हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरभोरुर्विलम्बितगमना च, अमुक्तकुमारभावा स्निग्धतारका च' इति । सा त्वावादीत्—'आर्य, श्रोष्यसि कालेन । भूयसो दिवसानत्र स्थातुमभिलषति नौ हृदयम् । अल्पीयांश्चायमध्वा । परिचय एव प्रकटीकरिष्यति । आर्येण न विस्मरणीयोऽयमनुषङ्गदृष्टो जनः' इत्य- भिधाय तूष्णीमभूत् । दधीचस्तु नवाम्भोभरगभीराम्भोधरध्वाननिभया भारत्या नर्तयन्वनलताभवनभाजो भुजंगभुजः सुधीरमुवाच—'आर्य, कनिष्ठं करस्य करभो बहिः' करभश्चोष्ट्रः । विलम्बितं सविलासम्, लम्बितश्च करभो यस्याः । करभोरुः कथं विगतकरभगमनेति विरोधः । कुमारभावो बाल्यम्, कुमारे च भावो भक्तिः । स्निग्धो रम्यः, प्रतीतश्च । तारकाक्ष्णोः कनीनिका, दैत्यभेदश्च तारकः स्कन्देन यो हतः । परिचयः संस्तवः । अनुषङ्गः प्रसङ्गः । विवुक्षितार्थितयापि सावित्र्या कौतुक- निवृत्तिर्मा भूदित्यात्मस्वरूपं नोक्तम् । अत एवोत्तरत्र तदनुबन्ध एवोक्तः— भूयसी दिवसानित्यादिना । स्वरूपोक्तौ च ज्ञातसरस्वतीकत्वेनापत्यजननकार्यभङ्गो भवेत् । भारती वाक् । भुजङ्गभुजो मयूरान्, भुजंग इव भुजावस्येति च । उच्च- चाल धीमी चलती है। कुमारभाव (बाल्यकाल या कार्तिकेय का भाव) इन्होंने नहीं छोड़ा है (फिर भी) इनकी आँखों के तारक (पुतले या तारकासुर) स्नेह को व्यंजित कर रहे हैं।'† सावित्री ने कहा—'आर्य ! समय से सब मालूम हो जायगा । हम दोनों का विचार यहाँ बहुत दिनों तक अभी रहने का है। यह रास्ता बहुत थोड़ा है। परिचय बढ़ने से सब बात खुल जायगी । इस बहाने मिले हुए इस जन को आर्य न भूलेंगे।' इतना कह वह चुप हो गयी । जल भर जाने से गम्भीर आवाज वाले नये मेघ की भाँति लता-भवन के मयूरों को नचाते हुए धीर स्वर में दधीच बोल उठे—'आर्य, अवश्य ही आराधना करने † इस प्रसङ्ग के व्यङ्ग्य विरोधाभासों का स्पष्टीकरण क्रमशः इस प्रकार है—विरोध यह कि जब बाल अन्धकार सन्निहित है तो भगवान् या सूर्य की मूर्ति कैसे हो सकती है । जब कि मुख में पुण्डरीक (व्याघ्र) है तो हरिण का वहां रह सकना कैसे सम्भव है। जहां सूर्य का आतप है वहां कुमुद का हास कहां से, पयोधर या मेघ के उमड़ने की स्थिति में कलहंस मानसरोवर चले जाते हैं, फिर उनकी आवाज का सुन पड़ना सम्भव नहीं । हिमशिखा के समीप कमल टिक नहीं सकते। करभ ऊंट की चाल धीमी नहीं होती। जब कुमार या कार्तिकेय का भाव ग्रहण किया तब तारक (एक असुर, जिसका वध कार्तिकेय ने किया था) स्निग्ध कैसे रह सकता है। ४ ह०