हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उच्छ्वासः २९
चोपरि निपतन्नणुरपि सृणिरिव करिणां क्लेशः कदर्थनायालम्। सहजस्नेहपाशग्रन्थिबन्धनाश्च बान्धवभूता दुस्त्यजा जन्मभूमयः। दारयति दारुणः क्रकचपात इव हृदयं संस्तुतजनविरहः, सा नार्हस्येवं भवितुम्। अभूमिः खल्वसि दुःखक्ष्वेडाङ्कुरप्रसवानाम्। अपि च पुरा- कृते कर्मणि बलवति शुभेऽशुभे वा फलकृति तिष्ठत्यधिष्ठातरि प्रष्ठे पृष्ठतश्च कोऽवसरो विदुषि शुचाम्। इदं च ते त्रिभुवनमङ्गलैकमलम- मङ्गलभूताः कथमिव मुखमपवित्रयन्त्यश्रुबिन्दवः। तदलम्। अधुना कथय कतमं भुवो भागमलङ्कर्तुमिच्छसि। कस्मिन्नवतितीर्षति ते पुण्य- भाजि प्रदेशे हृदयम्। कानि वा तीर्थान्यनुग्रहीतुमभिलषसि। केषु वा धन्येषु तपोवनधामसु तपस्यन्ती स्थातुमिच्छसि। सज्जोऽयमुप- द्राघीयांसश्च। सृणिरङ्कुशः। मातरोऽपि जन्मभूमयः। दारुणो विषमः, काष्ठस्य च। क्रकचः करपत्रम्, हृदयं चित्तम्, मध्यं च। संस्तुतः परिचितः। सेति। सर्व- नामपदं जानासीत्यादिपूर्वोक्तार्थगर्भीकारेण। अभूमिस्थानम्, अक्षेत्रं च। क्ष्वेडो विषम्। शुभेऽशुभे वेत्यादि। सप्रतिपक्षा लोकोक्तिरियम्। 'अव्युत्पन्नमतिः कृतेन न सता नैवासता व्याकुलः' 'गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः' इत्यादिवत्। अधिष्ठातरि स्वामिनि। प्रष्ठेऽग्रगामिनि। अपवित्रतां नयन्ति, न तु शोभां त्याज- यन्ति। धामसु स्थानेषु। तपस्यन्ती तपश्चरन्ती। सज्जः प्रगुणः। आज्ञाकार्यमिति दृष्टस्वरूपः। निःसामान्यविश्रम्भभाजनतामभिव्यनक्ति सखीजनशब्दः। श्वश्रेय- छोटा भी अंकुश जैसे हाथियों पर गिर कर उनको परेशान कर देता है वैसे ही बड़ों के ऊपर थोड़े ही क्लेश का पड़ना बहुत कष्टकर हो जाता है। बंधु-बांधव के समान अपनी जन्म- भूमियां, जिनके साथ स्वाभाविक स्नेहपाश का गठबन्धन हो चुका है, दुस्त्यज है। अपने परिचित जनों का विरह दारुण आरे की तरह हृदय को चीर डालता है। पर तुझे इस तरह नहीं होना चाहिए। दुःखरूपी विष के पौधे के उत्पन्न होने के लिए तू स्थान नहीं है। और भी, जब कि पूर्वजन्म के बलवान् शुभ या अशुभ कर्म आगे और पीछे फल देने वाले हैं ही तो बुद्धिमान् को शोक करने का क्या अवसर है? त्रिभुवन का मंगल करने वाला तेरे कमल के समान इस मुख को अमंगल आँसू क्यों अपवित्र कर रहे हैं? बस रहने दे अब बता—धरती के किस भाग को अलंकृत करना चाहती है? किस पुण्यवान् प्रदेश में उतरने के लिए तेरा हृदय तुझे प्रेरित कर रहा है? किन तीर्थों को तू अनुगृहीत करना चाहती है? तपोवन के किन धन्य स्थानों में तपस्याभिरत रहने के लिए सोच रही है?