पार्श्वात्स्वगृहमानाययत् । असूत च सा तत्र देवी दीर्घायुष- मेनम् । अवर्धतानेहसा च तत्रैवायमानन्दितज्ञातिवर्गो बालस्तारक- राज इव राजीवलोचनो राजगृहे । भर्तृभवनमागच्छन्त्यामपि दुहि- तरि नासेचनकदर्शनमिममुञ्चन्मातामहो मनोविनोदनं नप्तारम् । अशिक्षतायं तत्रैव, सर्पा विद्याः सकलाश्च कलाः । कालेन चोपारूढ- यौवनमिममालोक्याहमिवासावप्यनुभवतु मुखकमलावलोकनानन्द- मस्येति मातामहः कथंकथमप्येनं पितुरन्तिकमधुना व्यसर्जयत् । मामपि तस्यैव देवस्य सुगृहीतनाम्नः शर्यातस्याज्ञाकारिणं विकुक्षिना- मानं भृत्यपरमाणुमवधारयतु भवती । पितुः पादमूलमायान्तं मया साभिसारमकरोत्स्वामी । तद्धि नः कुलक्रमागतं राजकुलम् । उत्तमानां च चिरंतनता जनयत्यनुजीविन्यपि जने कियन्मात्रमपि मन्दाक्षम् । अक्षीणः खलु दाक्षिण्यकोशो महताम् । एतच्च गव्यूतिमात्रमिव सगर्भा सती पुलोम्नागत्यापह्रियमाणतया च्यवनं गर्भमत्याक्षीत् । तेन चान्वर्थ- नाम्ना तद्रक्षो दृष्टैवादह्यत । अन्तर्वत्नी गर्भिणीम् । वैजनने मासि प्रसवमासे । दीर्घायुषमिति साभिप्रायम् । रूपकुलाद्युत्कर्षे वर्णिते सत्येतदेव वरगुणवर्णनमव- शिष्यते । अनेहसा परिपूर्णेन कालेन । 'न जायते यत्र तृप्तिस्तदासेचनकं विदुः' । नप्तारं पौत्रम् । साभिसारं ससहायम् । मन्दाक्षमुपरोधम् । गव्यूतिः क्रोशद्वयम् । पति के पास से अपने घर ले गए । वहाँ उसने चिरंजीवा इस दधीच को उत्पन्न किया । राजा के घर में राजीवलोचन यह चन्द्रमा के समान बांधवों को आनन्दित करता हुआ समय के साथ बढ़ा । पुत्री सुकन्या अपने पति के घर आने लगी, तब भी नाना ने नेत्र के सुखद और मन बहलाने वाले नाती को नहीं छोड़ा । इसने ननिहाल में ही समस्त विद्याओं और कलापों की शिक्षा प्राप्त की । समय से इसे जवान देख और 'मेरे समान इसके पिता भी उसके मुखकमल को देखकर आनन्द का अनुभव करें, वह सोच इसके नाना ने किसी-किसी प्रकार पिता के पास भेजा है। उन्हों सुगृहीतनामा देव शर्यात का आज्ञाकारी विकुक्षि नामक एक तुच्छ भृत्य मुझे समझें । मेरे मालिक ने पिता के पास आते हुए इसके साथ मुझे लगा दिया । वह राजकुल मेरी वंशपरम्परा द्वारा सेवित है । सम्बन्ध के पुराने हो जाने पर उत्तम लोग अपने भृत्य के प्रति कुछ लज्जा का अनुभव करते हैं । महान् लोगों की उदारता का भण्डार कभी नहीं घटता । यहाँ से दो कोस आगे सोन पार भगवान् च्यवन का निवास च्यवनाश्रम है, जो चैत्ररथ नामक कुबेर के उद्यान के सदृश है । हम दोनों की यात्रा वहीं तक है। यदि आप दोनों का

पारेशोणं तस्य भगवतश्च्यवनस्य स्वनाम्ना निर्मितव्यपदेशं च्यावनं नाम चैत्ररथकल्पं काननं निवासः । तदवधिरेवेयं नौ यात्रा । यदि च वो गृहीतक्षणं दाक्षिण्यमनवहेलं वा हृदयमस्माकमुपरि भूमिर्वा प्रसादानामयं जनः श्रवणार्हो वा, ततो न विमाननीयोऽयं नः प्रथमः प्रणयः कुतूहलस्य । वयमपि शुश्रूषवो वृत्तान्तमायुष्मत्योः । नेयमा- कृतिर्दिव्यतां व्यभिचरति । गोत्रनामनी तु श्रोतुमभिलषति नौ हृद- यम् । तत्कथय कतमो वंशः स्पृहणीयतां जन्मना गीतः । का चेय- मत्रभवती भवत्याः समीपे समवाय इव विरोधिनां पदार्थानाम् । तथ- . हि, सन्निहितबालान्धकारा भास्वन्मूर्तिश्च, पुण्डरीकमुखी हरिण- लोचना. च, बालातपप्रभाधारा कुमुदहासिनी च, कलहंसस्वना समु- न्नतपयोधरा च, कमलकोमलकरा हिमगिरिशिलापृथुनितम्बा च, यात्रा प्रस्थानम् । गोत्रं वंशः । समवाय एकत्रस्थितिः । वालेषु केशेष्वन्धकारं तम इति यस्या बालं प्रत्यग्रम् । भास्वती मूर्तिमती, भास्वत आदित्यस्य च मूर्तिः। न कदाचित्सन्निहितबालान्धकारा भवतीति विरोधः । पुण्डरीकं सत्वम्, सिंहश्च यस्या मुखं तत्र कथं हरिणस्य लोचने स्त इति विरोधः । पयोधरौ स्तनौ, मेघाश्च पयोधराः । कलहंसानां स्वनो यस्यां सा । सरित्कथं प्रावृड् भवतीति विरोधः । करो हस्तः, रश्मिश्च । शिला वातवज्जीभूतं हिमम् । यत्र च हिमगिरिशिलाभिः पृथुमध्यभागस्तत्र कथं पद्मकोमलकान्तिः । हिमस्पर्शे पद्मनाशात् । 'मणिबन्धादा- हमारे ऊपर क्षणिक सौजन्य है या हृदय में किसी प्रकार की अवज्ञा नहीं, या यह जन प्रसाद को प्राप्त करने योग्य है तो हमारे कुतूहल का पहला प्रणय उपेक्षा के योग्य नहीं। आप दोनों का वृत्तान्त हम सुनना चाहते हैं । यह आकृति दिव्य जन की ही हो सकती है । हम दोनों का हृदय आपके गोत्र, नाम सुनना चाहता है । तो कहिए—किस वंश को आपने जन्म लेकर स्पृहणीय बनाया ? आपके समीप यह कौन है जो बहुत से विरोधी पदार्थों के समवाय की भाँति लग रही है । जैसा कि इनके बाल अन्धकार के समान सन्निहित हैं, फिर भी सूर्य के समान इनकी मूर्ति देदीप्यमान है । पुण्डरीक (व्याघ्र या श्वेत कमल) के समान इनका मुख है (फिर भी) आँखें हरिण के समान हैं, उगते हुए सूर्य की प्रभा के समान इनका अधर है (फिर भी) कुमुद के सदृश इनकी मुसकान है । मतवाले हंस के समान इनकी आवाज है (फिर भी) इनके पयोधर (स्तन या मेघ) उठे हुए हैं । कमल के समान कोमल इनके हाथ हैं (फिर भी) हिमालय की चट्टान के समान मोटे इनके नितम्ब हैं । ऊँट के समान इनकी दोनों जांघें हैं (फिर भी)

करभोरुर्विलम्बितगमना च, अमुक्तकुमारभावा स्निग्धतारका च' इति । सा त्वावादीत्—'आर्य, श्रोष्यसि कालेन । भूयसो दिवसानत्र स्थातुमभिलषति नौ हृदयम् । अल्पीयांश्चायमध्वा । परिचय एव प्रकटीकरिष्यति । आर्येण न विस्मरणीयोऽयमनुषङ्गदृष्टो जनः' इत्य- भिधाय तूष्णीमभूत् । दधीचस्तु नवाम्भोभरगभीराम्भोधरध्वाननिभया भारत्या नर्तयन्वनलताभवनभाजो भुजंगभुजः सुधीरमुवाच—'आर्य, कनिष्ठं करस्य करभो बहिः' करभश्चोष्ट्रः । विलम्बितं सविलासम्, लम्बितश्च करभो यस्याः । करभोरुः कथं विगतकरभगमनेति विरोधः । कुमारभावो बाल्यम्, कुमारे च भावो भक्तिः । स्निग्धो रम्यः, प्रतीतश्च । तारकाक्ष्णोः कनीनिका, दैत्यभेदश्च तारकः स्कन्देन यो हतः । परिचयः संस्तवः । अनुषङ्गः प्रसङ्गः । विवुक्षितार्थितयापि सावित्र्या कौतुक- निवृत्तिर्मा भूदित्यात्मस्वरूपं नोक्तम् । अत एवोत्तरत्र तदनुबन्ध एवोक्तः— भूयसी दिवसानित्यादिना । स्वरूपोक्तौ च ज्ञातसरस्वतीकत्वेनापत्यजननकार्यभङ्गो भवेत् । भारती वाक् । भुजङ्गभुजो मयूरान्, भुजंग इव भुजावस्येति च । उच्च- चाल धीमी चलती है। कुमारभाव (बाल्यकाल या कार्तिकेय का भाव) इन्होंने नहीं छोड़ा है (फिर भी) इनकी आँखों के तारक (पुतले या तारकासुर) स्नेह को व्यंजित कर रहे हैं।'† सावित्री ने कहा—'आर्य ! समय से सब मालूम हो जायगा । हम दोनों का विचार यहाँ बहुत दिनों तक अभी रहने का है। यह रास्ता बहुत थोड़ा है। परिचय बढ़ने से सब बात खुल जायगी । इस बहाने मिले हुए इस जन को आर्य न भूलेंगे।' इतना कह वह चुप हो गयी । जल भर जाने से गम्भीर आवाज वाले नये मेघ की भाँति लता-भवन के मयूरों को नचाते हुए धीर स्वर में दधीच बोल उठे—'आर्य, अवश्य ही आराधना करने † इस प्रसङ्ग के व्यङ्ग्य विरोधाभासों का स्पष्टीकरण क्रमशः इस प्रकार है—विरोध यह कि जब बाल अन्धकार सन्निहित है तो भगवान् या सूर्य की मूर्ति कैसे हो सकती है । जब कि मुख में पुण्डरीक (व्याघ्र) है तो हरिण का वहां रह सकना कैसे सम्भव है। जहां सूर्य का आतप है वहां कुमुद का हास कहां से, पयोधर या मेघ के उमड़ने की स्थिति में कलहंस मानसरोवर चले जाते हैं, फिर उनकी आवाज का सुन पड़ना सम्भव नहीं । हिमशिखा के समीप कमल टिक नहीं सकते। करभ ऊंट की चाल धीमी नहीं होती। जब कुमार या कार्तिकेय का भाव ग्रहण किया तब तारक (एक असुर, जिसका वध कार्तिकेय ने किया था) स्निग्ध कैसे रह सकता है। ४ ह०

करिष्यति प्रसादमार्णाराध्यमाना । पश्यामस्तावत्तातम् । उत्तिष्ठ व्रजामः' इति । तथेति च तेनाभ्यनुज्ञातः शनकैरूथाय कृतनमस्कृति- रुच्चचाल । तुरगारूढं च तं प्रयान्तं सरस्वती सुचिरमुत्तम्भितपक्ष्मणा निश्चलतारकेण लिखितेनेव चक्षुषा व्यलोकयत् । उत्तीर्य च शोणञ्च चिरेणैव कालेन दधीचः पितुराश्रमपदं जगाम । गत च तस्मिन्स तामेव दिशमालोकयन्ती सुचिरमतिष्ठत् । कृच्छ्रादिव च संजहार दृशम् । अथ मुहूर्तमात्रमिव स्थित्वा स्मृत्वा च तां तस्य रूपसंपदं पुनःपुन- र्व्यस्मयतास्या हृदयम् । भूयोऽपि चक्षुराककाङ्क्ष तद्दर्शनम् । अवशेव केनाप्यनीयत तामेव दिशं दृष्टिः । अप्रहितमपि मनस्तेनैव सार्धमगात् अजायत च नवपल्लव इव बालवनलतायाः कुतोऽप्यस्या अनुराग- श्चेतसि । ततः प्रभृति च सालस्येव शून्येव सनिद्रेव दिवसमन- यत् । अरतमुपयाति च प्रत्यक्पर्यस्तमण्डले लाङ्गलिकाम्तबकताम्र- चाल गन्तुं प्रवृत्तः । उत्तम्भितान्युत्क्षिप्तानि । कुतोऽपि कस्मादपि न ज्ञायत इत्यर्थः । मनुष्यतस्तथाविधस्तादृश्या कथम् नुराग इति । कथमेतदस्या उपपद्यत इति न वाच्यम् । यदाह मुनिः—'शाप- भ्रंशात्तु दिव्यानां तथा चापत्यलिप्सया। कार्यों मानुषसंयोगः शृङ्गाररससंश्रयः ॥' इति । अन्यत्र—कुतः क्षितेर्नवपल्लवोऽनुरागहतो लतार्थो जायत इत्येवमभिलाषरूपं प्रथमं दशान्तरमालभ्येत्यादिना द्वितीयचिन्तनरूपमाह । अनयत् कष्टेनात्यवाह- पर आर्या प्रसन्न होंगी। तब तक हम पिता जी के दर्शन करें। उठिए, चलें।' पार्श्वचर के स्वीकार करने पर दधीच धीरे से उठे और नमस्कार करके चल दिए। घोड़े पर सवार होकर जाते हुए उन्हें सरस्वती निश्चल आँखें फाड़ कर देर तक देखती रही। सोन पार करके कुछ ही देर में दधीच च्यवनाश्रम पहुँचे। उनके चले जाने पर सरस्वती उसी दिशा को देर तक निहारती हुई बैठी रही। बड़ी कठिनाई से वह अपनी आँखें मोड़ सकी। अब सरस्वती का हृदय कुछ देर तक ठहर उस दधीच के रूप-सम्पत्ति का स्मरण करके बार-बार आश्चर्य से भरने लगा। बार-बार उसकी आँखें दधीच के दर्शनों के लिए उत्कण्ठ होने लगीं। मानों उसकी बेसुध नजर को कोई उसी दिशा की ओर फेर लेता था। बिना भेजे ही मन दधीच के साथ ही चला गया। सुकुमार वनलता में नये पल्लव के समान उसके चित्त में अनुराग अंकुरित होने लगा। उसी समय से असलाई-सी, शून्य-सी

त्विषि कमलिनीकामुके कठोरसारसशिरःशोणशोचिषि सावित्रे त्रयीमये तेजसि, तरुणतरतमालश्या मले च मलिनयति व्योम व्योम- व्यापिनि तिमिरसंचये, संचरत्सिद्धसुन्दरीनूपुररवानुसारिणि च मन्दं मन्दं मन्दाकिनीहंस इव समुत्सर्पति शशिनि गगनतलम् कृत- संध्याप्रणामा निशामुख एव निपत्य विमुक्ताङ्गी पल्लवशयने तस्थौ । सावित्र्यपि कृत्वा यथाक्रियमाणं सायंतनं क्रियाकलापमुचिते शयन- काले किसलयशयनमभजत जातनिद्रा च सुष्याप । इतरा तु मुहुर्मुहुरङ्गवलनैर्विलुलितकिसलयशयनतला निमीलित- नयनापि नालभत निद्राम् । अचिन्तयच्च—'मर्त्यलोकः खलु सर्व- यत् । अस्तमित्यादौ पल्लवशयने तस्थाविति संबन्धः । प्रतीच्यां पश्चिमायाम् । लाङ्गलिका फलिनी । मयूरशिखौषधिरित्युपरे, रक्तिकेत्यन्ये । कमलिनीकामुक इति सरस्वतीदयिताभिप्रायेणोक्तम् । कठोरो जरठः । सारसो लक्ष्मणः । शोणो लोहिः । शोचिर्दीप्तिः । 'ऋग्यजुःसामनामानि त्रयो वेदास्त्रयी स्मृता । वेदे च पठ्यते सैषा' । त्रय्येव विद्या तपतीति । 'कृत-' इत्यादिना 'तस्थौ' इत्यन्तेन क्रियान्तरत्यागेन वैमनस्यमावेद्यते । 'वेपते श्वसते चैव मनोरथविचिन्तनैः । प्रद्वेषेणान्यकार्याणामनु- स्मृतिरपीष्यते ॥' निशामुख एवेति । न पुनरुचिते शयनकाले विमुक्ताङ्गीत्यनेन निःसहाङ्गत्वमस्या दर्श्यते । तस्थाविति । न पुनर्निद्रामलभत । यथाक्रियमाणमित्य- नेन च सरस्वतीतॊऽस्या व्यतिरेकं दर्शयन्सरस्वत्या एवानङ्गावस्थाम्राह । विलुलितं विपर्यासितम् । मर्त्यलोक इत्यादिना गुणकीर्तनम् । चतुर्थ्यमवस्था- निंदियाई-सी उसने दिन को व्यतीत किया। जब पश्चिम में ढलते हुए मण्डल वाले, लाङ्ग- लिका नामक फूलों के गुच्छों के समान कान्ति वाले, कमलिनियों को चाहने वाले तथा वृद्ध सारस के सिर के समान ललाई वाले सूर्य का वेदमय तेज अस्त हो रहा था, विशाल तमाल वृक्ष के समान काला, आकाशव्यापी प्रगाढ़ अंधकार आकाश को मलिन कर रहा था तथा चलती-फिरती सिद्धाङ्गनाओं के नूपुरों की ध्वनि का अनुसरण करने वाले आकाशगंगा के हंस के समान चन्द्रमा आकाश में धीरे-धीरे उदित हो रहा था उस समय सायं-सन्ध्या- वन्दन करके सरस्वती रात के आरम्भ होते ही अपने अङ्गों की सुध-बुध भूल पल्लव के शयन पर पड़ रही। सावित्री भी सायंकालीन क्रियाओं से निवृत्त होकर सोने के समय पल्लवशयन पर पहुँची और नींद आते ही सो गई। लेकिन दूसरां (सरस्वती) बार-बार करवट बदलने लगी, अपने पल्लवशयन को मसल डाला, आंखें मूंद ली, फिर भी नींद नहीं आई। सोचने लगी—'निश्चय ही मर्त्यलोक समस्त