हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] प्रथम उच्छ्वासः । ४३
पार्श्वे च तस्य द्वितीयमपरसंश्लिष्टतुरङ्गम्, प्रांशुमुत्तप्ततपनीयस्तम्भा- कारम्, परिणतवयसमपि व्यायामकठिनकायम्, नीचनखश्मश्रुकेशम्, शुक्तिखलतिम्, ईषत्तुन्दिलम्, रोमशोरःस्थलम्, अनुल्बणोदारवेषतया जरामपि विनयमिव शिक्षयन्तम्, गुणानपि गरिमाणमिवानयन्तम्, महानुभावतामपि शिष्यतामिवानयन्तम्, आचारस्याप्याचार्यमिव कुर्वाणम्, वलक्षवारबाणधारिणम्, धौतदुकूलपट्टिकापरिवेष्टित- मौलिं पुरुषम् । अथ स युवा पुरोयायिनां यथादर्शनं प्रतिनिवृत्यातिविस्मितमनसां कथयतां पदातीनां सकाशादुपलभ्य दिव्याकृति तत्कन्यायुगलमुपजात- कुतूहलः प्रतूर्णतुरगो दिदृक्षुस्तं लतामण्डपोद्देशमाजगाम । दूरादेव
शुक्तिखलतिं शुक्लाकारखल्वाटम् । तुन्दिलं लम्बोदरम् । अत एवास्य विकु- क्षिरिति नाम । अनुल्बणोऽनुद्धतः । उदारः श्रेष्ठः । जरामिति । जरा किल सर्वं- विनयं शिक्षयति । महानुभावता महाशयता । अनुभावयति कार्यमकार्यं वा बोध- यतीत्यनुभावः । शिष्यतामिति । परशासनदक्षकर्मं महानुभावतया तत एवावसो- यत इत्युक्तं भवति । आचारः शास्त्रकारप्रदर्शिता विशिष्टा नीतिः । स च सर्वस्मि- न्नाचार्यकमवलम्बते । संस्कारातिशयमापादयतीत्यर्थः । वलक्षः शुक्लः । वारबाणः कञ्चुकः । मौलयः केशाः । अथेति । नतु गतागतिकतया सर्वचेतनामभिप्रायेण सौन्दर्यमेतयोरभिव्यज्यते । प्रतिनिवृत्य न पुनः प्रसङ्गत उपेत्य । कन्याकत्वादेतन्नानुचितम् । प्रतूर्णी वेगगामी ।
उस नवयुवक के बगल में एक दूसरे पुरुष को देखा । वह भी दूसरे घोड़े पर सवार था । उसका कद लम्बा था । उसकी आकृति तपे हुए सोने के खम्भे के समान था । अवस्था अधेड़ होने पर भी उसका शरीर व्यायाम से गँठा हुआ था । उसके दाढ़ी, मूँछ और नाखून साफ-सुथरे कटे हुए थे । बाल झड़ जाने से बिलकुल सितुहे-जैसा लगता था । उसकी तोंद निकल आई थी । छाती में बाल जम गए थे, वेष सौम्य और श्रेष्ठ था, मानो वह अपनी वृद्धावस्था को भी विनय की सीख दे रहा था, गुणों में भी गौरव भर रहा था, महानुभावता को भी शिष्य बना रहा था, आचारों का भी आचार्य हो रहा था । वह उज्ज्वल कंचुक पहने हुए और सिर में धुली हुई दुकूलपट्टिका बाँधे हुए था । वह युवक देखकर लौटे हुए अग्रगामी पैदल सैनिकों से दिव्य आकृति वाली दो कन्याओं के विषय में सुनते ही कुतूहल से भर कर देखने के लिए उत्सुक हो घोड़े को तेज कर