हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८ हर्षचरितम् अचलच्युतचन्द्रकान्तजलधाराधौत इव ध्वस्ते ध्वान्ते, गोलोकगलित- दुग्धविसरवाहिनि दन्तमयकरमुखमहाप्रणाल इवापूरयितुं प्रवृते पयो- निधिमिन्दुमण्डले, स्पष्टे प्रदोषसमये सावित्री शून्यहृदयामिव किमपि ध्यायन्तीं सास्रां सरस्वतीमवादीत्—‘सखि, त्रिभुवनोपदेशदानदक्षा- यास्तव पुरो जिह्वा जिह्रेति मे जल्पन्ती। जानास्येव यादृश्यो विसं- स्थुला गुणवत्यपि जने दुर्जनवन्निर्दक्षिण्याः क्षणभङ्गिन्यो दुरतिक्रम- णीया न रमणीया दैवस्य वामा वृत्तयः। निष्कारणा च निकारकणिकापि कलुषयति मनस्विनोऽपि मानसमसद्दृशजनादापतन्ती। अनवरतनयन- जलसिच्यमानश्च तरुरिव विपल्लवोऽपि सहस्रधा प्ररोहति अतिसुकु- मारं च जनं संतापपरमाणवो मालतीकुसुममिव म्लानिमानयन्ति। महतां र्दुदयाचलः, गोलोको रश्मिसमूहो वा। मकरमुखमिव मुखमग्रमस्येति समासः। विसंस्थुला निर्मर्यादाः। दुर्जनवन्निर्दक्षिण्याः क्रूराः। क्षणभङ्गिन्य इत्याश्वासनगर्भे- यमुक्तिः। वामाश्च स्त्रिय ईदृश्य एव। निकारः परिभवः। कणिका लेशः, शर्करिका च। कलुषयति दूषयति, कालुष्यं नयति च। मानसं चेतः सरश्च। अनवरत- मश्रुणा सिच्यमानः। अनवरतं घटसारणीप्रणालादिना नयनं प्रापणं यस्य तादृशो जलेनोक्ष्यमाणश्च। विपल्लव आपल्लेशः, विगतपल्लवश्च। प्ररोहति स्थिरीभवति। तरुपक्षे प्ररोहा विद्यन्ते यस्य स प्ररोहः, स इवाचरति प्ररोहतीति व्याख्या। संतापा खेदा, ऊष्मा च। मालतीकुसुमं सुमनःपुष्पमतिसुकुमारम्। महान्त उत्तमाः जलधारा से मानो सारा अंधेरा धुल गया। आकाश मे उठ कर चन्द्रमा अपनी सफेद चाँदनी से समुद्र को ऐसे भरने लगा जैसे हाथी के दाँतों का बना हुआ मकरमुखी पनाला गोलोक से दूध की धार बहा रहा हो। इस प्रकार प्रदोष समय के स्पष्ट हो जाने पर सावित्री शून्य-हृदय होकर कुछ सोचती और बड़बड़ाती हुई सरस्वती से बोली— 'सखि, तू त्रिभुवन को उपदेश देने में चतुर है' तेरे सामने मेरी जीभ कुछ बकते हुए शर्मिन्दा हो रही है। तू तो जानती ही है कि गुणवान् लोगों के विषय में जैसी दैवी प्रवृत्तियाँ मर्यादाहीन, दुर्जनों की तरह क्रूर, क्षणभङ्गुर, दुरन्त एवं अरमणीय होती हैं। समानता न रखने वालों द्वारा बिना किसी कारण के उत्पन्न परिभव का लेश भी मनस्वी के भी मन को कलुषित कर डालता है। विपत्ति का अंकुर निरन्तर आँसुओं से सींचे जाने पर (पल्लव रहित भी) वृक्ष के समान हजारों शाखा-प्रशाखाओं में बढ़ता ही जाता है। मालती के फूल की तरह अतिसुकुमार लोगों को सन्ताप के परमाणु मुरझा डालते हैं।