भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 69

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri प्रथम उच्छ्वासः २७ यति तारागणे, संध्यानुबन्धताम्रे परिणमत्तालफलत्वक्त्विषि कालमेघमे- दुरे, मेदिनीं मीलयति नववयसि तमसि तरुणतरतिमिरपटल- पाटनपटीयसि समुन्मिषति यामिनीकामिनीकर्णपूरचम्पककलिकाकद- म्बके प्रदीपप्रकरे, प्रतनुतुहिनकिरणकिरणलावण्यालोकपाण्डुन्त्याश्यान- नीलनीरमुक्तकालिन्दीकुलबालपुलिनायमाने शातक्रतवे क्रशयति तिमिरमाशामुखे, खमुचि मेचकितविकचितकुवलयसरसि शशधरकर- निकरकचग्रहाविले विलीयमाने मानिनीमनसीव शर्वरीशबरचिकुरचये चाषपक्षत्विषि तमसि, उदिते भगवत्युदयगिरिशिखरकटककुहरहरि- खरनखरनिवहहेतिनिहतनिजहरिणगलितरुधिरनिचयनिचितमिव लोहितं वपुरुदयरागधरमधरमिव विभावरीवध्वा धारयति श्वेतभानौ, कलिका । निकरः समूहः । अनुबन्धः संस्कारः । परिणमज्जरोठमवत् । तालस्तृण- राजः । मेदुरं घनम् । मीलयति स्थगयति । नववयसि प्रत्यग्रे । चम्पको हेमपुष्पकः । आश्यानमीषच्छुष्कम् । नीरं जलम् । कालिन्दी यमुना । नीलमभिप्रायेणैतत्पदम् । यस्तटभागो वारिणा त्यक्तस्तत्पुलिनम् । कूलं ततोऽन्यत् । क्रशयति । तनुकुर्वति । खमुचि त्यक्ताकाशे । भूभागमवलम्बमान इत्यर्थः । मेचकितं निर्विभागतां नीतम् । शशधरकरैः स्वीकारेण करम्बितेऽत एव क्षयं गच्छन्ति । अन्यत्र चन्द्ररश्मीनां धारणेन सेवनेन किंकर्त्तव्यतामूढ एवमधिगलत्यार्द्रतां मज- माने केशपाशपक्षे तु विस्रंसमाने । चाषः किकीदिविः पक्षी । हरिः सिंहः । नखरा नखाः । हेतिरायुधम् । विभावरी रात्रिः । श्वेतभानुश्चन्द्रः । अचलः, अर्था- हुए, पकते हुए तालफल की त्वचा के समान कलौंस भरी ललाई वाला प्रलयकालीन मेघों के सदृश गहन पहला अंधेरा धरती पर छा गया। रात्रिरूपी कामिनी के कान में खोसी हुई चम्पा की कली-जैसे दीपक गहन अंधेरे को हटाने लगे। यमुना का रेतीला किनारा नीले जल के हट जाने पर जैसा लगता है उसी प्रकार पूर्व दिशा का मुख चन्द्रमा की कुछ-कुछ रश्मियों के लुनाई-भरे आलोक से पीला होने लगा और अन्धकार को क्षीण करने लगा। विलीन होता हुआ अंधकार आकाश को छोड़ने लगा, खिले हुए कुवलय वाले सरोवर विभिन्न वर्ण के हो गए। चाष पक्षी के पंख जैसा और रात्रि रूपी भीलनी के बालों जैसा अँधेरा चन्द्र की किरणों के कचग्रह से मानिनी नायिका के मन के समान धीमा पड़ने लगा। रात्रिवधू के अधरराग के समान लाल चन्द्रमा उदित हो गया, मानो उदयाचल की खोह में रहने वाले सिंह के द्वारा पकड़े पंजे से मारे गए अपने हिरन के रक्त से वह रंग गया था। उदयाचल से बहती हुई चन्द्रकान्त मणियों की CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.