भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 90

पारेशोणं तस्य भगवतश्च्यवनस्य स्वनाम्ना निर्मितव्यपदेशं च्यावनं नाम चैत्ररथकल्पं काननं निवासः । तदवधिरेवेयं नौ यात्रा । यदि च वो गृहीतक्षणं दाक्षिण्यमनवहेलं वा हृदयमस्माकमुपरि भूमिर्वा प्रसादानामयं जनः श्रवणार्हो वा, ततो न विमाननीयोऽयं नः प्रथमः प्रणयः कुतूहलस्य । वयमपि शुश्रूषवो वृत्तान्तमायुष्मत्योः । नेयमा- कृतिर्दिव्यतां व्यभिचरति । गोत्रनामनी तु श्रोतुमभिलषति नौ हृद- यम् । तत्कथय कतमो वंशः स्पृहणीयतां जन्मना गीतः । का चेय- मत्रभवती भवत्याः समीपे समवाय इव विरोधिनां पदार्थानाम् । तथ- . हि, सन्निहितबालान्धकारा भास्वन्मूर्तिश्च, पुण्डरीकमुखी हरिण- लोचना. च, बालातपप्रभाधारा कुमुदहासिनी च, कलहंसस्वना समु- न्नतपयोधरा च, कमलकोमलकरा हिमगिरिशिलापृथुनितम्बा च, यात्रा प्रस्थानम् । गोत्रं वंशः । समवाय एकत्रस्थितिः । वालेषु केशेष्वन्धकारं तम इति यस्या बालं प्रत्यग्रम् । भास्वती मूर्तिमती, भास्वत आदित्यस्य च मूर्तिः। न कदाचित्सन्निहितबालान्धकारा भवतीति विरोधः । पुण्डरीकं सत्वम्, सिंहश्च यस्या मुखं तत्र कथं हरिणस्य लोचने स्त इति विरोधः । पयोधरौ स्तनौ, मेघाश्च पयोधराः । कलहंसानां स्वनो यस्यां सा । सरित्कथं प्रावृड् भवतीति विरोधः । करो हस्तः, रश्मिश्च । शिला वातवज्जीभूतं हिमम् । यत्र च हिमगिरिशिलाभिः पृथुमध्यभागस्तत्र कथं पद्मकोमलकान्तिः । हिमस्पर्शे पद्मनाशात् । 'मणिबन्धादा- हमारे ऊपर क्षणिक सौजन्य है या हृदय में किसी प्रकार की अवज्ञा नहीं, या यह जन प्रसाद को प्राप्त करने योग्य है तो हमारे कुतूहल का पहला प्रणय उपेक्षा के योग्य नहीं। आप दोनों का वृत्तान्त हम सुनना चाहते हैं । यह आकृति दिव्य जन की ही हो सकती है । हम दोनों का हृदय आपके गोत्र, नाम सुनना चाहता है । तो कहिए—किस वंश को आपने जन्म लेकर स्पृहणीय बनाया ? आपके समीप यह कौन है जो बहुत से विरोधी पदार्थों के समवाय की भाँति लग रही है । जैसा कि इनके बाल अन्धकार के समान सन्निहित हैं, फिर भी सूर्य के समान इनकी मूर्ति देदीप्यमान है । पुण्डरीक (व्याघ्र या श्वेत कमल) के समान इनका मुख है (फिर भी) आँखें हरिण के समान हैं, उगते हुए सूर्य की प्रभा के समान इनका अधर है (फिर भी) कुमुद के सदृश इनकी मुसकान है । मतवाले हंस के समान इनकी आवाज है (फिर भी) इनके पयोधर (स्तन या मेघ) उठे हुए हैं । कमल के समान कोमल इनके हाथ हैं (फिर भी) हिमालय की चट्टान के समान मोटे इनके नितम्ब हैं । ऊँट के समान इनकी दोनों जांघें हैं (फिर भी)