भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 184 में से

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पृष्ठ 72

चरणचतुरः सहपांशुकीडापरिचयपेशलः प्रेयान्सखीजनः क्षितित- लावतरणाय। अनन्यशरणा चाद्यैव प्रभृति प्रतिपद्यस्व मनसा वाचा क्रियया च सर्वविद्याविधातारं दातारं च श्वःश्रेयसस्य चरणरजः- पवित्रितत्रिदशासुरं सुधासूतिकलिकाकल्पितकर्णावतंसं देवदेवं त्रिभुवनगुरुं त्र्यम्बकम्। अल्पीयसैव कालेन स ते शापशोकविरतिं वितरिष्यति' इति। एवमुक्ता मुक्तमुक्ताफलधवललोचनजललवा सरस्वती प्रत्यवा- दीत्—'प्रियसखि, त्वया सह विचरन्त्या न मे कांचिदपि पीडामुत्पा- दयिष्यति ब्रह्मलोकविरहः शापशोको वा। केवलं कमलासनसेवासुख- मार्द्रयति मे हृदयम्। अपि च त्वमेव वेत्सि मे भुवि धर्मधामानि समाधि- साधनानि योगयोग्यानि च स्थानानि स्थातुम्' इत्येवमभिधाय विरराम। रणरणकोपनीतप्रजागरा चानिमीलितलोचनैव तां निशा- मनयत्। सस्य कल्याणस्य दातारम्। सुधासूतिश्चन्द्रः। कलिका तारिका। शापविरति- र्ब्रह्मणैवोक्ता। अतस्तत्र किमन्यापेक्षयेत्याशङ्क्याह—अल्पीयसैव कालेनेति। आर्द्रयति स्नेहयति। धर्मधामानि। मध्यदेशादीनि समाधिश्चित्तैकाग्रधम्। उपचार करने में चतुर, बाल्यकाल से ही धूल की क्रीडाओं का साथी और प्रिय यह जन तेरे साथ पृथिवी पर उतरने के लिए तैयार है। अनन्यशरण तू आज से ही मन, वचन और कर्म से भगवान् शंकर को मान, जो समस्त विद्याओं के विधाता एवं कल्याण को देने वाले, देवों के देव और त्रिभुवन के गुरु हैं। जिन्होंने अपने चरण की धूल से सुर, असुर दोनों को पवित्र किया है और चन्द्र की एक कला को अपना कर्णावतंस बनाया है। बहुत थोड़े समय में वे तेरे शापजन्य शोक को दूर कर देगें।' इस प्रकार सावित्री के कहने पर मोती की भाँति सफेद आँसू के कण आँखों से टपकाती हुई सरस्वती बोली—'प्रिय सखी, ब्रह्मलोक का विरह या शापजनित शोक कोई भी पीड़ा उत्पन्न नहीं कर सकेंगे, जब तक तेरे साथ मैं विचरण कर रही हूँ। केवल ब्रह्माजी की सेवा का सुख मेरे हृदय को पिघला रहा है। पृथिवी पर मेरे लिए धर्म के स्थान जो समाधि (चित्त की एकाग्रता) के साधन एवं योग (चित्तवृत्ति का निरोध) के उपयुक्त हैं उन्हें तू ही जानती है।' इतना कह वह चुप हो गई। मानसिक उथल-पुथल (रणरणक) के कारण उसकी नींद उचट गई और उसने आँखें बिना बंद किये उस रात को बिताया।

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