हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
पृष्ठ 92, कुल 184 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरिष्यति प्रसादमार्णाराध्यमाना । पश्यामस्तावत्तातम् । उत्तिष्ठ व्रजामः' इति । तथेति च तेनाभ्यनुज्ञातः शनकैरूथाय कृतनमस्कृति- रुच्चचाल । तुरगारूढं च तं प्रयान्तं सरस्वती सुचिरमुत्तम्भितपक्ष्मणा निश्चलतारकेण लिखितेनेव चक्षुषा व्यलोकयत् । उत्तीर्य च शोणञ्च चिरेणैव कालेन दधीचः पितुराश्रमपदं जगाम । गत च तस्मिन्स तामेव दिशमालोकयन्ती सुचिरमतिष्ठत् । कृच्छ्रादिव च संजहार दृशम् । अथ मुहूर्तमात्रमिव स्थित्वा स्मृत्वा च तां तस्य रूपसंपदं पुनःपुन- र्व्यस्मयतास्या हृदयम् । भूयोऽपि चक्षुराककाङ्क्ष तद्दर्शनम् । अवशेव केनाप्यनीयत तामेव दिशं दृष्टिः । अप्रहितमपि मनस्तेनैव सार्धमगात् अजायत च नवपल्लव इव बालवनलतायाः कुतोऽप्यस्या अनुराग- श्चेतसि । ततः प्रभृति च सालस्येव शून्येव सनिद्रेव दिवसमन- यत् । अरतमुपयाति च प्रत्यक्पर्यस्तमण्डले लाङ्गलिकाम्तबकताम्र- चाल गन्तुं प्रवृत्तः । उत्तम्भितान्युत्क्षिप्तानि । कुतोऽपि कस्मादपि न ज्ञायत इत्यर्थः । मनुष्यतस्तथाविधस्तादृश्या कथम् नुराग इति । कथमेतदस्या उपपद्यत इति न वाच्यम् । यदाह मुनिः—'शाप- भ्रंशात्तु दिव्यानां तथा चापत्यलिप्सया। कार्यों मानुषसंयोगः शृङ्गाररससंश्रयः ॥' इति । अन्यत्र—कुतः क्षितेर्नवपल्लवोऽनुरागहतो लतार्थो जायत इत्येवमभिलाषरूपं प्रथमं दशान्तरमालभ्येत्यादिना द्वितीयचिन्तनरूपमाह । अनयत् कष्टेनात्यवाह- पर आर्या प्रसन्न होंगी। तब तक हम पिता जी के दर्शन करें। उठिए, चलें।' पार्श्वचर के स्वीकार करने पर दधीच धीरे से उठे और नमस्कार करके चल दिए। घोड़े पर सवार होकर जाते हुए उन्हें सरस्वती निश्चल आँखें फाड़ कर देर तक देखती रही। सोन पार करके कुछ ही देर में दधीच च्यवनाश्रम पहुँचे। उनके चले जाने पर सरस्वती उसी दिशा को देर तक निहारती हुई बैठी रही। बड़ी कठिनाई से वह अपनी आँखें मोड़ सकी। अब सरस्वती का हृदय कुछ देर तक ठहर उस दधीच के रूप-सम्पत्ति का स्मरण करके बार-बार आश्चर्य से भरने लगा। बार-बार उसकी आँखें दधीच के दर्शनों के लिए उत्कण्ठ होने लगीं। मानों उसकी बेसुध नजर को कोई उसी दिशा की ओर फेर लेता था। बिना भेजे ही मन दधीच के साथ ही चला गया। सुकुमार वनलता में नये पल्लव के समान उसके चित्त में अनुराग अंकुरित होने लगा। उसी समय से असलाई-सी, शून्य-सी