भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 87

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ४५ प्रथम उच्छ्वासः शयाः । यतस्त्रिभुवनाभिभावि रूपमिदमस्य महानुभावस्य । सौजन्य- परतन्त्रा चेयं देवानांप्रियस्यातिभद्रता कारयति कथां न तु युवति- जनसहोत्था तरलता । वत्कथयागमनेनापुण्यभाक्कतम्रो विजृम्भित- विरहव्यथः शून्यतां नीतो देशः ? क्व वा गन्तव्यम् ? को वायमपहृतहर- हुंकाराहंकारोऽपर इवानन्यजो युवा ? किंनाम्नो वा समृद्धतपसः पितुर- यममृतवर्षी कौस्तुभमणिरिव हतेर्हृदयमाह्लादयति ? का चास्य त्रिभु- वननमस्या विभातसंध्येव महतस्तेजसो जननी ? कानि वास्य पुण्य भाञ्जि भजन्त्यभिख्यामक्षराणि ? आर्यपरिज्ञानेऽप्ययमेव क्रमः कौतुकानुरोधिनो हृदयस्य' इत्युक्तवत्यां तस्यां प्रकटितप्रश्रयोऽसौ वाचालयति किंचन जल्पयति । अत्रापि प्रश्रयेणेति साभिप्रायम् । तथा च—'अन्यं- यान्यवनितागतचित्तं चित्तनाथमभिशङ्कितवत्या । पीतभूरिसुरयापि न मोदे निर्वृ- तिर्हि मनसो मदहेतोः ॥' इत्युक्तम् । नम्रे प्रह्वे, कुब्जे च । गुणो विनयादिः, ज्या च । कोटिः प्रकर्षः, धनुःशिखा च । देवानांप्रियस्येति पूजावचनम् । षष्ठ्या अलुक् । अत्रागमनेत्यादिना ब्रह्मोक्तशापबुद्ध्या दधीचस्य तद्धर्तुंयोग्यतया कतम इति देशोत्कर्षकुलादिकं पृच्छति । कस्येति । देवस्य । सिद्धा देवाः । अनन्यजः कामः । महतस्तेजस इति । महच्च तेजः सूर्याख्यम् । अभिख्या नाम । अयमेव क्रम इति । यथास्योत्पत्त्यादिकं तद्वद्भवतोऽपीत्यर्थः । कला उपायः । भूरिति रेफान्तो भूवाची । अधिक हो जाता है, जैसे धनुष के अग्रभाग तक उसका गुण बढ़ जाता है। पहले कभी नहीं देखे गए फिर देखे जाने वाले विधाता के उत्कृष्ट निर्माण और लोगों में अत्यन्त आश्चर्य को उत्पन्न कर देते हैं। बात यह है कि इन महानुभावों का रूप त्रिभुवन को अभिभूत कर देने वाला है। देवानांप्रिय की सौजन्य से भरी यह अतिभद्रता ही मुझे बोलने के लिए तत्पर कर रही है, युवतियों में स्वभावतः होने वाली चंचलता नहीं। तो कहिए इन्होंने किस पुण्यहीन देश को अपनी विरह-व्यथा के द्वारा सूना कर दिया है। ये कहाँ जायँगे ? ये मानों दूसरे कामदेव हैं जो शिव के हुँकारजनित अहंकार को न मानकर उत्पन्न हो गया है। कौन हैं ये ? बढ़ी हुई तपस्या वाले किस पिता के अमृतवर्षी-स्वभाव से ये हृदय को आह्लादित करते हैं जैसे कौस्तुभमणि विष्णु के हृदय को ? त्रिभुवन द्वारा नमन करने योग्य और महान् तेजस्वी को उत्पन्न करने वाली प्रभात की सन्ध्या कौन इनकी जननी है ? कौन से पुण्यवान् अक्षर इनके नाम में जुड़ते हैं ! आर्य के सम्बन्ध में जानने के लिए इस कुतूहल भरे हृदय के प्रश्न क्रमशः ये ही हैं।' सावित्री के इतना पूछने पर विनय