हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ४४ हर्षचरितम्
च तुरगादवततार। निवारितपरिजनश्च तेन द्वितीयेन साधुना सह चरणाभ्यामेव सविनयमुपससर्प । कृतोपसंग्रहणौ तौ सावित्री समं सरस्वत्या किसलयासनदानादिना सकुसुमफलार्घ्यावसानेन वनवासोचितेनातिथ्येन यथाक्रममुपजग्राह । आसीनयाश्च तयोरासीन नातिचिरमिव स्थित्वा तं द्वितीयं प्रवयसमुद्दिश्यावादीत्—'आर्य, सहजलज्जाधनस्य प्रमदाजनस्य प्रथमाभिभाषणमशालीनता, विशेषतो वनमृगीमुग्धस्य कुलकुमारीजनस्य । केवलमियमलोकनकृतार्थेषु चक्षुषे स्पृहयन्ती प्रेरयत्युदन्तश्रवणकुतूहलिनी श्रोत्रवृत्तिः । प्रथम- दर्शने चोपायनमिवोपनयति सज्जनः प्रणयम् । अप्रगल्भमपि जनं प्रभवता प्रश्रयेणार्पितं मनो मध्विव वाचालयति । अयत्नेनैवातिनम्रे साधौ धनुषीव गुणः परां कोटिमारोपयति विस्रम्भः । जनयन्ति च विस्मयमतिधीरधियामप्यदृष्टपूर्वा दृश्यमाना जगति स्रष्टुः सृष्टयति-
साधुना विनीतेन । 'उपसंग्रहणं धीराः कथयन्त्यभिवादनम् ।' आतिथ्यमेवोप- जग्राहापूजयत् । 'प्रवयाः स्यात्परिणतः' अशालीनता धृष्टता । वनशब्देन मृगी- सामान्येऽपि जनसंपर्काद्विभावमाह । उपायनं ढौकनिका । उपनयति ढौकयति । प्रगल्भमित्यादि । मनःकर्तृ अप्रगल्भमपि जनं वाचालयति । कीदृशम् ? प्रभवता स्वामिना प्रश्रयेण प्रत्यर्पितं दत्तमैवंविधमस्मदीयं युष्मासु मन इति बहिः प्रकाशितं यच्च परतश्च केनापि प्रभावशीलेन ढौकितं मध्वप्रगल्भमपि जनं कुलयोषितप्रायं
उस लतामण्डप के समीप पहुँच गया । कुछ ही दूर पर घोड़े से उतर गया । अपने और साथियों को उसने रोक दिया और उस सज्जन पार्श्वचर को साथ लेकर पैदल ही विनीत भाव से आया । सरस्वती के साथ सावित्री ने उन दोनों का अभिवादन किया और वन- वास के योग्य फूल एवं अर्घ्य आदि से उनका क्रम से आतिथ्य-सत्कार किया । दोनों पूर्ण रूप से स्थिर हुए तो वह स्वयं बैठी और कुछ ही देर ठहर कर उस दूसरे वृद्ध सज्जन से बोली—'आर्य, सहजलज्जाशील नारियों का पहले पहल बोल बैठना बड़ी धृष्टता है, विशेष कर तो उनका जो वन्य मृगी की भाँति मुग्ध कुलकुमारियाँ हैं । आँखें तो देखकर कृतार्थ हो गईं, पर केवल कर्णेन्द्रिय की वृत्ति वृत्तान्त सुनने के लिए कुतूहल से प्रेरित कर रही है । प्रथम दर्शन में ही सज्जन व्यक्ति उपहार के रूप में प्रणय को समर्पित करता है । प्रभावशाली विनय से अर्पित किया हुआ मन मध के समान अधृष्ट जन को भी वाचाल बना देता है । अत्यन्त नम्र स्वभाव वाले सज्जन में बिना यत्न के ही विश्वास CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.