हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ ॥हर्षचरितम्॥ प्रतिव्याजहार—'आयुष्मति, सतां हि प्रियंवदता कुलविद्या । न केवल- माननं हृदयमपि च ते चन्द्रमयमिव सुधाशीकरशीतलैराह्लादयति वचोभिः । सौजन्यजन्मभूमयो भूयसा शुभेन सज्जननिर्माणशिल्पकला इव भावदृशो दृश्यन्ते । दूरे तावदन्योन्यस्याभिलपनमभिजातः सह दृशोऽपि मिश्रीभूता महतीं भूमिमारोपयन्ति । श्रूयताम्—अयं खलु भूषणं भार्गववंशस्य भगवतो भूर्भुवःस्वस्त्रितयतिलकस्य, अदभ्रप्रभाव- स्तम्भितजम्भारिभुजस्तम्भस्य, सुरासुरमुकुटमणिशिलाशयनदुर्ल- लितपादपङ्केरुहस्य, निजतेजःप्रसरप्लुष्टपुलोम्नश्च्यवनस्य बहिर्वृत्तिः जीवितं दधीचो नाम तनयः । जन्यन्यस्य जितजगतोऽनेकपार्थिव- सहस्रानुयातस्य शर्यातस्य सुता राजपुत्री त्रिभुवनकन्यारत्नं सुकन्या नाम । तां खलु देवीमन्तर्वत्नीं विदित्वा वैजनने मासि प्रसवाय पिता भुव इति रेफान्तः पातालवाची । भूश्च भुवश्च स्वश्च भूर्भुवःस्वः, एषां त्रयमिति समासः । अदभ्रोऽनल्पः । जम्भारिरिन्द्रः । स ह्यश्विभ्यां यज्ञभागभुजौ कुर्वावामिति चिरं प्रार्थितः । तथेति प्रतिपद्य ताभ्यां भागं दददिन्द्रेणोद्यतवज्रेण रोषितः । तत- स्तेनास्य सवज्रः स्तम्भितो भुज इति । दुर्ललितोऽलभ्यविषयः । प्लुष्टपुलोम्न इति अनवरतं रुदत्यां दुहितरि कोपान्मात्रा गुहाणेमामित पुलोम्नो राक्षसस्योक्तम् तत्तस्तां प्रतिगृह्य तत्रैव स्थापयित्वा क्वापि गते रक्षसि सा भृगुणा विवाहिता । तच्च प्रकट करते हुए पार्श्वचर ने उत्तर दिया—'आयुष्मती, प्रिय बोलना तो सज्जनों की कुलविद्या है । केवल तुम्हारा मुख ही नहीं, प्रत्युत हृदय भी चन्द्रमय है, क्योंकि वह अमृत के शीतल फुहारों के सदृश वचनों से आह्लादित कर रहा है । आपके सदृश लोग जो सौजन्य की जन्मभूमि हैं बड़े ही शुभकर्मों से मिलते हैं, क्योंकि वे सज्जनों के निर्माण की शिल्पकला के स्वरूप हैं । ऐसे कुलीन लोगों के साथ परस्पर बातचीत करना तो दूर है, इनके साथ आँखें ही मिलाकर गौरव की स्थिति में पहुँचा देती हैं । तो सुनिए—यह भार्गववंश के कुलभूषण, महर्षि च्यवन का बहिश्चर प्राण पुत्र दधीच है, इसके पिता भगवान् च्यवन पृथिवी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग लोक में प्रसिद्ध हैं । उन्होंने अपनी तपस्या के प्रभाव से इन्द्र की भुजशक्ति को भी स्तम्भित कर दिया है । उनके चरण-कमल सुर-असुरों की मुकुटमणिशिला पर शयन के शौकीन हैं । अपने तेज से उन्होंने पुलोमा नामक दैत्य को भस्म कर डाला है । ऐसे पिता के पुत्र इस दधीच की जननी का नाम सुकन्या है जो जगद्विजयी सहस्रों नृपतियों से अनुगत शर्यात की सुता, राजपुत्री एवं त्रिभुवन की कन्याओं में रत्न के समान है । देवी सुकन्या को गर्भिणी जान उसके पिता दसवें महीने में प्रसव के लिए अपने