भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 184 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 93

त्विषि कमलिनीकामुके कठोरसारसशिरःशोणशोचिषि सावित्रे त्रयीमये तेजसि, तरुणतरतमालश्या मले च मलिनयति व्योम व्योम- व्यापिनि तिमिरसंचये, संचरत्सिद्धसुन्दरीनूपुररवानुसारिणि च मन्दं मन्दं मन्दाकिनीहंस इव समुत्सर्पति शशिनि गगनतलम् कृत- संध्याप्रणामा निशामुख एव निपत्य विमुक्ताङ्गी पल्लवशयने तस्थौ । सावित्र्यपि कृत्वा यथाक्रियमाणं सायंतनं क्रियाकलापमुचिते शयन- काले किसलयशयनमभजत जातनिद्रा च सुष्याप । इतरा तु मुहुर्मुहुरङ्गवलनैर्विलुलितकिसलयशयनतला निमीलित- नयनापि नालभत निद्राम् । अचिन्तयच्च—'मर्त्यलोकः खलु सर्व- यत् । अस्तमित्यादौ पल्लवशयने तस्थाविति संबन्धः । प्रतीच्यां पश्चिमायाम् । लाङ्गलिका फलिनी । मयूरशिखौषधिरित्युपरे, रक्तिकेत्यन्ये । कमलिनीकामुक इति सरस्वतीदयिताभिप्रायेणोक्तम् । कठोरो जरठः । सारसो लक्ष्मणः । शोणो लोहिः । शोचिर्दीप्तिः । 'ऋग्यजुःसामनामानि त्रयो वेदास्त्रयी स्मृता । वेदे च पठ्यते सैषा' । त्रय्येव विद्या तपतीति । 'कृत-' इत्यादिना 'तस्थौ' इत्यन्तेन क्रियान्तरत्यागेन वैमनस्यमावेद्यते । 'वेपते श्वसते चैव मनोरथविचिन्तनैः । प्रद्वेषेणान्यकार्याणामनु- स्मृतिरपीष्यते ॥' निशामुख एवेति । न पुनरुचिते शयनकाले विमुक्ताङ्गीत्यनेन निःसहाङ्गत्वमस्या दर्श्यते । तस्थाविति । न पुनर्निद्रामलभत । यथाक्रियमाणमित्य- नेन च सरस्वतीतॊऽस्या व्यतिरेकं दर्शयन्सरस्वत्या एवानङ्गावस्थाम्राह । विलुलितं विपर्यासितम् । मर्त्यलोक इत्यादिना गुणकीर्तनम् । चतुर्थ्यमवस्था- निंदियाई-सी उसने दिन को व्यतीत किया। जब पश्चिम में ढलते हुए मण्डल वाले, लाङ्ग- लिका नामक फूलों के गुच्छों के समान कान्ति वाले, कमलिनियों को चाहने वाले तथा वृद्ध सारस के सिर के समान ललाई वाले सूर्य का वेदमय तेज अस्त हो रहा था, विशाल तमाल वृक्ष के समान काला, आकाशव्यापी प्रगाढ़ अंधकार आकाश को मलिन कर रहा था तथा चलती-फिरती सिद्धाङ्गनाओं के नूपुरों की ध्वनि का अनुसरण करने वाले आकाशगंगा के हंस के समान चन्द्रमा आकाश में धीरे-धीरे उदित हो रहा था उस समय सायं-सन्ध्या- वन्दन करके सरस्वती रात के आरम्भ होते ही अपने अङ्गों की सुध-बुध भूल पल्लव के शयन पर पड़ रही। सावित्री भी सायंकालीन क्रियाओं से निवृत्त होकर सोने के समय पल्लवशयन पर पहुँची और नींद आते ही सो गई। लेकिन दूसरां (सरस्वती) बार-बार करवट बदलने लगी, अपने पल्लवशयन को मसल डाला, आंखें मूंद ली, फिर भी नींद नहीं आई। सोचने लगी—'निश्चय ही मर्त्यलोक समस्त