भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 73

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम उच्छ्वासः ३१ अन्येद्युरुदिते भगवति त्रिभुवनशेखरे खणखणायमानस्खलत्खलीन- क्षतनिजतुरगमुखक्षिप्तेन क्षतजेनेव पाटेलितवपुष्युदयाचलचूडामणौ जरत्कृ- कवाकुचूडारुणारुणपुरःसरे विरोचते नातिदूरवर्ती विविच्या पितामहविमान- हंसकुलपालः पर्यटन्नपरवक्त्रमुच्चैरगायत्— 'तरलयसि दृशं किमुत्सुकामकलुषमानसवासलालिते । अवतर कलहंसि वापिकां पुनरपि यास्यसि पङ्कजालयम्' ॥ तच्छ्रुत्वा सरस्वती पुनरचिन्तयत्—'अहमिवानेन पर्यन्त्युक्ता । भवतु । योगे हि तदुक्तम्—'आदौ समाधिमासीत पश्चाद्योगमुपाचरेत्' इति । रणरणको दुःखमरतिकृतम् । अन्येद्युरन्यस्मिन्नहनि । एते च कालाः संख्यादयो व्यवहारा इहत्या ब्रह्मलोक उपचारिताः । शेखर इव । शेखरो मुण्डमालकः । खलीनं कविका । क्षतजं रक्तम् । कृकवाकुः । कुक्कुटः । चूड़ा मांसमयी शेखरिका । विविच्य विचार्य । विमानपालः स्वप्रस्तावे हंसीं यदाह तेन सरस्वती पर्यन्‌योजितेवाभूत् । अपरवक्त्राख्यं वृत्तमाख्यायिकासु प्रयोक्तव्यम् । तथा चाह भामहः—'वक्त्रं चापर- वक्त्रं च काव्ये काव्यार्थशंसिनि' इति । तरलयसीत्यादि । अकलुषं मानसं यस्य स निर्मलचेता ब्रह्मा, मानसाख्यं सरः । लालिता शीलिता । वापिका पुष्करिणी, उप्यन्तेऽस्यां तानि कर्माणीति वापिका, मर्त्यभूमिरपि । पङ्कजमा- दूसरे दिन तीनों भुवन के शिरोमाल एवं उदयाचल के चूडामणि भगवान् सूर्य उदित हुए । उनका मण्डल टहाका लाल था, मानों खण-खण करते हुए लगाम की क्षति से उत्पन्न अपने घोड़ों के मुखरुधिर के फव्वारे उस पर पड़ गए हों। वृद्ध कुक्कुट की चूड़ा के समान लाल वर्ण वाला अरुण उनके आगे बैठा था। कुछ ही दूर पर घूमते हुये ब्रह्मा जी के वाहन हंसों के रक्षक ने सोच कर ऊँचे स्वर से अपवक्त्र का गान किया— 'अरी कलहंसी, मानसरोवर के निर्मल जल में रहने वाली तू अपनी उत्सुक आंखों को क्यों चंचल कर रही है ? अभी बावली में उतर जा, फिर पंकजालय (सरोवर) में जाना†।' उसे सुन कर सरस्वती ने फिर सोचा—'मानों मुझसे इसने कहा है। अच्छा, मैं † इस श्लोक में हंसपाल सरस्वती को भी सिखावन दे रहा है कि सरस्वती, तू निर्मल- चित्त ब्रह्मा जी की लाड़ली है, क्यों अपनी उत्सुक आँखें थका रही हैं ? अभी वापिका (मर्त्यलोक) में उतर, फिर ब्रह्मा जी (पंकजालय) को प्राप्त कर लेना। CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.